चलती ट्रेन में रुद्राभिषेक से चर्चा में आया रेलवे का 'सैलून कोच', जानिए आम आदमी कैसे कर सकता है इसे बुक
सैलून कोच रेलवे का कोई आम डिब्बा नहीं है, बल्कि यह एक चलते-फिरते वीआईपी सुइट की तरह होता है। आइए, इस आर्टिकल में आपको विस्तार से बताते हैं इससे जुड़ी ...और पढ़ें

फर्स्ट AC से कई कदम आगे है रेलवे का 'सैलून कोच' (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इंटरनेट पर इन दिनों एक वीडियो ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा हुआ है। वीडियो में दिख रहा है कि राजधानी एक्सप्रेस की रफ्तार से दौड़ती एक ट्रेन के भीतर कुछ लोग मौजूद हैं और रुद्राभिषेक के साथ पूजा-पाठ चल रहा है। बता दें, इस अनोखे नजारे पर विवाद छिड़ने के बाद उत्तर रेलवे को सफाई देनी पड़ी।
हालांकि, इस पूरी घटना ने एक दिलचस्प सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस लग्जरी डिब्बे में यह पूजा हो रही थी, क्या हम और आप भी उसे बुक कर सकते हैं? आइए इस आलीशान 'सैलून कोच' के बारे में डिटेल में समझते हैं।

(Image Source: AI-Generated)
रेलवे का आलीशान 'सैलून कोच'
सैलून कोच रेलवे का कोई साधारण डिब्बा नहीं, बल्कि एक चलते-फिरते वीआईपी सुइट की तरह होता है।
- क्या-क्या मिलती हैं सुविधाएं: इस शानदार कोच के अंदर आपको दो आरामदायक बेडरूम, उठने-बैठने के लिए एक बड़ा हॉल, एक किचन और बाथरूम की सुविधा मिलती है।
- अंग्रेजों के जमाने का कॉन्सेप्ट: ब्रिटिश काल से ही ऐसे डिब्बों का इस्तेमाल रेलवे के आला अधिकारियों के लिए होता आया है। वे दूर-दराज के इलाकों में जाने या किसी रेल हादसे के बाद निरीक्षण करने के लिए इन कोचों में सफर करते थे।
- कुल कितने कोच हैं: अगर देश के सभी रेलवे जोन को मिला लिया जाए, तो ऐसे कुल 336 सैलून कोच मौजूद हैं। इनमें से 62 डिब्बे पूरी तरह से वातानुकूलित हैं।
देश के राष्ट्रपतियों का भी रहा है इससे नाता
इस खास कोच का इतिहास भारत के सर्वोच्च पद से भी जुड़ा हुआ है। राष्ट्रपति के लिए सैलून से यात्रा करने का सिलसिला सन् 1956 में शुरू हुआ था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर डॉ. जाकिर हुसैन, वीवी गिरि, डॉ. एस राधाकृष्णन और डॉ. एन संजीव रेड्डी जैसे राष्ट्रपतियों ने इसके जरिए यात्राएं कीं।
1977 के बाद इसका इस्तेमाल काफी कम हो गया। 2006 में 11वें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इसके जरिए अपनी आखिरी यात्रा की थी। साल 2008 में डिब्बों के पुराना और जर्जर होने के कारण रेलवे ने इन्हें असुरक्षित घोषित कर सेवा से बाहर कर दिया था। हालांकि, 2018 में इनकी फिर से वापसी हुई।
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अधिकारियों से आम जनता तक का सफर
एक वक्त था जब इन डिब्बों के पीछे सिर्फ रेलवे के टॉप अधिकारियों का एकाधिकार था। वे इंस्पेक्शन के लिए ट्रेनों के पीछे सैलून कोच लगवाते थे, लेकिन बाद में इस प्रथा को बंद कर दिया गया। रेलवे ने अपनी आमदनी बढ़ाने के मकसद से साल 2018 में बड़ा कदम उठाया और सैलून कोच के दरवाजे आम पब्लिक के लिए खोल दिए। अब आप भी अपने परिवार या दोस्तों के साथ किसी ट्रिप पर जाने या गांव लौटने के लिए इसे बुक कर सकते हैं।
बुकिंग का तरीका और खर्चे का पूरा हिसाब
अगर आप भी इस शाही सफर का लुत्फ उठाना चाहते हैं, तो इसके नियम और खर्चे भी थोड़े खास हैं। इसकी ऑनलाइन बुकिंग IRCTC की वेबसाइट पर जाकर 'CHARTER TRAIN' या 'एफटीआर ट्रेन' के विकल्प के जरिए की जा सकती है।
इन जरूरी बातों का रखें ध्यान:
- लाखों में होता है खर्च: आम ट्रेनों के उलट इसका किराया काफी ज्यादा होता है। रूट के अनुसार आपकी एक ट्रिप का कुल खर्च 2 से 3 लाख रुपये तक आ सकता है।
- एडवांस बुकिंग: इसके लिए आपको 30 दिन से लेकर 6 महीने पहले तक बुकिंग करानी होगी। आपके चुने गए रूट पर कोच उपलब्ध होने पर ही बुकिंग कन्फर्म होगी।
- सिक्योरिटी मनी: बुकिंग के वक्त 50,000 रुपये की भारी-भरकम राशि सिक्योरिटी डिपॉजिट के तौर पर जमा करनी पड़ती है।
- न्यूनतम दूरी: यह डिब्बा कम से कम 500 किलोमीटर की दूरी वाले सफर के लिए ही बुक किया जा सकता है।
- एक्स्ट्रा चार्ज: अगर आप तय समय से ज्यादा रुकते हैं, तो हर एक एक्स्ट्रा दिन के लिए आपको 24 हजार रुपये का चार्ज अलग से देना होगा।
- स्टाफ की सुविधा: सफर के दौरान आपकी मदद के लिए कोच में एक अटेंडेंट मौजूद रहता है। अगर आपको खाने के लिए कुक भी चाहिए, तो मांग करने पर IRCTC की तरफ से वह भी मुहैया कराया जा सकता है।
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