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    कर्जमाफी से किसानों का भला या सिर्फ चुनावी दांव? 35 साल में खर्च हुए 3 लाख करोड़, फिर भी बदहाल है अन्नदाता; पढ़ें पूरी रिपोर्ट

    Updated: Mon, 16 Mar 2026 08:55 PM (IST)

    Farmer Loan Waivers:भारत में किसान कर्जमाफी योजनाओं पर 35 सालों में 3 लाख करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, लेकिन इनसे किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं ...और पढ़ें

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    डिजिटल डेस्‍क, नई दिल्‍ली। किसानों के लिए कर्जमाफी की स्कीमों का सिलसिला जारी है। अब महाराष्ट्र ने अपने चुनावी वादे को पूरा करते हुए किसानों का कर्ज माफ करने वाली स्कीम की घोषणा की है। भारत में किसान कर्जमाफी का लंबा इतिहास है और इसने राज्यों के वित्तीय प्रबंधन को कमजोर करने के अलावा किसानों की आर्थिक हैसियत में कोई सुधार नहीं किया है।

    रिजर्व बैंक ने चेताया है कि अलग-अलग राज्यों में चुनावी वादे के तौर पर आने वाली कर्जमाफी की स्कीमों ने कृषि के क्षेत्र में क्रेडिट कल्चर को बरबाद किया है। इससे किसानों को इस बात के लिए प्रोत्साहन मिलता है कि वह कर्ज न चुकाएं और कर्जमाफी स्कीमों का इंतजार करें। वहीं, इस तरह की स्कीमों को देखते हुए बैंक भी किसानों को कर्ज देने से कतराते हैं।

    दशकों का अनुभव यह बताता है कि कर्जमाफी स्कीमों से किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ है। जरूरत किसानों को डायरेक्ट इनकम सपोर्ट मुहैया कराने की है। कृषि सुधारों में डायरेक्ट इनकम सपोर्ट की बात कही गई है।

    केंद्र सरकार किसानों को सालाना 6,000 रुपये मुहैया करा रही है, लेकिन रकम बहुत कम है। ऐसे में सवाल है कि कर्जमाफी स्कीमों के बजाय केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर किसानों को नियमित वित्तीय मदद देने वाली योजनाएं क्यों नहीं लाती हैं, जिससे किसान आधुनिक खेती को अपना कर अपनी माली हालत को बेहतर बना सकें...

    Farmer

    कृषि ऋण माफी योजनाओं पर कितना खर्च हुआ?

    साल 2014–15 के बाद से कृषि ऋणमाफी योजनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि, 1990 के बाद से केंद्र सरकार ने केवल दो राष्ट्रीय स्तर की कर्ज माफी योजनाएं शुरू की हैं। अधिकांश योजनाएं राज्य सरकारों द्वारा घोषित की गई हैं। पिछले 35 वर्षों में केंद्र और राज्यों ने मिलकर लगभग ₹3 लाख करोड़ रुपये कृषि ऋणमाफी योजनाओं पर खर्च किए हैं। इन स्कीमों के प्रभाव और किसानों की स्थिति में सुधार के लिए वैकल्पिक उपायों का अवलोकन कर रहे हैं, पढ़ें पूरी रिपोर्ट 

    ऋणमाफी और चुनावी राजनीति

    अक्सर कृषि ऋणमाफी योजनाएं चुनावों के आसपास घोषित की जाती हैं। आरबीआई के 2019 के इंटरनल वर्किंग ग्रुप के अनुसार, साल 1990 और 2008 की राष्ट्रीय ऋणमाफी योजनाएं तथा 2014 के बाद कई राज्यों में योजनाएं चुनावों के समय घोषित की गई थीं।

    • 10,000 करोड़ लगभग ₹थी लागत 1990 की योजना में (2016–17 की कीमतों पर लगभग ₹50,600 करोड़)।
    • 52,500 करोड़ लगभग थी लागत 2008 की योजना में (2016–17 की कीमतों पर लगभग ₹81,200 करोड़)।

    कृषि ऋण पर प्रभाव

    • ऋण माफी के बाद कुछ समय के लिए कृषि ऋण वृद्धि धीमी हो जाती है।
    • बाद में ऋण वितरण धीरे-धीरे सामान्य हो जाता है।

    आरबीआई की क्‍या राय है?

