लोअर बर्थ नहीं मिली तो क्या TTE बदलवा सकता है सीट? समझिए रेलवे किस आधार पर करता है अलॉटमेंट
ट्रेन का टिकट बुक करते समय हम सभी की उंगलियां सबसे पहले 'लोअर बर्थ' के विकल्प पर ही जाती हैं। ...और पढ़ें

ट्रेन में किसे और कैसे मिलती है 'लोअर बर्थ'? (Image Source: AI-Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। ट्रेन से सफर करते समय ज्यादातर लोग यही चाहते हैं कि उन्हें नीचे वाली सीट, यानी 'लोअर बर्थ' मिले। खासतौर पर जब हमारे साथ बुजुर्ग, महिलाएं या कोई दिव्यांग व्यक्ति सफर कर रहा हो, तो नीचे की सीट की जरूरत और भी बढ़ जाती है, क्योंकि इससे चढ़ना-उतरना काफी आसान हो जाता है।
हालांकि, अक्सर ऐसा होता है कि कन्फर्म टिकट होने के बाद भी हमें मनचाही सीट नहीं मिल पाती। क्या आपने कभी सोचा है कि रेलवे आखिर किस नियम के तहत लोअर बर्थ बांटता है? इसी सवाल का जवाब हाल ही में लोकसभा में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दिया है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि ट्रेन में लोअर बर्थ किसे और कैसे मिलती है।

(Image Source: AI-Generated)
नीचे की सीट पर किसका है पहला हक?
रेलवे की व्यवस्था के अनुसार, टिकट बुक करते समय कुछ विशेष श्रेणी के यात्रियों को लोअर बर्थ देने की पूरी कोशिश की जाती है। इन यात्रियों में शामिल हैं:
- 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के पुरुष
- 45 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाएं
- गर्भवती महिलाएं
अगर बुकिंग के समय ट्रेन में नीचे की सीटें खाली हैं, तो रेलवे का रिजर्वेशन सिस्टम सबसे पहले इन लोगों को लोअर बर्थ आवंटित करता है।
बुजुर्गों, दिव्यांगों और महिलाओं की सहूलियत का पूरा ध्यान
रेलवे ने दिव्यांग यात्रियों की सुविधा के लिए भी विशेष प्रावधान किए हैं। उनकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, अलग-अलग श्रेणी के दिव्यांग यात्रियों को लोअर बर्थ और सफर को आसान बनाने वाली अन्य सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं। जरूरत पड़ने पर इन्हें विशेष कोटे के तहत भी आरक्षण का लाभ दिया जाता है।
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रेलवे की ओर से यह सुविधा लगभग सभी प्रमुख श्रेणियों में दी जाती है। वरिष्ठ नागरिकों, 45+ महिलाओं, गर्भवती महिलाओं और दिव्यांग यात्रियों के लिए स्लीपर क्लास, थर्ड एसी, सेकंड एसी और थर्ड एसी इकोनॉमी कोचों में कुछ लोअर बर्थ विशेष रूप से आरक्षित रखी जाती हैं।
'Lower Berth Preference' चुनने से क्या पक्की हो जाती है सीट?
टिकट बुक करते समय रेलवे हमें 'लोअर बर्थ' चुनने का विकल्प तो देता है, लेकिन यह केवल आपकी पसंद होती है, इसे सीट मिलने की कोई पक्की गारंटी नहीं माना जा सकता।
दरअसल, हर कोच में नीचे की सीटें गिनी-चुनी होती हैं और इनकी मांग हमेशा ज्यादा रहती है। रेलवे का ऑटोमैटिक सिस्टम उपलब्ध सीटों और नियमों के आधार पर खुद तय करता है कि किसे कौन-सी सीट मिलेगी। इसी कारण से सिस्टम उन यात्रियों को पहले लोअर बर्थ देता है, जिन्हें इसकी सख्त जरूरत होती है। यही वजह है कि युवाओं को अक्सर मिडिल या अपर बर्थ थमा दी जाती है।
अगर मनचाही सीट न मिले तो आपके पास क्या है रास्ता?
अगर सभी लोअर बर्थ भर चुकी हैं, तो रेलवे कभी भी किसी दूसरे यात्री की कन्फर्म सीट को छीनकर आपको लोअर बर्थ नहीं देगा। अगर आपको ऊपर की सीट मिली है, तो आपके पास एक ही विकल्प बचता है- आपसी बातचीत।
आप ट्रेन में किसी दूसरे यात्री से विनती करके, आपसी सहमति से अपनी सीट बदल सकते हैं, लेकिन ध्यान रखने वाली बात यह है कि रेलवे या टीटीई किसी भी यात्री को अपनी सीट बदलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।