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    इथेनॉल ले रहा पेट्रोल-डीजल की जगह! 140 साल में बदल गई दुनिया की रफ्तार; भारत के लिए क्यों जरूरी है ये ईंधन?

    Updated: Mon, 08 Jun 2026 09:40 PM (IST)

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    भारत क्यों इथेनॉल को मान रहा मोबिलिटी का 'गेम चेंजर'

    भारत क्यों इथेनॉल को मान रहा मोबिलिटी का 'गेम चेंजर'

    गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। कल्पना कीजिए कि आप 140 साल पहले की दुनिया में खड़े हैं। सड़कों पर घोड़ों की टापें सुनाई देती हैं। लोग बैलगाड़ियों और घोड़ागाड़ियों से सफर करते हैं। न कोई हॉर्न सुनाई देता है, ना ट्रैफिक जाम है और ना ही पेट्रोल पम्प। यात्रा का मतलब था घोड़ा, बैलगाड़ी या भाप से चलने वाले भारी-भरकम वाहन।

    उस दौर में किसी ने यह सोचा भी नहीं था कि एक दिन बिना घोड़े के चलने वाली मशीन पूरी दुनिया की तस्वीर बदल देगी। लेकिन 1885 में जर्मनी के एक इंजीनियर ने ऐसा कर दिखाया, नाम था कार्ल बेंज़।  

    फ्लैशबैक में आज बात ऑटोमोबाइल की दुनिया के Fifth Revolution की। World’s First Car से लेकर भारत की पहली स्वदेशी कार तक का सफर। कैसे हॉर्स पावर ने टेक्नोलॉजी का रूप लिया, कैसे इंजन और फ्यूल बदलते गए और कैसे इथेनॉल फ्यूचर मोबिलिटी का नया चेहरा बनता जा रहा है। उस देश की भी कहानी, जिसने आज से 51 साल पहले ही इथेनॉल पावर्ड व्हीकल्स का सपना देख लिया था। और क्यों…. भारत अब इथेनॉल को मोबिलिटी का गेम चेंजर मान रहा है?  

    1885 में जर्मनी के इंजीनियर कार्ल बेन्ज़ ने एक ऐसी मशीन बनाई, जिसने दुनिया की रफ्तार हमेशा के लिए बदल दी। तीन पहियों वाली इस मशीन का नाम था Benz Patent-Motorwagen। इसमें पेट्रोल इंजन लगा था और यह बिना घोड़े के अपने दम पर चल सकती थी। 1886 में कार्ल बेन्ज़ को इसका पेटेंट मिला और इसी पल को मॉडर्न ऑटोमोबाइल इंडसट्री की शुरुआत माना जाता है।

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    आज की कारों में एयरबैग, एसी, जीपीएस और सेंसर होते हैं। लेकिन पहली कार में इनमें से कुछ भी नहीं था। फिर भी उसमें कई ऐसी तकनीकें थीं जो आज भी कारों का आधार हैं- 

    उदाहरण के लिए-

    • इंटरनल कंबशन इंजन
    • इलेक्ट्रिक इग्निशन
    • ब्रेकिंग सिस्टम
    • डिफरेंशियल
    • चेन ड्राइव
    • कार्ब्यूरेटर
    • स्टील फ्रेम 

    यानी मॉडर्न कार्स की नींव उसी मोटरवैगन में रखी गई थी। उस दौर में लोगों के लिए यह किसी जादू से कम नहीं था। बिना घोड़े के चलने वाली गाड़ी देखकर कई लोग हैरान थे, कुछ तो डर भी गए। लेकिन इस नई तकनीक की असली टेस्ट ड्राइव अभी बाकी थी।

    जब बर्था बेन्ज़ ने की 106 किमी की लंबी यात्रा

    1888 में कार्ल बेन्ज़ की पत्नी बर्था बेन्ज़ ने मोटरवैगन को लेकर करीब 106 किलोमीटर की लंबी यात्रा पर निकलने का फैसला किया। यह दुनिया की पहली Long-Distance Automobile Journey मानी जाती है।

    • सफर आसान नहीं था। रास्ते में फ्यूल खत्म हो गया तो बर्था ने एक मेडिकल स्टोर से लिग्रोइन खरीदा, जो उस समय पेट्रोल जैसा ईंधन था।
    • कहीं फ्यूल लाइन चोक हुई तो अपनी हेयर पिन निकालकर उसे साफ किया और ब्रेक्स में दिक्कत आई तो जूते के चमड़े से उसे ठीक किया।
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    Courtesy: The Mercedes-Benz Group.

