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    आने वाले सालों में बढ़ेंगे हीट स्ट्रेस के दिन, मानसून के पहले उमस भरी गर्मी बढ़ेगी

    Updated: Thu, 22 Jan 2026 11:46 AM (IST)

    भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले सालों में असहनीय गर्मी और हीट स्ट्रेस के दिनों में भारी वृद्धि होगी। एक अध्ययन के अनुसार, 2041-2070 तक हर सा ...और पढ़ें

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    नई दिल्ली, जागरण प्राइम। जलवायु परिवर्तन के चलते पूरी दुनिया में तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। नेचर जर्नल में प्रकाशित वैश्विक तापमान मॉडल-आधारित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि अगले कुछ सालों में भारत में लोगों को असहनीय गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। 1971–2000 की तुलना में 2041–2070 तक भारत में हर साल बेहद हीट स्ट्रेस वाले दिनों की संख्या 50 दिन से ज्यादा हो सकती है। बढ़ता तापमान और उमस मिलकर इंसानों के लिए बेहद खतरनाक स्थिति बनाएंगे। वहीं कार्बन और ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह उच्च स्तर पर बना रहा तो बेहद गर्मी और हीट स्ट्रेस वाले दिनों की संख्या 75 या उससे ज्यादा हो सकती है। खासकर गर्मियों और मॉनसून की शुरूआत के पहले हीट स्ट्रेस वाले दिनों की संख्या बढ़ेगी। इससे न सिर्फ स्वास्थ्य जोखिम बढ़ेंगे, बल्कि खेती, ऊर्जा और शहरी जीवन पर भी असर पड़ेगा।

    वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में दावा किया है कि 2041–2070 तक देश में 27 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा 
    हीट इंडेक्स वाले दिनों की संख्या साल में 50 दिन से ज्यादा हो सकती है। जबकि अत्यधिक खतरनाक स्तर 32 डिग्री वाले दिनों की संख्या 5 दिन या इससे ज्यादा हो सकती है। अध्ययन में शामिल आईआईटी रुड़की के डिपार्टमेंट ऑफ हाइड्रोलॉजी के वैज्ञानिक डॉक्टर अंकित अग्रवाल कहते हैं कि 1971–2000 के औसत की तुलना में आने वाले सालों में लोगों को असहनीय गर्मी का सामना करना पड़ सकता है। गर्मी बढ़ने से न केवल स्वास्थ्य जोखिम बढ़ेंगे, बल्कि खेती, बिजली की मांग, कामकाज और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर भी गंभीर असर पड़ेगा। भारत में विशेष तौर पर तटीय तथा उत्तरी इलाकों में हीट स्ट्रेस बेहद खतरनाक स्तर तक बढ़ सकता है।

    एशिया-प्रशांत डिजास्टर रिपोर्ट 2025 के मुताबिक शहरी इलाकों में तापमान अगले कुछ दशकों में सात डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। इससे शहरों में हीट स्ट्रेस, स्वास्थ्य संकट और ऊर्जा की मांग का दबाव बढ़ जाएगा। भीषण गर्मी के कारण लोगों के काम करने की क्षमता में कमी आएगी। 1995 से 2030 के बीच बढ़ी गर्मी के कारण कामकाजी घंटे 3.75 मिलियन से बढ़कर 8.1 मिलियन फुल-टाइम नौकरी के बराबर खो जाएंगे। गर्मी के चलते आर्थिक नुकसान लगभग 498 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। इस बढ़ते खतरे का सबसे अधिक असर गरीब, बच्चे और बुजुर्ग अनुभव करेंगे। उच्च-आय वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग ठंडी और हरित जगहों पर रहने वाले लोग जानलेवा गर्मी से कम प्रभावित होंगे। 

    रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव के चलते दिल्ली, सियोल, टोक्यो, बीजिंग, कराची, ढाका, मनीला और जकार्ता जैसे बड़े एशियाई शहरों में रहने वाले लोगों को आने वाले सालों में भीषण गर्मी का सामना करना पड़ेगा। अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव के चलते इन शहरों में तापमान में 2 डिग्री से 7 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा तापमान महसूस होगा। इससे स्वास्थ्य सेवाएं, पीने के पानी और शरीर को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की मांग काफी बढ़ जाएगी। वहीं गरीब और घनी बस्तियों में रहने वाले बच्चों, बुजुर्गों और खुले में काम करने वाले श्रमिकों के लिए खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।

