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    GDP के लिए खतरा बनी 'डिजिटल लत'! इकोनॉमिक सर्वे की 8 सिफारिशें बदल देंगी आपके बच्चे की जिंदगी

    Updated: Fri, 30 Jan 2026 07:43 PM (IST)

    Economic Survey 2026 digital addiction report: इकोनॉमिक सर्वे 2026 ने पहली बार डिजिटल लत को केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक संकट करार दिया है। सर्वे म ...और पढ़ें

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    इकोनॉमिक सर्वे में पहली बार डिजिटल लत को बताया गया देश की बर्बादी का कारण। ग्राफिक - अमन सिंह

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    डिजिटल डेस्‍क, नई दिल्‍ली। संसद में बजट से ठीक तीन दिन पहले 29 जनवरी को इकोनॉमिक सर्वे पेश किया गया। पहली बार सरकार ने देश की आर्थिक तस्वीर में शारीरिक-मानसिक सेहत को भी शामिल किया गया है।

    बच्चों और युवाओं में बढ़ती डिजिटल लत को सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और मानसिक सेहत के लिए खतरा बताया है। यही वजह है कि छात्रों को साधारण फोन देने और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के लिए उम्र सीमा तय करने जैसी बड़ी सिफारिशें भी की हैं। कहा- 'आने वाले समय में इसका असर जीडीपी पर पड़ सकता है।'

    देश के इकोनॉमिक सर्वे में डिजिटल लत को लेकर क्या  गया है, कितना बड़ा खतरा है, सरकार क्या करने जा रही है और दुनिया के देशों ने क्या कदम उठाए हैं? इन सभी सवालें के जवाब यहां पढ़ें...

    डिजिटल लत पर क्‍या कहता है इकोनॉमिक सर्वे?

    देश में बच्चे और युवा तेजी से डिजिटल दुनिया की गिरफ्त में आ रहे हैं। वे अपने समय का बड़ा हिस्सा स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिता रहे हैं। इसका असर उनकी मानसिक सेहत, व्यवहार, पढ़ाई और करियर पर पड़ रहा है।

    चिंता की बात यह है कि डिजिटल लत लगातार बढ़ रही है। इससे बच्चों और युवाओं में बेचैनी, तनाव, नींद की कमी, ध्यान लगाने में परेशानी, पढ़ाई और काम करने की क्षमता में गिरावट देखी जा रही है।  

    सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेमिंग पर जरूरत से ज्यादा समय व पैसा खर्च करना, साइबर फ्रॉड का शिकार होना और काम में ध्यान कम होने जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। सामाजिक सहभागिता और समुदायिक जुड़ाव घट रहा है, जिससे समाज की सामाजिक पूंजी को कमजोर हो रही है।

    अगर सिर्फ सोशल मीडिया की बात की जाए तो यह डिप्रेशन, अकेलेपन की भावना, आत्मसम्मान में कमी, साइबर बुलिंग और आत्महत्या के खतरे को बढ़ाने वाला कारक बन गया है।  यह सिर्फ व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि अगर यह प्रवृत्ति बढ़ती रही तो इसका असर देश की अर्थव्यवस्था और भविष्य की उत्पादकता पर भी पड़ सकता है।

    Digital addiction

    देश के युवा और बच्चों का स्क्रीन टाइम

    • 0–2 साल: औसतन 1.2 घंटे/दिन स्क्रीन टाइम
    • 2–5 साल: औसतन 2.22 घंटे/दिन स्क्रीन के सामने
    • 6–12 साल: 2 से 4 घंटे/दिन स्क्रीन देखने का समय
    • 13–18 साल: औसतन 3–6 घंटे/दिन, कई मामलों में 8 घंटे से ज्यादा
    • 18–24 साल: औसतन 5–8 घंटे/दिन, कई मामलों में 10 घंटे से ज्यादा


    डिजिटल एडिक्शन से निपटने के लिए क्‍या सुझाव?

    इकोनॉमिक सर्वे में डिजिटल एडिक्शन से निपटने के लिए सरकार और समाज को कई सुझाव भी दिए गए हैं..

    •  स्टूडेंट्स को स्मार्टफोन की जगह साधारण फोन दिया जाए।
    •  सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के लिए उम्र सीमा तय की जाए।
    • स्कूलों में साइबर सेफ्टी और डिजिटल लिटरेसी पढ़ाई जानी चाहिए
    • बच्चों का स्‍क्रीन टाइम कंट्रोल किया जाए।
    • फिजिकल एक्टिविटीज को बढ़ावा दिया जाए।
    • डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
    • ऑनलाइन क्लासेस कम और बेहद जरूरी होने पर की जाएं।

    physical activities


    देश को अब डिजिटल वेल-बीइंग पर पॉलिसी बनानी होगी। इसमें सोशल मीडिया नियम, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही, स्कूल स्तर पर डिजिटल हेल्थ एजुकेशन और राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल बिहेवियर पॉलिसी को शामिल करना चाहिए। अब सवाल आता है कि क्यों जरूरी है? जवाब है- 75% छात्रों ने माना कि स्टडी करते समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, जो ध्यान भटकाता है।

    सर्वे में कहा गया-

    डिजिटल तकनीक से पढ़ाई और नौकरी के नए मौके मिले हैं, लेकिन अब जरूरी है कि ध्यान इस बात पर दिया जाए कि लोग डिजिटल दुनिया का सही इस्तेमाल करें और मानसिक सेहत का ख्याल रखें, ताकि भारत के युवा डिजिटल भविष्य के साथ स्वस्थ और काम करने में सक्षम रह सकें।

    इकोनॉमी पर डिजिटल लत का असर?

