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    इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: क्या है ‘राइट टू डाई’, भारत और दुनिया में क्या नियम

    Updated: Wed, 11 Mar 2026 06:47 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा मामले में पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी है, जिसे देश का पहला ऐसा मामला माना जा रहा है। यह निर्णय 'गरिमापूर्ण ...और पढ़ें

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    इच्छामृत्यु पर दुनियाभर में क्या हैं नियम; भारत और अन्य देशों के कानून कैसे हैं अलग

    गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। इस संसार में कुछ तय है तो बस मृत्यु...निश्चित है..आनी ही है। फिर भी सभी को इच्छा सदैव जीवन की ही रहती है। अनेकानेक कारणों से आत्महत्या जैसे अवसादपूर्ण रास्ते को अपवाद मान लें तो मृत्यु की इच्छा कोई नहीं करता।

    सिहर उठेंगे आप कल्पना करके जब पता लगे कि कोई मृत्यु की इच्छा कर रहा है। वो भी अपने प्रिय स्वजन के लिए...बेटे के लिए...भाई के लिए...पति के लिए...किंतु उस वक्त मृत्यु की यह इच्छा उस स्वजन के लिए जीवन सरीखी होती है जो बरसों बरस से बिस्तर पर निढाल पड़ा है।

    केवल कहने को शरीर जीवित है... दवाओं के भरोसे... मेडिकल इक्विटमेंट्स के भरोसे... सुधार कोई नहीं... बस अनंत पीड़ा... अस्पताल या घर के किसी कमरे में शय्या पर पड़े उस व्यक्ति को और उसके स्वजन को जो उसे देखकर द्रवित भी हैं... कर कुछ नहीं पा रहे... तब सामने आता है इच्छामृत्यु का विकल्प... जीवंतता की बात करने वाले संसार में मृत्यु की इच्छा का अतिपीड़ादायक विकल्प...

    गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट से मिली पैसिव यूथेनेसिया (Passive Euthanasia) की अनुमति इसी कठिन सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ले आई है। देश में इस तरह का यह पहला मामला माना जा रहा है। यह फैसला एक ओर जहां हरीश के माता-पिता और भाई की वर्षों की पीड़ा से जुड़ा है, वहीं उन तमाम परिवारों के लिए भी एक राह खोलता है जो न चाहते हुए भी अपने किसी प्रियजन के लिए मृत्यु की अनुमति मांगने की स्थिति में पहुंच जाते हैं।

    हरीश राणा के पिता अशोक राणा की आंखों में भी शायद यही असहाय प्रश्न और पीड़ा झलकती है। इसी के साथ यह सवाल भी सामने आता है कि इच्छामृत्यु आखिर होती क्या है? भारत में इसके क्या नियम हैं? इसे कब और किन परिस्थितियों में अनुमति दी जाती है? और दुनिया के अन्य देशों में इस पर क्या कानून हैं? आइए कुछ सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं।

    सवाल: इच्छामृत्यु (Euthanasia) क्या होती है?

    जवाब: इच्छामृत्यु को अगर सरल शब्दों में कहें, तो यह 'गरिमापूर्ण विदाई' का एक तरीका है। जब किसी व्यक्ति का शरीर एक ऐसी जेल बन जाए जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता (इलाज) न बचा हो और हर पल केवल असहनीय दर्द हो, तब चिकित्सा विज्ञान की मदद से उस जीवन को सम्मानपूर्वक समाप्त करना ही इच्छामृत्यु है।

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    सवाल: इच्छामृत्यु के कितने प्रकार होते हैं?

    जवाब: इच्छामृत्यु को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है।

    एक्टिव इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): इसमें डॉक्टर जानबूझकर दवा या इंजेक्शन देकर मरीज की मृत्यु कराते हैं।

    पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): इसमें मरीज को जिंदा रखने वाली आर्टिफिशियल मशीन जैसे; वेंटिलेटर या लाइफ सपोर्ट हटा लिए जाते हैं, जिससे मरीज की प्राकृतिक मृत्यु हो जाती है।

    सवाल: भारत में इच्छामृत्यु को लेकर क्या कानून है?

    जवाब: भारत में एक्टिव इच्छामृत्यु पूरी तरह अवैध है। यानी डॉक्टर किसी इंजेक्शन या दवा से मरीज की जान नहीं ले सकता। हालांकि पैसिव इच्छामृत्यु को सुप्रीम कोर्ट ने सीमित परिस्थितियों में अनुमति दी है।

    2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि असाध्य बीमारी से पीड़ित मरीज के मामले में लाइफ सपोर्ट हटाने की अनुमति दी जा सकती है। इसी फैसले में “लिविंग विल” को भी कानूनी मान्यता दी गई।

    सवाल: लिविंग विल (Living Will) क्या होती है?

    जवाब: लिविंग विल एक ऐसा कानूनी दस्तावेज होता है जिसमें व्यक्ति पहले से यह लिखकर देता है कि अगर भविष्य में वह ऐसी स्थिति में पहुंच जाए जहां वह खुद निर्णय लेने में सक्षम न हो, तो उसे कृत्रिम लाइफ सपोर्ट पर न रखा जाए। यह दस्तावेज मरीज की इच्छा को स्पष्ट करता है और परिवार व डॉक्टरों के लिए निर्णय लेना आसान बनाता है।

    सवाल: इच्छामृत्यु की अनुमति कौन देता है?

