250 सालों से पानी में डूबी हैं Jal Mahal की 4 मंजिलें, मॉडर्न आर्किटेक्चर को आज भी दे रहीं टक्कर
इस बेमिसाल इमारत की नींव साल 1699 में रखी गई थी। इसके बाद, 18वीं सदी में महाराजा जय सिंह द्वितीय ने इस महल और आसपास की पूरी झील का बेहद खूबसूरती से जी ...और पढ़ें

जयपुर के 'जल महल' की कहानी, जहां राजा मनाते थे पिकनिक (Image Source: Incredible India)

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जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। पिंक सिटी जयपुर की सैर पर निकले हों और आमेर मार्ग से गुजरते वक्त मान सागर झील पर आपकी नजर न पड़े, ऐसा हो ही नहीं सकता है। दरअसल, इसी झील के बीचों-बीच लाल बलुआ पत्थर से बनी एक शानदार इमारत दिखाई देती है, जिसे दुनिया 'जल महल' के नाम से जानती है।
पहली नजर में यह पानी पर तैरता हुआ एक खूबसूरत अजूबा लगता है, लेकिन यकीन मानिए, इसकी खूबसूरती के नीचे इतिहास और वास्तुकला के ऐसे कई राज दफन हैं, जिनसे ज्यादातर पर्यटक आज भी अनजान हैं। आइए, विस्तार से जानते हैं इनके बारे में।

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रिहाइश नहीं, राजघरानों का 'चिल जोन' था यह महल
ज्यादातर किले और महल राजाओं के रहने के लिए बनाए गए थे, लेकिन जल महल की कहानी थोड़ी अलग है। इसका निर्माण 1699 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। बाद में 18वीं सदी में महाराजा जय सिंह द्वितीय ने इसे नया रूप दिया।
बता दें, मुगल और राजपूताना वास्तुकला का यह बेहतरीन नमूना कभी भी राजाओं का घर नहीं रहा। इसे तो शाही परिवार की पिकनिक, बत्तखों के शिकार और गर्मियों की चिलचिलाती धूप से बचने के लिए एक 'प्लेजर पैलेस' के तौर पर डिजाइन किया गया था।
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पानी के नीचे छिपी हैं महल की चार मंजिले
जल महल को दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे यह पानी की सतह पर तैर रहा हो, लेकिन यह एक शानदार नजरों का धोखा है। असल में यह इमारत पांच मंजिला है। जब मान सागर झील में पानी पूरा भर जाता है, तो इसकी नीचे की चार मंजिलें पूरी तरह जलमग्न हो जाती हैं और सिर्फ सबसे ऊपरी हिस्सा ही नजर आता है।
इसे जानबूझकर ऐसा बनाया गया था ताकि पानी की वजह से महल के निचले हिस्से हमेशा ठंडे रहें। भले ही वे हिस्से पानी में डूबे रहते हैं, लेकिन आज भी वहां नक्काशीदार गलियारे और कमरे मौजूद हैं।

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250 सालों से टिका है 'देसी' वॉटरप्रूफिंग का कमाल
आप भी सोच रहे होंगे कि सदियों से पानी में डूबे रहने के बावजूद इस इमारत की दीवारें आखिर गलती क्यों नहीं हैं? दरअसल, इसका श्रेय प्राचीन भारतीय वास्तुकला विज्ञान को जाता है।
इसे बनाने वाले कारीगरों ने चूना, गुड़, गुग्गल और मेथी पाउडर को मिलाकर एक खास लेप तैयार किया था। इस प्राकृतिक मिश्रण ने न सिर्फ दीवारों को सीलन से बचाया, बल्कि उन्हें हवादार भी बनाए रखा। यही वजह है कि आज 250 से ज्यादा साल बीत जाने के बाद भी इसकी जलमग्न मंजिलों में पानी का रिसाव न के बराबर होता है।
राजशाही ठाठ-बाट का प्रतीक 'चमेली बाग'
अगर आप महल की सबसे ऊपरी छत पर पहुंच पाएं, तो आपको वहां 'चमेली बाग' नाम का एक बेहद खूबसूरत टैरेस गार्डन देखने को मिलेगा। चारबाग डिजाइन में बने इस बगीचे में संगमरमर की क्यारियां, कमल के डिजाइन वाले फव्वारे और मेहराबदार रास्ते हैं।
इस बगीचे के कोनों में बंगाल की छत वाली शैली में सुंदर मंडप बने हैं। हर तिबारी की अपनी थीम है- जैसे 'बादल महल' तिबारी में मानसून की झलक है, तो 'रास निवास' तिबारी में भगवान कृष्ण की रासलीला को दर्शाया गया है। बता दें, किसी जमाने में यहां शाही मेहमान बैठकर संगीत का लुत्फ उठाते थे।

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कभी बहता था सीवेज, आज आते हैं फ्लेमिंगो
मान सागर झील का इतिहास हमेशा से इतना साफ-सुथरा नहीं रहा। एक दौर ऐसा आया जब यह झील शहर के कचरे और औद्योगिक सीवेज का डंपिंग ग्राउंड बन गई थी।
साल 2000 के दशक में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए इस झील को बचाने की मुहिम शुरू हुई। गंदे पानी को साफ करने के लिए ट्रीटमेंट प्लांट लगे और गहराई बढ़ाने के लिए सफाई की गई। नतीजा यह हुआ कि आज यह जगह एक बेहतरीन बर्ड सेंचुरी बन गई है। अब सर्दियों में यहां फ्लेमिंगो, कूट्स, पोचार्ड और केस्ट्रल जैसे प्रवासी पक्षी डेरा डालते हैं। इसके अलावा, पास की नर्सरी में एक लाख से ज्यादा पेड़ भी लगाए गए हैं।
जयपुर टूर का परफेक्ट स्टॉप है 'जल महल'
जल महल जयपुर शहर के केंद्र से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर है। यह आमेर फोर्ट, नाहरगढ़ फोर्ट और कनक वृंदावन गार्डन जाने वाले रास्ते में ही पड़ता है, इसलिए इसे अपने टूर प्लान में शामिल करना बेहद आसान है।
यहां घूमने का सबसे अच्छा समय या तो सुबह-सवेरे का है, जब भीड़ कम होती है या फिर सूर्यास्त का। बता दें, डूबते सूरज की सुनहरी रोशनी जब लाल बलुआ पत्थर और पानी पर पड़ती है, तो नजारा एकदम जादुई हो जाता है।