    देश में पहली बार डिजिटल लत (Digital Addiction) को आर्थिक जोखिम के तौर पर देखा गया है। इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक-

    • पढ़ाई और नई स्किल सीखने में रुकावट आने से जॉब पाने की क्षमता कम हो सकती है।
    • लोग बिना सोचे-समझे ऑनलाइन खरीदारी और गेमिंग पर ज्यादा पैसा खर्च कर सकते हैं।
    • साइबर ठगी से लोगों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।
    • काम पर ध्यान कम होने से वर्क एबिलिटी कमजोर होगी और प्रोडक्टिविटी घटेगी।

    अगर इस डिजिटल व्यवहार को कंट्रोल नहीं किया गया तो यह भविष्य में देश की  प्रोडक्टिविटी और GDP पर असर डाल सकती है।

    Economic Survey

    सोशल मीडिया को लेकर दुनिया भर में क्‍या हैं नियम?

    भारत में डिजिटल एडिक्शन से निपटने के लिए अब सोशल मीडिया के लिए नियम बनाने की बात हो रही है, जबकि  चीन, मिस्र, ईरान, उत्तर कोरिया, सऊदी अरब और सीरिया जैसे कई देशों में इंटरनेट मीडिया को लेकर पहले से ही कड़ी पाबंदियां हैं। इनमें से कई देशों में रोक अस्थायी होती है, जैसे- चुनाव या विरोध प्रदर्शन के दौरान आदि।

    कुछ देशों में पाबंदी स्‍थायी है और उसके लिए कड़े कानून भी बनाए गए हैं। भारत ने 2020 में टिकटॉक समेत कई एप को बैन किया था, लेकिन चीनी एप के तौर पर, न कि बच्‍चों की सुरक्षा के लिए।

    ऑस्ट्रेलिया में बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन

    दुनिया भर के कई देशों में इंटरनेट और सोशल मीडिया को लेकर नियम हैं और बैन भी है। इन सबसे अलग आस्ट्रेलिया में बच्चों (16 साल से कम) के लिए इंटरनेट मीडिया पर पाबंदी है।  16 साल से कम उम्र वाले बच्चे और किशोर टिकटॉक, इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स और स्नैपचैट नहीं चला सकते हैं।

    फेक न्‍यूज पर सख्‍त ब्राजील

    ब्राजील ने 2024 में एक्स को अस्थायी तौर पर बैन कर दिया था, क्‍योंकि कंपनी देश के एंटी-डिसइंफॉर्मेशन  कानूनों का पालन नहीं कर रही थी। ब्राजील सरकार के मुताबिक, टेक कंपनियों को चुनाव और स्वास्थ्य से जुड़ी फेक न्यूज पर ज्यादा सख्त कदम उठाने चाहिए।

    sociak media Banned

    चीन का ‘ग्रेट फायरवाल’

    चीन में फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे बड़े प्लेटफार्म पूरी तरह बैन हैं। चीनी लोग वीचैट और वीबो जैसे घरेलू एप यूज करते हैं, जिनकी सरकार सख्ती से निगरानी करती है।

    उत्तर कोरिया में  इंटरनेट बैन

    उत्तर कोरिया में आम लोगों के लिए इंटरनेट मीडिया पूरी तरह बैन है। यहां जनता सिर्फ 'क्वांगमयोंग' नाम के सरकारी इंट्रानेट का ही इस्तेमाल करती है। किसी विदेशी डिजिटल प्लेटफार्म का यूज करना जेल में डलवा सकता है।

    ईरान में वीपीएन का सहारा

    ईरान में फेसबुक, एक्स और यूट्यूब पर पाबंदी है। यहां लोगा सोशल मीडिया यूज करने के लिए वीपीएन यूज करते हैं, लेकिन यह कानूनी जोखिमों से भरा है।

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    खाड़ी देशों में सख्त निगरानी

    सऊदी अरब और यूएई में इंटरनेट मीडिया का इस्तेमाल तो होता है, लेकिन सरकारें सख्त निगरानी करती हैं।  यहां शाही परिवार या धार्मिक मूल्यों की आलोचना करने पर गिरफ्तारी और सजा तक हो सकती है।

    रूस-तुर्किये में इंटरनेट स्पीड कम की

    तुर्किये कई बार ट्विटर, फेसबुक और यूट्यूब यूज न हो सके, इसके लिए इंटरनेट स्पीड बहुत कम कर देता है या फिर ब्लॉक कर देता है। रूस ने 'सावरेन इंटरनेट कानून' बनाया है, जिसके तहत जरूरत पड़ने पर देश को पूरी तरह इंटरनेट से काटा जा सकता है।

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    मिस्र और वियतनाम: सरकार के खिलाफ लिखने पर जेल

    मिस्र में जिन इंटरनेट मीडिया यूजर्स के 5,000 से ज्यादा फॉलोअर्स हैं, उन्हें सरकार के साथ रजिस्टर करना पड़ता है। वहीं वियतनाम में प्लेटफार्म को सरकार विरोधी कंटेंट हटाना अनिवार्य है और डाटा लोकल स्टोर करना पड़ता है। अगर इसके बावजूद सरकार विरोधी लिखा तो जेल भी हो सकती है। 


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