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    क्यों इतिहास के पन्नों में 'अधूरा ख्वाब' बनकर रह गया तुगलकाबाद किला? सूफी संत से जुड़ी है कहानी

    Updated: Mon, 15 Jun 2026 08:00 PM (IST)

    तुगलकाबाद किला गयासुद्दीन तुगलक का एक अधूरा सपना है, जिसकी कहानी सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के श्राप से जुड़ी है। ...और पढ़ें

    दिल्ली का वो तीसरा शहर जो कभी पूरा बस ही नहीं सका! जानिए तुगलकाबाद किले की कहानी (Image Source: AI-Generated)

    दिल्ली का वो तीसरा शहर जो कभी पूरा बस ही नहीं सका! जानिए तुगलकाबाद किले की कहानी (Image Source: AI-Generated) 

    HighLights

    1. तुगलकाबाद किला गयासुद्दीन तुगलक का एक अधूरा शाही सपना

    2. सूफी संत निजामुद्दीन औलिया के श्राप से जुड़ा इतिहास

    3. सुल्तान की रहस्यमयी मौत और किले का अधूरा निर्माण

    लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। दिल्ली के ऐतिहासिक पन्नों में कई शहर बसे और उजड़े, लेकिन 'तुगलकाबाद किले' की कहानी सबसे जुदा है। लाल कोट और सीरी के बाद बसाए गए दिल्ली के इस तीसरे ऐतिहासिक शहर के खंडहर आज भी लगभग अपने मूल रूप में मौजूद हैं। यह वीरान पड़ा विशालकाय ढांचा किसी राजा की उस महान महत्वाकांक्षा का जीता-जागता सबूत है, जो कभी पूरी तरह परवान नहीं चढ़ सकी।

    Tughlaqabad Fort story

    (Image Source: AI-Generated)

    खिलजी का मजाक और तुगलक की जिद

    यह साल 1321 की बात है। तुगलक वंश की नींव रखने वाले गयासुद्दीन तुगलक एक ऐसा शहर बसाना चाहते थे, जो न सिर्फ उनकी राजधानी बने, बल्कि उनकी अपार शक्ति का प्रतीक भी हो।

    कहा जाता है कि यह आइडिया गयासुद्दीन के दिमाग में काफी पहले से था। उन्होंने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सामने भी इस किलेदार शहर का प्रस्ताव रखा था, लेकिन तब खिलजी ने इस विचार का खूब मजाक उड़ाया। वक्त का पहिया घूमा और जब गयासुद्दीन खुद गद्दी पर बैठे, तो उन्होंने अपने उस पुराने सपने को सच करने की ठान ली।

    Tughlaqabad Fort

    (Image Source: Pexels)

    इस किले को पूरी तरह से आत्मनिर्भर और अभेद्य बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी गई। दुश्मनों से बचने के लिए इसकी दीवारें 25 मीटर तक ऊंची उठाई गईं। आपातकाल के लिए इसके अंदर ही बड़े-बड़े अन्न भंडार, पानी के कुंड और खजाने व हथियारों को छिपाने के लिए तहखाने बनाए गए। सुल्तान के सिर पर इस किले को बनाने का ऐसा जुनून सवार था कि उसने एक शाही फरमान निकाल दिया- दिल्ली सल्तनत के हर एक मजदूर को इस किले के निर्माण में काम करना ही होगा।

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    जब सूफी संत से टकराया सुल्तान का अहंकार

    तुगलकाबाद का निर्माण कार्य जोरों पर था, लेकिन इसी दौरान पास ही में एक दिलचस्प वाकया हो रहा था। जाने-माने सूफी संत निजामुद्दीन औलिया अपने घर पर एक बावली का निर्माण करवा रहे थे, क्योंकि सुल्तान के आदेश के बाद सारे मजदूर किले के काम में लगा दिए गए थे, इसलिए संत औलिया को अपने प्रोजेक्ट के लिए मजदूर ही नहीं मिल पा रहे थे।

    Tughlakabad Delhi Fort

    (Image Source: Pexels)

    यहीं से एक अनोखी किंवदंती ने जन्म लिया। कहते हैं कि कुछ मजदूर दिन के समय सुल्तान के किले में पसीना बहाते और रात के अंधेरे में छिपकर संत की बावली का काम करते थे। जब यह बात गयासुद्दीन तुगलक के कानों तक पहुंची, तो वह तिलमिला उठा। रात का काम रोकने के लिए उसने एक क्रूर आदेश दिया- बावली के निर्माण स्थल पर तेल की सप्लाई तुरंत रोक दी जाए, ताकि दीये न जल सकें।