    • आरबीआई बार-बार कृषि ऋण माफी का विरोध करता रहा है।
    • उसका तर्क है कि इससे क्रेडिट अनुशासन कमजोर होता है।
    • किसान भविष्य में माफी की उम्मीद में ऋण चुकाने में देरी कर सकते हैं।
    • इससे किसानों की क्रेडिट हिस्ट्री खराब होती है।
    • भविष्य में नया ऋण प्राप्त करना कठिन हो जाता है।

    क्‍या सरकार को इससे फायदा होता है?

    • नहीं, ऋणमाफी की योजनाएं सरकारी वित्त पर बड़ा दबाव डालती हैं।
    • राज्यों के राजस्व व्यय में लगभग 5 आाधार अंक की वृद्धि ऋणमाफी के कारण हुई।

    क्‍या किसान कर्जमाफी लाभ मिलता है?

    आरबीआई वर्किग ग्रुप के अनुसार, ऋणमाफी पर खर्च होने वाला पैसा यदि कृषि क्षेत्र में बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक विकास में लगाया जाए तो अधिक लाभकारी हो सकता है़, जबकि ऋणमाफी का बहुत सीमित और अल्पकालिक प्रभाव होता है।

    केंद्र सरकार की कृषि ऋणमाफी योजनाएं

    1. कृषि एवं ग्रामीण ऋण राहत योजना, 1990

    यह पहली बड़ी राष्ट्रीय कृषि ऋणमाफी योजना थी। इसमें 2 अक्टूबर 1989 तक के अल्पकालिक ऋण और अवधि ऋण की बकाया किश्तें शामिल थीं। यह योजना सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के ऋणों पर लागू थी। प्रत्येक किसान को ₹10,000 रुपये तक की राहत दी गई। इसमें भूमि के आकार के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था।

    2. कृषि ऋणमाफी और ऋण राहत योजना, 2008

    योजना का दायरा और बढ़ाया गया। इस योजना में छोटे और सीमांत किसानों (5 एकड़ तक भूमि) को बड़े किसानों की तुलना में अधिक लाभ दिया गया। इसकी वित्तीय लागत 52,500 करोड़ रुपये थी।

    राज्यों की कृषि ऋण माफी योजनाएं

    राज्य योजना का नाम वर्ष मुख्य लाभ
    महाराष्ट्र महात्मा फुले शेतकरी कर्जमुक्ति योजना 2019 किसानों के फसल ऋण में लगभग 2 लाख तक की माफी।
    तेलंगाना तेलंगाना किसान ऋण माफी योजना 2024 किसानों के कृषि ऋण 2 लाख तक माफ।
    उत्तर प्रदेश यूपी फसल ऋण मोचन योजना 2017 छोटे और सीमांत किसानों के 1 लाख तक के ऋण माफ।
    पंजाब पंजाब कृषि ऋणमाफी योजना 2017 छोटे किसानों के 2 लाख तक के ऋण माफ।
    कर्नाटक कर्नाटक किसान ऋणमाफी योजना 2018 सहकारी व वाणिज्यिक बैंकों से लिए गए 2 लाख तक के ऋण माफ।
    राजस्थान राजस्थान किसान ऋणमाफी योजना 2017 किसानों के 50,000 तक के फसल ऋण माफ।
    मध्य प्रदेश जय किसान फसल ऋणमाफी योजना 2018 किसानों के 2 लाख तक के फसल ऋण माफ।
    छत्तीसगढ़ कृषि ऋणमाफी योजना 2018 अल्पकालीन कृषि ऋण माफ।
    तमिलनाडु सहकारी बैंक कृषि ऋणमाफी योजना 2016 सहकारी बैंकों से लिए गए फसल ऋण पूरी तरह माफ
    आंध्र प्रदेश एपी फसल ऋणमाफी योजना 2014 किसानों के 1.5 लाख तक के ऋण माफ।

    SBI की रिपोर्ट में क्‍या कहा गया?

