सैम मानेकशॉ: 1971 की भारत-पाक जंग में 'सैम बहादुर' ने दिलावाई थी जीत
सैम मानेकशॉ भारत के पहले फील्ड मार्शल थे। उन्होंने भारत-पाक 1971 के युद्ध में भारत को 13 दिनों के भीतर एक निर्णायक जीत दिलवाई थी। उन्हें सेना के अधिका ...और पढ़ें

यहां पढ़ें सैम मानेकशॉ की पूरी दांस्ता।
एजुकेशन डेस्क, नई दिल्ली। भारत के पहले फील्ड मार्शल कहे जाने वाले सैम मानेकशॉ की आज 112वीं जयंती है। सैम मानेकशॉ का जन्म आज ही के दिन 03 अप्रैल, 1914 को हुआ था। वह भारत के पहले ऐसे प्रमुख सैन्य अधिकारी थे, जिसकी बदादुरी के किस्से न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर थे।
उनके बुलंद हौसले, देश के प्रति निष्ठा व समर्पण और बहादुरी के लिए उन्हें साल 1968 में भारत सरकार की ओर से पद्म भूषण और 1972 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
सैम मानेकशॉ एक ऐसे कुशल सैन्य अधिकारी थे, जिन्होंने साल 1971 के भारत-पाक युद्ध में न केवल महत्वपू्र्ण भूमिका निभाई, बल्कि महज 13 दिनों के भीतर भारत को पाकिस्तान पर जीत भी दिलवाई। सैम मानेकशॉ का व्यक्तित्व जितना अधिक प्रभावशाली था। वह उतने ही बेबाक और हंसमुख स्वभाव के थे। यही वजह है कि सेना के अधिकारी उन्हें प्यार से 'सैम बहादुर' कहकर पुकारते थे।
पारसी परिवार में जन्म
सैम मानेकशॉ का जन्म आज ही के दिन 03 अप्रैल, 1914 में अमृतसर के एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम सैम हॉर्मुसजी फ्रामजी मानेकशॉ है। सैम के पिता डॉक्टर थे और वह चाहते थे कि उनका बेटा भी बड़ा होकर डॉक्टर ही बनें। लेकिन सैम के भीतर देशभक्ति की भावना थी। इसलिए उन्होंने देश सेवा का मार्ग चुना और भारतीय सेना में शामिल हो गए।
सैनिक प्यार से कहते थे 'सैम बहादुर'
सैम मानेकशा एक प्रभावशाली व्यक्ति के साथ-साथ अपने बेबाक अंदाज और हंसमुख स्वभाव के लिए भी जाने जाते थे। सेना के अधिकारी उन्हें प्यार से 'सैम बहादुर' कहकर पुकारते थे। बता दें, सैम मानेकशॉ ने भारतीय सैन्य अधिकारी, देहरादून के पहले बैच से प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित
सैम मानेकशॉ ने द्वितीय विश्व युद्ध में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने इस दौरान म्यांमार के मोर्चे पर जापानी सेना के खिलाफ लड़ी थी। इसी समय वह बहुत ज्यादा घायल भी हो गए थे। लेकिन उनके इसी साहस और बहादुरी को देखते हुए उन्हें मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया।

कई महत्वपूर्ण पदों पर किया काम
सैम मानेकशॉ ने अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व और बहादुरी के चलते सेना में अपनी एक अलग जगह बना ली थी। उन्होंने भारतीय सेना में न केवल कई उच्च पदों पर कार्य किया, बल्कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में सैनिकों का हौसला बढ़ाया। साथ ही उनका मार्गदर्शन भी किया। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। धीरे-धीरे सैना के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ी, जिसके बाद वह गोरखा सैनिकों के बीच भी लोकप्रिय हो गए और नेपाल ने साल 1972 में उन्हें नेपाली सेना मानद जनरल के रूप में सम्मानित किया।

रणनीति बनाने में माहिर
सैम एक बहादुर सेना अधिकारी के साथ-साथ एक महान रणनीतिकार भी थे। वह कभी भी कोई निर्णय किसी दबाव व जल्दबाजी में नहीं लेते थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भी उन पर राजनीतिक दबाव आया। लेकिन उन्होंने दबाव के बावजूद भी कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया और सैना की तैयारी के लिए अतिरिक्त समय की मांग की। इसके बाद सेना की सही ढंग से तैयारी के बाद उन्होंने युद्ध का सुव्यवस्थित ढंग से संचालन किया और भारत को महज 13 दिनों के भीतर निर्णायक जीत भी दिलावाई।

सैम की याद में विजय दिवस
सैम मानेकशा का निधन 28 जून, 2008 में हुआ था। बता दें, सेना में सेवा करने के बाद उन्होंने कई बड़ी कंपनियों के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशक और अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। इसके अलावा, साल 1971 में सैम के बदौलत भारत को मिली निर्णायक जीत की याद में हर साल भारत में 16 दिसंबर को विजय दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।