एक शहर जहां की नदियां हैं शीशे जैसी साफ! ल्हासा की खूबसूरती देख भूल जाएंगे स्विट्जरलैंड
भारतीय पत्रकार के ल्हासा, तिब्बत यात्रा का अनुभव, जहां की नदियां शीशे जैसी साफ हैं और संस्कृति जीवंत है। यह यात्रा बरखोर स्ट्रीट, जोखांग मंदिर, पोटाला ...और पढ़ें

पोटाला पैलेस, ल्हासा।
HighLights
ल्हासा की नदियां इतनी साफ कि शीशे जैसी दिखती हैं
बरखोर स्ट्रीट, जोखांग मंदिर और पोटाला पैलेस प्रमुख आकर्षण
तिब्बती संस्कृति, विकास और ऊंचे पठार का रोमांचक अनुभव
मनोज झा, उत्तराखंड। दुनिया की सबसे ऊंची जगह, विशाल निर्जन पठार, कम आक्सीजन वाली जगह, याकों के झुंड, दलाई लामा की पवित्र स्थली, गहरा कत्थई लबादा पहन हाथों में माला फेरते तिब्बती लामा और...पता नहीं मन में क्या-क्या छवियां थीं ल्हासा के बारे में।
सुना था कि रोजाना चटख धूप खिलने के कारण उसे धूप का शहर भी कहते हैं। ऐसे में ल्हासा की पहली यात्रा के समय मन में तमाम कौतुहल बना हुआ था। दिल्ली से शंघाई की छह घंटे की हवाई यात्रा और फिर वहां से सुबह-सवेरे ल्हासा के लिए अगली उड़ान। चार घंटे के बाद हम ल्हासा हवाई अड्डे पर थे। दिल्ली स्थित चीनी दूतावास के तत्वावधान में भारतीय पत्रकारों का एक दल ल्हासा और कैलास मानसरोवर की यात्रा पर पहुंचा था। मैं भी इस दल का हिस्सा था। हमारे साथ चीनी दूतावास की अधिकारी यू चिन लिन भी दिल्ली से साथ में थीं।

बरखोर स्ट्रीट, ल्हासा
रेशमी पटके से हुआ स्वागत
चीनी विदेश मंत्रालय के स्टाफ ने हम सभी का सफेद रेशमी पटका पहनाकर स्वागत किया। ल्हासा सिटी जाने वाली बस में हमारे साथ एक तिब्बती गाइड फोनसुक वांगशे भी सवार हुआ। वह अंग्रेजी ठीक से बोलता और समझता था। इससे हमलोगों को बातचीत में आसानी हो गई। बाहर धूप के बीच हल्की ठंडक भी थी। हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही सबसे पहले ब्रह्मपुत्र नदी के दर्शन हुए।
एक के बाद एक तीन सुरंगों को पार करने के बाद ल्हासा के विशाल पठार ने मानो अपना सीना तान दिया। सड़क से थोड़ी ही दूर वनस्पति विहीन कम ऊंचाई वाले काले पहाड़, उन पर बादलों की घनी परछाइयां और निर्जन-ऊसर इलाके।
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रे तिब्बत का कमोबेश यही दृश्य है। हालांकि, ल्हासा तक सड़क के किनारे घनी हरियाली, जौ की लहलहाती फसल, यूकिलिप्टस प्रजाति के पेड़, नदियां, गिने-चुने कस्बे और सरकारी इमारतें यह बता रहे थे कि कभी रहस्यमयी, अगम्य और दुरुह माने जाने वाले तिब्बत को मुख्यधारा से जोड़ने और उसे सहज-सुलभ बनाने के प्रयास सच्चे मन से किए गए हैं।
शीशे से साफ नदियां
बीच में मिडटाउन नाम के एक स्थान पर आधुनिक होटल, बाजार, आवास और सरकारी प्रतिष्ठानों से यह पूर्वाभास हो चला था कि ल्हासा निश्चित रूप से एक लकदक और व्यवस्थित शहर होगा। शहर में प्रवेश करने से पहले नदियां, नहरों और पुलों का व्यवस्थित संयोजन बताता है कि चीनी आधिपत्य के बाद कम से कम वहां के विकास में तो कोई कसर नहीं छोड़ी गई है।