    जवाब: भारत में पैसिव इच्छामृत्यु के लिए एक तय प्रक्रिया का पालन किया जाता है। मरीज या परिवार की ओर से अनुरोध किया जाता है। अस्पताल एक मेडिकल बोर्ड बनाता है, दूसरा स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड मरीज की स्थिति की समीक्षा करता है। दोनों बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर ही लाइफ सपोर्ट हटाने का फैसला लिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि निर्णय जल्दबाजी या दबाव में न लिया जाए।

    सवाल: किन परिस्थितियों में इच्छामृत्यु की अनुमति मिल सकती है?

    जवाब: भारत में पैसिव इच्छामृत्यु आमतौर पर इन स्थितियों में दी जाती है:

    • मरीज असाध्य बीमारी से पीड़ित हो
    • इलाज से ठीक होने की कोई संभावना न हो
    • मरीज लंबे समय से कोमा या वेजिटेटिव स्टेट में हो
    • डॉक्टरों की टीम यह मान ले कि जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम से चल रहा है

    सवाल: दुनिया के अन्य देशों में क्या नियम हैं?

    जवाब: इच्छामृत्यु को लेकर दुनिया के देशों में अलग-अलग कानून हैं।

    नीदरलैंड और बेल्जियम

    इन देशों में एक्टिव इच्छामृत्यु भी कानूनी है। डॉक्टर मरीज की स्पष्ट इच्छा और मेडिकल स्थिति के आधार पर इंजेक्शन देकर जीवन समाप्त कर सकते हैं।

    कनाडा

    यहां 'मेडिकल असिस्टेड डाइंग' (MAID) की अनुमति है। इसमें डॉक्टर या नर्स की सहायता से मरीज अपनी इच्छा से जीवन समाप्त कर सकता है।

    स्विट्जरलैंड

    स्विट्जरलैंड में 'असिस्टेड सुसाइड' कानूनी है। इसमें व्यक्ति खुद दवा लेकर जीवन समाप्त करता है, लेकिन डॉक्टर प्रक्रिया में सहायता कर सकते हैं।

    अमेरिका

    अमेरिका में संघीय स्तर पर इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है, लेकिन कुछ राज्यों जैसे ओरेगन, कैलिफोर्निया और वॉशिंगटन में डॉक्टर की मदद से आत्महत्या की अनुमति दी गई है।

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    सवाल: किन देशों में इच्छामृत्यु पर सख्त प्रतिबंध है?

    जवाब: दुनिया के कई देशों में इच्छामृत्यु पर अब भी कड़े प्रतिबंध लागू हैं। खासकर धार्मिक और नैतिक कारणों से कई समाज इसे स्वीकार नहीं करते।

    इस्लामिक देश

    अधिकांश इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी स्वरूप पर सख्त धार्मिक प्रतिबंध है। इस्लामी मान्यता के अनुसार जीवन और मृत्यु का अधिकार केवल ईश्वर के हाथ में माना जाता है, इसलिए किसी भी प्रकार की इच्छामृत्यु या असिस्टेड सुसाइड को स्वीकार नहीं किया जाता।

    फ्रांस और ब्रिटेन

    यूरोप के कुछ देशों में भी इच्छामृत्यु को वैध नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए फ्रांस और ब्रिटेन में सक्रिय रूप से मृत्यु देने (एक्टिव यूथेनेसिया) की अनुमति नहीं है। इन देशों में मरीज को जीवन समाप्त करने की बजाय दर्द से राहत देने और उसकी देखभाल पर ज्यादा जोर दिया जाता है।

    इन देशों में गंभीर रूप से बीमार मरीजों को पैलियेटिव केयर और डीप सिडेशन जैसी चिकित्सा पद्धतियों के जरिए दर्द से राहत दी जाती है। इसमें नशे या सिडेशन वाली दवाओं के माध्यम से मरीज की पीड़ा कम की जाती है, लेकिन जानबूझकर मृत्यु नहीं दी जाती।

    सवाल: इच्छामृत्यु को लेकर विवाद क्यों होता है?

    जवाब: इच्छामृत्यु एक संवेदनशील और विवादास्पद विषय है। एक पक्ष का तर्क है कि असहनीय पीड़ा झेल रहे मरीज को सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार होना चाहिए।

    दूसरा पक्ष मानता है कि इससे बुजुर्गों और गंभीर मरीजों पर दबाव डाला जा सकता है और इसका दुरुपयोग भी हो सकता है।

    सवाल: ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ क्या है?

    जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में कहा है कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है। इसी के विस्तार के रूप में 'राइट टू डाई विद डिग्निटी' की अवधारणा सामने आई है। इसका मतलब यह है कि असाध्य बीमारी की स्थिति में व्यक्ति को अनावश्यक पीड़ा में जबरन जीवित रखने की बजाय उसकी इच्छा का सम्मान किया जा सकता है।

    सवाल: भारत में इच्छामृत्यु पर सबसे पहले चर्चा कब हुई?

    जवाब: भारत में इच्छामृत्यु पर सबसे बड़ी चर्चा 2011 के अरुणा शानबाग केस के दौरान हुई थी। मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग 1973 में हुए हमले के बाद दशकों तक वेजिटेटिव स्टेट में रहीं।

    इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु के लिए दिशानिर्देश तय किए, जिससे भारत में इस विषय पर कानूनी बहस की शुरुआत हुई।

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