    इस जर्नी ने दुनिया को दिखा दिया कि कार कोई Scientific Experiment या Laboratory Toy नहीं, बल्कि Future of Transportation है। यहीं से शुरू हुई ऑटोमोबाइल रिवॉल्यूशन की वो कहानी, जिसने पूरी दुनिया को पहियों पर दौड़ाना शुरू कर दिया।

     

    जरा सोचिए, 1885 से पहले अगर किसी को 100 किलोमीटर दूर जाना होता था, तो पूरा दिन निकल जाता था। स्पीड का मतलब था घोड़े की रफ्तार। जितना तेज घोड़ा, उतनी तेज यात्रा। लेकिन जैसे ही कार आई, दुनिया बदलने लगी। शुरुआत में लोग इस मशीन को हैरानी से देखते थे। कई लोगों को लगता था कि बिना घोड़े की गाड़ी ज्यादा दिन चल ही नहीं पाएगी। लेकिन आने वाले सालों में कार ने साबित कर दिया कि फ्यूचर उसी का है।

    1908 में अमेरिका के Henry Ford ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री की दिशा बदल दी। उन्होंने Ford Model T लॉन्च की और फिर Assembly Line Technique को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। पहले एक कार बनाने में कई दिन लग जाते थे, लेकिन अब वही काम कुछ घंटों में होने लगा।

    नतीजा यह हुआ कि कारें सस्ती होने लगीं और धीरे-धीरे आम लोगों की पहुंच में आने लगीं। अब कार सिर्फ अमीरों की शान नहीं रही, बल्कि आम आदमी की जरूरत बनने लगी। लोगों को पहली बार लगा कि वे अपनी मर्जी से कहीं भी जा सकते हैं। कार सिर्फ एक वाहन नहीं, बल्कि आजादी का नया एहसास बन गई।

    कार आई तो शहरों का नक्शा भी बदला

    कारों की संख्या बढ़ी तो शहरों का नक्शा भी बदलने लगा। चौड़ी सड़कें बनीं, हाईवे तैयार हुए, पेट्रोल पंप खुले और रोड ट्रिप जैसा नया कल्चर शुरू हुआ। जिन जगहों तक पहले पहुंचना मुश्किल था, वहां तक लोग आसानी से पहुंचने लगे। लेकिन बदलाव सिर्फ सड़कों तक सीमित नहीं था।

    एक कार के साथ कई नई इंडस्ट्रीज भी तेजी से बढ़ने लगीं। स्टील, रबर, टायर, ग्लास, ऑयल, इंश्योरेंस और रोड कंस्ट्रक्शन जैसे सेक्टर्स को नई रफ्तार मिली। लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी इंडस्ट्रीज में से एक बन गई।

    समय के साथ कंपनियों के बीच बेहतर कार बनाने की रेस शुरू हो गई। पहले फोकस ज्यादा स्पीड पर था, फिर कम्फर्ट और सेफटी पर। सीट बेल्ट, बेहतर ब्रेकिंग सिस्टम, मजबूत बॉडी और नई टेक्नोलॉजी वाली कारें बाजार में आने लगीं।

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    AI Generated 

    लेकिन 1970 के दशक में दुनिया को एक बड़े ऑयल क्राइसिस का सामना करना पड़ा। तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और पहली बार यह सवाल उठने लगा कि क्या भविष्य हमेशा पेट्रोल के भरोसे चल सकता है? यहीं से फ्यूल इनोवेशन की नई कहानी शुरू हुई।

    इसके बाद इंजीनियर्स ने ऐसे इंजन बनाने शुरू किए जो कम ईंधन में ज्यादा दूरी तय कर सकें। बेहतर डीजल इंजन आए, टर्बोचार्डर आए और फिर इलेक्ट्रॉनिक ने कारों के भीतर अपनी जगह बना ली। धीरे-धीरे कारें सिर्फ मकैनिकल मशीन नहीं रहीं।

    • उनमें सेंसर्स, कम्प्यूटर्स और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल सिस्टम आने लगे। इंजन खुद तय करने लगा कि कितना फ्यूल इस्तेमाल करना है और कितनी पावर पैदा करनी है। एक तरह से गाड़ियां पहले से कहीं ज्यादा स्मार्ट होती चली गईं।
    • आज ऑटोमोबाइल रिवोल्यूशन अपने सबसे दिलचस्प दौर में खड़ी है। दुनिया इलेक्ट्रिक व्हीकल, हाइब्रिड कार, हाइड्रोजन फ्यूल सेल, कनेक्टिड कार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों पर काम कर रही है।
    • यानी 1885 में तीन पहियों वाली एक साधारण Motorwagen से शुरू हुई यात्रा अब स्मार्ट मोबिलिटी के दौर में पहुंच चुकी है। लेकिन इस पूरे सफर में एक चीज कभी नहीं बदली… वो थी बेहतर की तलाश।
    • पहले लक्ष्य ज्यादा स्पीड का था, फिर ज्यादा कम्फर्ट, उसके बाद ज्यादा माइलेज और अब फोकस है क्लीन फ्यूल और सस्टेनेबल मोबिलिटी पर। यही वजह है कि आज पूरी दुनिया ऐसे ईंधन की तलाश में है जो सस्ता भी हो, पर्यावरण के लिए बेहतर भी हो और भविष्य की जरूरतों को भी पूरा कर सके। और इसी नई मोबिलिटी रिवोल्यूशन का एक बड़ा हिस्सा बनने जा रहा है भारत।

    भारत में पहली कार कब आई?