ल्हासा नदी
शहर में ल्हासू वेटलैंड नेचर रिजर्व क्षेत्र में एक छोटी-सी नदी के किनारे हमारा होटल था। नदी क्या, निर्मल धारा थी। दोनों किनारों पर सघन मानवीय आबादी के बावजूद एकदम साफ-सुथरी नदी। शहर की प्रसिद्ध और सबसे बड़ी ल्हासा नदी को ही देखें तो जहां तक आपकी नजर जाती है, पूरे प्रवाह मार्ग में आपको गंदगी का कोई नामोनिशान नहीं दिखाई देता है। कलकल बहती स्वच्छ और उजली धारा। ल्हासा की इन स्वच्छ जलधाराओं को देखकर आश्चर्य होता है कि हम भारत में अपनी नदियों की सेहत को आखिर दुरुस्त क्यों नहीं कर पाए हैं।
ल्हासा की खास बरखोर स्ट्रीट
होटल में विश्राम के बाद हमलोग सबसे पहले भव्य और विशाल शिजांग संग्रहालय गए। संग्रहालय के भित्तिचित्रों और वहां रखे पुरावशेष तिब्बत की आदिम सभ्यता और उसके क्रमिक विकास के जीवंत साक्ष्य पेश करते हैं। एक भित्तिचित्र में गुफा के अंदर स्वास्तिक का निशान शायद यह बताता है कि कहीं न कहीं इस सभ्यता का जुड़ाव सिंधु तट पर बसने वाली मानव बस्तियों से रहा होगा।
संग्रहालय के बाद हम शाम को ल्हासा की प्रसिद्ध बरखोर स्ट्रीट गए। कुछ-कुछ अपनी दिल्ली के चांदनी चौक जैसा बाजार। सड़क किनारे दोपहिया वाहनों की कतार के चलते यह बाजार काफी भीड़ भरा दिखता है। ज्यादातर कपड़ों, गैजेट्स और जेम्स-ज्वैलरी की दुकानें। दुकानों के काउंटर पर ज्यादातर तिब्बती महिलाएं। इन्हें अंग्रेजी नहीं आती, इसलिए पर्यटकों से संवाद का जरिया मोबाइल का ट्रांसलेटर एप बनता है।

पोटाला पैलेस से ल्हासा शहर का नज़ारा
आस्था का बड़ा केंद्र जोखांग मंदिर
यहां हमने थोड़ी-बहुत खरीदारी भी की। बरखोर स्ट्रीट के आखिर में यहां का प्रसिद्ध जोखांग मंदिर है। यहां के रास्तों और गलियों में जमीन पर दंडवत बौद्ध श्रद्धालु, हाथों में धर्मचक्र घुमाते भिक्षु और तिब्बती भाषा में भगवान बुद्ध की अभ्यर्थना...। तिब्बती बौद्धों की आस्था का बड़ा केंद्र है जोखांग मंदिर।
अगले दिन हम लाल पर्वत पर स्थित ल्हासा के प्रसिद्ध राजमहल पोटाला पैलेस में थे। कई दलाई लामाओं से जुड़ी सातवीं सदी में निर्मित यह विशाल इमारत ल्हासा की सबसे ऊंची जगह है। सफेद और लाल रंग से तैयार इस प्राचीन और भव्य महल में आपको तिब्बती जीवन शैली, वहां की वास्तुकला और चित्रकारी की बेहतरीन झलकियां मिलती हैं। बताया गया कि महल का सफेद रंग वाला हिस्सा प्रशासनिक, जबकि लाल रंग वाला हिस्सा धार्मिक आयोजनों के लिए समर्पित हुआ करता था।

