महासागरों में दो मौसमी तंत्रों के मुकाबले पर टिकी मानसून की चाल, एलनीनो के असर से बिगड़ सकता है आईओडी
भारतीय मानसून का भविष्य प्रशांत महासागर के एलनीनो और हिंद महासागर के इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) के बीच चल रही खींचतान पर निर्भर है। ...और पढ़ें

महासागरों में दो मौसमी तंत्रों के मुकाबले पर टिकी मानसून की चाल। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)
HighLights
मानसून की चाल एलनीनो और आईओडी पर निर्भर।
सकारात्मक आईओडी एलनीनो के प्रभाव को कम करेगा।
अगले 4-6 सप्ताह मानसून के लिए निर्णायक होंगे।
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। इस बार भारतीय मानसून की आगे की तस्वीर काफी हद तक प्रशांत और हिंद महासागर में चल रही दो बड़ी मौसमी प्रणालियों की खींचतान पर टिकी है। एक ओर प्रशांत महासागर में विकसित हो रही एलनीनो की स्थिति बारिश को कमजोर करने की ओर इशारा कर रही है तो दूसरी ओर हिंद महासागर में इंडियन ओशन डाइपोल उसके असर को संतुलित करने की कोशिश करता दिखाई दे रहा है।
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि जुलाई और अगस्त के दौरान यदि आईओडी पॉजिटिव हुआ तो वह एलनीनो के असर को काफी हद तक कम कर सकता है। इसलिए अगले चार से छह सप्ताह भारतीय मानसून के लिहाज से सबसे निर्णायक माने जा रहे हैं।
मानसून को केरल पहुंचे लगभग महीना भर हो चुका है, लेकिन देश के कई हिस्से सूखे की चपेट में आ गए हैं। कम वर्षा के कारण फसलों की बुआई प्रभावित हुई है। बुआई का रकबा पिछले वर्षों की तुलना में अभी करीब 23 प्रतिशत कम है। उम्मीद मानसून के दूसरे चरण पर टिकी है।
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, मानसून के अगले चरण का रुख इस बात से तय होगा कि प्रशांत महासागर का एलनीनो अधिक प्रभावी रहता है या हिंद महासागर का आईओडी मजबूत होकर उसका मुकाबला करता है। यदि आईओडी समय पर सक्रिय हो गया तो अगस्त-सितंबर में बारिश की स्थिति सुधर सकती है। मगर यदि एलनीनो का प्रभाव ज्यादा रहा और आईओडी कमजोर या देर से विकसित हुआ तो मानसून पर दबाव बना रह सकता है।
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विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) और भारत मौसम विभाग (आईएमडी) के आकलन के अनुसार फिलहाल आईओडी न्यूट्रल स्थिति में है। यानी अभी उसका मानसून पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ रहा। मगर जुलाई से अगस्त के बीच पाजिटिव होने की संभावना है। ऐसा होने पर हिंद महासागर से अतिरिक्त नमी मिलने लगेगी, जिससे अगस्त-सितंबर में मानसून मजबूत हो सकता है। वर्ष 1997 में बेहद शक्तिशाली एलनीनो के बावजूद पॉजिटिव आईओडी ने मानसून को सामान्य बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी।
एलनीनो प्रशांत महासागर में बनने वाली ऐसी स्थिति है, जो मानसूनी हवाओं को कमजोर करती है। यदि इसी दौरान आईओडी भी ताकत के साथ विकसित हो गया तो वह एलनीनो के प्रतिकूल प्रभाव को काफी हद तक संतुलित कर सकता है। दोनों की ताकत और समय ही तय करेंगे कि मानसून पर अंतिम असर कितना होगा।
आईएमडी का अनुमान है कि मानसून पॉजिटिव आईओडी बनने की संभावना बनी हुई है। डब्ल्यूएमओ भी ऐसे ही संकेत देता है। चार से छह सप्ताह में साफ होगा कि हिंद महासागर में तापमान का बदलाव कितनी तेजी से होता है और उसका मानसून पर कितना असर पड़ता है।
स्काईमेट के उपाध्यक्ष महेश पालावत के अनुसार फिलहाल आईओडी न्यूट्रल स्थिति में है। समुद्र के तापमान में सामान्य से लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस तक का अंतर न्यूट्रल माना जाता है। इससे अधिक बढ़त पॉजिटिव आईओडी की ओर संकेत करती है। अभी इसके पॉजिटिव होने के संकेत हैं, लेकिन मानसून को मजबूती तभी मिलेगी, जब समुद्र का तापमान और बढ़े।
क्या है आईओडी
इंडियन ओशन डाइपोल (आईओडी) हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के समुद्री सतह के तापमान के अंतर को कहा जाता है। जब अफ्रीका की ओर का पश्चिमी हिंद महासागर सामान्य से अधिक गर्म और इंडोनेशिया की ओर का पूर्वी हिस्सा अपेक्षाकृत ठंडा हो जाता है, तब पॉजिटिव आईओडी की स्थिति बनती है। इससे अरब सागर से भारत की ओर आने वाली नमी से भरी हवाएं मजबूत होती हैं और मानसूनी बादलों को अतिरिक्त सहारा मिलता है।