    दुनिया में कार का आविष्कार 1885 में हुआ, लेकिन भारत तक पहुंचने में कुछ साल लगे। इतिहासकार मानते हैं भारत में पहली कार 1897 के आसपास पहुंची थी। यह कार तत्कालीन ब्रिटिश शासन के दौरान मुंबई यानी तब के बंबई में लाई गई थी। उस समय भारत की सड़कें कारों के लिए तैयार नहीं थीं। घोड़ागाड़ियां और बैलगाड़ियां ही मुख्य साधन थीं।

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    Ford Model T उस दौर की पॉपुलर कार

    कई जगह लोग कार को ‘बिना घोड़े की गाड़ी’ कहते थे। इसलिए सड़क पर चलती कार को देखकर लोग हैरान रह जाते थे। अगर भारत में बनी पहली कार की बात करें तो सबसे पहले नाम आता है हिंदुस्तान मोटर्स की एम्बेसडर का। 1957 में बाजार में आई एम्बेसडर ब्रिटिश मॉरिस ऑक्सफोर्ड पर आधारित थी लेकिन उसका उत्पादन भारत में हुआ।

     

    अगले कई दशकों तक यह भारत की पहचान बन गई। मंत्रियों, अधिकारियों, टैक्सी ड्राइवर्स और आम लोगों तक  हर किसी की पसंद एम्बेसडर थी। उस दौर में कार खरीदना एक लग्जरी माना जाता था और एम्बेसडर इंडियन मिडिल क्लास के सपनों की कार थी। यही वजह थी कि एक समय इसे ‘King of Indian Roads’ कहा जाने लगा। 

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    1998 का भारत याद किया जाए तो सड़कों पर एंबेसडर और मारुति 800 का दबदबा था। हालांकि, पूरी तरह भारतीय डिजाइन वाली कार की बात करें तो 1998 में लॉन्च हुई टाटा इंडिका को भारत की पहली रियलिस्टिक स्वदेशी पैसेंजर कार माना जाता है। जब टाटा इंडिका लॉन्च हुई तो कई एक्सपर्ट्स ने कहा था कि भारतीय कंपनी कार निर्माण में सफल नहीं हो पाएगी।

    लेकिन इंडिका ने इतिहास बदल दिया। रतन टाटा ने भी अपने एक बयान में कहा था कि इंडिका बनाना उनकी लाइफ की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था। 

    इथेनॉल है क्या?

    एक सवाल और भी काफी लोगों के मन में जो चल रहा है वो ये कि आखिर इथेनॉल है क्या?

    • आसान शब्दों में कहें तो इथेनॉल एक ऐसा ईंधन है जो गन्ने, मक्का और दूसरी कृषि फसलों से बनाया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।
    • यानी जिस ईंधन के लिए आज भारत को हजारों किलोमीटर दूर तेल उत्पादक देशों की ओर देखना पड़ता है, उसका एक हिस्सा हमारे अपने खेतों से भी आ सकता है।
    • भारत हर साल अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में विदेशों से खरीदता है। इस पर भारी रकम खर्च होती है। अगर पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ती है और इथेनॉल पावर्ड वाहन बढ़ते हैं, तो देश का तेल आयात कम हो सकता है।
    • इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ऊर्जा के मामले में भारत ज्यादा आत्मनिर्भर बन सकेगा।

    लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प किरदार किसान है। सोचिए, जिस गन्ने से आज चीनी बनती है, वही गन्ना कल आपकी कार को भी चला सकता है। 

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    इथेनॉल के फायदे क्या हैं?

    • इथेनॉल की मांग बढ़ने का मतलब है कि किसानों की फसलों की मांग भी बढ़ेगी। इससे उन्हें अपनी उपज बेचने के ज्यादा मौके मिल सकते हैं और आय बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
    • इथेनॉल को पेट्रोल की तुलना में अपेक्षाकृत साफ ईंधन माना जाता है। इसके इस्तेमाल से प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिल सकती है। यानी फायदा सिर्फ अर्थव्यवस्था और किसानों को नहीं, बल्कि पर्यावरण को भी होगा।
    • यही वजह है कि भारत में इथेनॉल को सिर्फ एक नए ईंधन के रूप में नहीं देखा जा रहा। इसे एक ऐसे मॉडल के तौर पर देखा जा रहा है, जो खेत, किसान, कार और देश की ऊर्जा जरूरतों। इन चारों को एक साथ जोड़ सकता है।

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    मारुति सुजुकी की नई फ्लेक्स-फ्यूल कार की लॉन्चिंग सिर्फ एक नए मॉडल की एंट्री नहीं है, बल्कि भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर के अगले बड़े बदलाव का संकेत है। जिस तरह मारुति 800 ने 1980 के दशक में भारतीय सड़कों की तस्वीर बदली थी, उसी तरह फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक भविष्य में ईंधन के इस्तेमाल का तरीका बदल सकती है।

    इसलिए अगली बार जब आपके बगल से यह कार गुजरे, तो याद रखिएगा कि सड़क पर सिर्फ एक नई गाड़ी नहीं, बल्कि भारत के हरित और आत्मनिर्भर भविष्य की एक झलक दौड़ रही है।