जोखांग मंदिर
हरियाली के बीच बसा नोरबुलिंगका पैलेस
कभी यह महल दलाई लामाओं का शीतकालीन निवास स्थल था। अब इसे संग्रहालय का रूप दे दिया गया है। प्रत्येक वर्ष इसकी रंगाई-पुताई होती है। इसमें चूना, शहद जैसी चीजों का पारंपरिक तिब्बती घोल तैयार कर इसे स्वैच्छिक श्रमदान के जरिये नया रूप दिया जाता है।
हमारा अगला पड़ाव दलाई लामाओं का ग्रीष्मकालीन निवास स्थल नोरबुलिंगका पैलेस था। हरे-भरे विशाल उद्यान में फैले इस पैलेस की भव्यता देखते ही बनती है। इस परिसर को मानव निर्मित सबसे बड़े उद्यान का भी दर्जा प्राप्त है। सभा, प्रार्थना, विमर्श आदि के लिए यहां अलग-अलग कई मंडप हैं। पूरे परिसर में पांचवें से लेकर मौजूदा 14वें दलाई लामा तक की स्मृतियां बेहद करीने से संजोई गई हैं। पैगोडा शैली में निर्मित मुख्य महल में दलाई लामाओं की गद्दी, उनके स्वर्ण मुकुट, छत्र, सिंहासन आदि देखकर लगता है कि यहां कभी बौद्ध धर्म किस तरह फला-फूला होगा।
चखने को मिला तिब्बत का बेहतरीन स्वाद
नोरबुलिंगका पैलेस के बाद हमने गाइड से ल्हासा के अन्य स्थलों तक भी ले जाने का आग्रह किया। समयाभाव में बस से ही सही, वह चिंगगुआन रोड, जिआंग्सु रोड, पेइचिंग (बीजिंग) रोड, लिंगकोर साउथ रोड आदि स्थानों-बाजारों तक ले गए। इनमें से कई स्थान आधुनिक ल्हासा की तस्वीर पेश करते हैं, जबकि कुछ जगहों पर आज भी प्राचीन ल्हासा और पारंपरिक तिब्बती जीवन शैली के अवशेष दिखाई देते हैं।
ल्हासा के रेस्टोरेंट और उनके जायकों की चर्चा के बिना यात्रा अधूरी रहेगी। यहां के स्ट्रीट फूड से लेकर रेस्तराओं में एक से बढ़कर एक तिब्बती व्यंजन मौजूद हैं। हमने कई रेस्ताराओं में इन व्यंजनों का लुत्फ भी उठाया। ऊंचाई पर बसे होने के चलते ल्हासा में खासकर पर्यटकों को कई बार ऑक्सीजन की कमी महसूस होती है।

नोरबुलिंग पैलेस
रोमांच से भरा ल्हासा का सफर
हमारे दल के भी कुछ साथियों को शुरू में यह परेशानी हुई। हालांकि वे जल्दी ही इससे उबर गए। हमारे प्रवास के दौरान ल्हासा में करीब तीन महीने के बाद बारिश भी हुई। स्थानीय लोग इस रिमझिम से बेहद खुश थे। बरखोर सुपर मार्केट में अंग्रेजी बोलने वाले एक दुकानदार ने बड़े चाव से कहा कि आपलोग भारत से बारिश साथ लेकर आए हैं। पूरे ल्हासा में आपको अस्सी फीसद इमारतें दो या तीन मंजिला ही दिखेंगी। इन इमारतों के मेहराबों पर पैगोडा शैली की निशानियां अंकित हैं।

शिजांग संग्रहालय
भीड़भाड़ रहित चौड़ी सड़कें, हंसते-मुस्कुराते टोपी-हैट पहले लोग, महिलाओं का खुला अंदाज, हाथों में धर्मचक्र घुमाते लामा, समृद्ध हाट-बाजार और पग-पग पर बौद्ध विरासत की निशानियां। उधर, शहर से दूर पठारी इलाकों में याक के झुंड और पारंपरिक तिब्बती पोशाक पहने मस्त अंदाज वाले तिब्बती चरवाहे...। कभी निषिद्ध शहर कहे जाने वाले ल्हासा की यात्रा निश्चित रूप से आपको रोमांच से भर देती है।
(लेखक दैनिक जागरण, उत्तराखंड के राज्य संपादक हैं।)
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