    2014 के बाद लगभग 3.7 करोड़ पात्र किसानों में से मार्च 2022 तक केवल लगभग 50 प्रतिशत को ही ऋणमाफी का लाभ मिला।

    • इससे योजना की प्रभावशीलता सीमित हो गई।
    • ऋणमाफी किसानों की समस्याओं को पूरी तरह हल नहीं कर पाई।
    • कुछ क्षेत्रों में क्रेडिट अनुशासन कमजोर हुआ।

    किसानों के लिए वैकल्पिक समाधान

    • एसबीआइ की रिपोर्ट के अनुसार, इनकम सपोर्ट स्कीमें बेहतर विकल्प हो सकती हैं।
    • इससे अधिक किसानों को लाभ मिल सकता है और उन्हें स्थिर आर्थिक सहायता मिल सकती है।

    रिपोर्ट का निष्कर्ष

    • कृषि ऋणमाफी दीर्घकालिक समाधान नहीं है
    • नीतियों का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना होना चाहिए।
    • राष्ट्रीय स्तर की इनकम सपोर्ट स्कीमें अधिक प्रभावी हो सकती हैं।

    क्‍या कहती है जनता?

    मोहन वर्मा कहते हैं-

    किसान कर्ज माफी योजनाएं राज्यों में चुनाव जीतने का मंत्र बन गई हैं। राज्य सरकारें चुनाव से कुछ महीने पहले किसानों से कर्ज माफी का वादा करती हैं और चुनाव जीत कर सरकार बनाने के बाद आधा अधूरा वादा पूरा करके हाथ खड़ा कर लेती हैं। पिछले एक दशक में राज्यों में कर्ज माफी चलन जोर पकड़ रहा है। इस तरह की योजनाओं से वे किसान ठगा हुआ महसूस करते हैं जो समय पर कर्ज चुका होते हैं। जाहिर है कि ऐसी योजनाओं से किसानों का कोई भला नहीं हो रहा है उलटा राज्य का विकास जरूर प्रभावित होता है।

    सनातन पासवान कहते हैं-

    राजनीतिक दलों ने कर्ज माफी की योजनाओं को किसानों का आक्रोश शांत करने का एक हथियार बना लिया है। कर्ज माफी के बजाए जरूरत है कि किसानों को आधुनिक तकनीक और वित्तीय सहायता मिले। इससे वह खेती में पैदावार बढ़ा कर बेहतर मुनाफा हासिल कर सकते हैं, लेकिन इस दिशा में राज्य और केंद्र सरकारें उदासीन हैं। केंद्र सरकार भी हर साल फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाकर अपनी पीठ थपथपाती है, लेकिन देश के ज्यादातर किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।

    मुरली मिश्र कहते है-

    केंद्र और राज्य सरकारों को किसानों का कर्ज माफ करने के बजाए कृषि क्षेत्र में शोध एवं टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना चाहिए। इससे लंबी अवधि में किसानों की आय में इजाफा होगा और देश की जीडीपी में कृषि का योगदान भी बढ़ेगा। कृषि क्षेत्र में शोध के मामले में हम विकसित देशों की तुलना में बहुत पीछे हैं। यही कारण है कि इन देशों की तुलना में हमारे यहां प्रति हेक्टेयर उपज काफी कम है।

     

    क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट?

    रणनीति बनाने पर हो काम

    कृषि क्षेत्र में कीमतों को ध्यान में रखते हुए ग्रोथ की रणनीति पर काम हो रहा है। सब्सिडी पर भी सरकार काफी पैसा खर्च कर रही है, लेकिन इससे कृषि क्षेत्र को मजबूती नहीं मिल रही है। इसके बजाए टेक्नोलॉजी और प्रति हेक्टेयर उपज बढ़ाने पर जोर दिया जाना चाहिए। - प्रो. रमेश चंद सदस्य, नीति आयोग

    ऋणमाफी योजनाएं समाधान नहीं

    करीब तीन दशक के अनुभव से यह साबित हो चुका है कि कृषि ऋणमाफी योजनाएं किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रही हैं। इसके बजाय सरकारों को किसानों के लिए डायरेक्ट इनकम सपोर्ट स्कीमें लाने पर ध्यान देना चाहिए। इससे कृषि क्षेत्र में उत्पादकता में सुधार के लिए किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। - प्रो. आरएस देशपांडे, एफआईएसएई, एफकेएसटीए

     

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