    लेकिन, माना जाता है कि संत निजामुद्दीन औलिया ने अपने चमत्कार से कुएं के पानी को ही तेल में बदल दिया और निर्माण कार्य बिना रुके चलता रहा। इसी दौरान, आहत संत के मुंह से तुगलकाबाद के लिए एक खौफनाक श्राप निकला- "या रहे उजड़, या बसे गुज्जर"। इसका मतलब था कि सुल्तान का यह सपनों का शहर या तो पूरी तरह वीरान हो जाएगा, या फिर यहां बंजारे और चरवाहे अपना डेरा जमाएंगे।

    Tughlaqabad Fort Photos

    (Image Source: Pexels)

    "हुजूर, दिल्ली अभी दूर है"

    इस कहानी का अंत और भी ज्यादा रहस्यमयी है। सुल्तान गयासुद्दीन उस वक्त बंगाल के दौरे पर था जब उसे पता चला कि मजदूर अभी भी संत के लिए काम कर रहे हैं। गुस्से से भरे सुल्तान ने कसम खाई कि वह दिल्ली लौटते ही संत को इसकी सजा देगा।

    जवाब में संत निजामुद्दीन औलिया ने वो ऐतिहासिक वाक्य कहा- "हनूज दिल्ली दूर अस्त"।

    हैरानी की बात यह है कि सुल्तान कभी दिल्ली पहुंच ही नहीं सका। रास्ते में, उसी के स्वागत के लिए बनाया गया एक लकड़ी का मंडप उसके ऊपर गिर गया और उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद लोगों का यह विश्वास पक्का हो गया कि संत का श्राप सच हो गया था।

    Tughlakabad Fort Delhi

    (Image Source: Pexels)

    वक्त के पन्नों में जमा हुआ एक ढांचा

    सुल्तान की मौत के साथ ही तुगलकाबाद का काम भी अधूरा रह गया, लेकिन आज भी इसके खंडहर उस दौर की बेहतरीन वास्तुकला की गवाही देते हैं। तुगलक वंश की पहचान बन चुकी विशाल पत्थर की दीवारें इस ऊबड़-खाबड़ इलाके को आज भी घेरे हुए हैं।

    इस किले के ढांचे को करीब से समझें तो:

    • सुरक्षा के कड़े इंतजाम: यहां दो मंजिला ऊंची गोल निगरानी मीनारें बनाई गई थीं।
    • भव्य प्रवेश द्वार: शहर में दाखिल होने के लिए 52 दरवाजे बनाए गए थे, जिनमें से 13 दरवाजे आज भी मौजूद हैं।
    • पानी की व्यवस्था: शहर की प्यास बुझाने के लिए 7 खास रेनवाटर टैंक बनाए गए थे।

    Tughlakabad Fort history

    (Image Source: Pexels)

    3 मुख्य हिस्सों में बंटा था पूरा शहर:

    • मुख्य शहर: गेट्स के बीच एक 'ग्रिड-प्लान' के तहत रिहायशी इलाके बनाए गए थे।
    • गढ़: यह शहर का दिल था। आधा षट्कोण के आकार वाले इस गढ़ के ऊपर 'बुर्ज-मंडल' नाम का टावर था। यहां बड़े-बड़े हॉल्स और रहस्यमयी अंडरग्राउंड रास्तों के निशान आज भी मौजूद हैं।
    • महल: गढ़ के बिल्कुल बगल में शाही परिवारों के रहने के लिए महल था, जो समय की मार खाकर अब खस्ताहाल हो चुका है।

    colossal Tughlaqabad Fort

    (Image Source: Pexels)

    किले से थोड़ी ही दूरी पर लाल बलुआ पत्थर से बनी एक शानदार इमारत है। तुगलक के शासन में बने इस मकबरे में खुद गयासुद्दीन तुगलक, उसकी पत्नी और उसके उत्तराधिकारी मोहम्मद बिन तुगलक की कब्रें मौजूद हैं।

    ये ऐतिहासिक किंवदंतियां कितनी सच हैं और कितनी फसाना, यह कहना मुश्किल है। हालांकि, ये कहानियां तुगलकाबाद के रहस्य को और भी गहरा कर देती हैं। एक ऐसा शहर जिसकी शुरुआत बेहद विशाल थी, लेकिन जिसकी नियति में हमेशा के लिए 'अधूरापन' लिखा था।

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