     एनआरडीसी इंडिया के लीड, क्लाइमेट रेजिलिएंस एंड हेल्थ अभियंत तिवारी कहते हैं कि आने वाले सालों में निश्चित तौर पर तापमान बढ़ेगा। हमें इसके लिए अभी से तैयारी करने की जरूरत है। हाल के कई अध्ययनों में आने वाले समय में भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ते हीट स्ट्रेस को लेकर चिंता जताई गई है। आने वाले समय में खास तौर पर सदी के अंत तक स्थितियां और गंभीर हो सकती हैं। ऐसे में हमें अभी से बेहद सावधानी रखने की जरूरत है। हीट इंडेक्स थ्रेशहोल्ड सिर्फ बढ़ती गर्मी ही नहीं बल्कि आने वाले समय में बढ़ती बीमारियों की ओर भी इशारा करता है। बेहद हीट स्ट्रेस वाली गर्मी आने वाले समय में उत्तरी और उत्तर-पूर्वी भारत में शायद एक सामान्य मौसमी बात बन सकती है। खतरनाक हीट-स्ट्रेस लेवल की बढ़ती फ्रीक्वेंसी की संभावनाओं को देखते हुए लोगों की सेहत की सुरक्षा के लिए अगल अलग क्षेत्रों की जरूतर के आधार पर रणनीति बनाने की जरूरत है। 
    हमने 2008 से 2019 के बीच भारत के दस बड़े शहरों में हुई मौतों में हीटवेव के चलते हुई मौतों पर अध्ययन किया। हमने पाया कि हर साल औसतन लगभग 1116 लोगों को हीटवेव के चलते अपनी जान गंवानी पड़ी। ऐसे में हर साल बढ़ती गर्मी आने वाले समय में बड़ी मुश्किल पैदा कर सकती है। हमें अभी से गर्मी को ध्यान में रखते हुए हेल्थ इमरजेंसी के लिए तैयारी करने की जरूरत है। हीटवेव जैसी स्थिति में आम लोगों को राहत पहुंचाने के लिए तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है। वहीं दीर्घकालिक योजना पर भी काम करना होगा। बढ़ती गर्मी का असर इंसानों के साथ ही पशु- पक्षियों, इंडस्ट्री, अर्थव्यवस्था सभी पर पड़ता है। बच्चे, बूढ़े और ऐसे लोग जिन्हें विशेषतौर पर देखभाल की जरूरत है उनका ख्याल रखना होगा। वहीं दीर्घकालिक योजनाओं के तहत हमें ग्रीन कवर बढ़ाना होगा, जलाशयों की संख्या बढ़ानी होगी, कंक्रीट का इस्तेमाल घटाना होगा। शहरों में गर्मियों में अर्बन हीटलैंड बन जाते हैं यहां तापमान को कम करने के लिए कदम उठाने होंगे।

    हीट वेव को हल्के में नहीं लेना चाहिए। इससे आपकी जान भी जा सकती है। दिल्ली मेडिकल काउंसिल की साइंफिक कमेटी के चेयरमैन डॉक्टर नरेंद्र सैनी के मुताबिक हमारे शरीर के ज्यादातर अंग 37 डिग्री सेल्सियस पर बेहतर तरीके से काम करते हैं। जैसे जैसे तापमान बढ़ेगा इनके काम करने की क्षमता प्रभावित होगी। बेहद गर्मी में निकलने से शरीर का तापमान बढ़ जाएगा जिससे ऑर्ग्रेगन फेल होने लगेंगे। शरीर जलने लगेगा, शरीर का तापमान ज्यादा बढ़ने से दिमाग, दिल सहित अन्य अंगों की काम करने की क्षमता कम हो जाएगा। यदि किसी को गर्मी लग गई है तो उसे तुरंत किसी छाया वाले स्थान पर ले जाएं। उसके पूरे शरीर पर ठंडे पानी का कपड़ा रखें। अगर व्यक्ति होश में है तो उसे पानी में इलेक्ट्रॉल या चीनी और नमक मिला कर दें। अगर आसपास अस्पताल है तो तुरंत उस व्यक्ति को अस्पताल ले जाएं।


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    इंटीग्रेटेड रिसर्च एंड एक्शन फॉर डेवलपमेंट के डिप्टी डायरेक्टर रोहित मगोत्रा के मुताबिक 21वीं सदी में हीट वेव की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने की संभावना है। हाल ही में आई 6 वीं आईपीसीसी रिपोर्ट में पृथ्वी की सतह के 2.0 डिग्री फ़ारेनहाइट (1.1 डिग्री सेल्सियस) के आसपास गर्म होने पर चेतावनी दी गई है। इससे भविष्य में वैश्विक औसत तापमान और हीटवेव में वृद्धि होगी।
     

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    जलवायु परिवर्तन के चलते पूरी दुनिया में गर्मी बढ़ी है। मौसम वैज्ञानिक समरजीत चौधरी कहते हैं कि पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन के चलते मौसम में बदलाव देखा जा रहा है। कई अध्ययन इस बात की आशंका जता रहे हैं कि आने वाले दिनों में गर्मी और बढ़ेगी। वहीं एक्स्ट्रीम वेदर कंडीशन देखने को मिलेगी। ऐसे में हालात की गंभीरता को देखते हुए कदम उठाए जाने की जरूरत है। यूरोप की कोपरनिकस जलवायु परिवर्तन सेवा के मुताबिक मार्च 2024-फरवरी 2025 के दौरान तापमान 1990-2020 के औसत से 0.71 डिग्री सेल्सियस अधिक और पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 1.59 डिग्री सेल्सियस अधिक था।