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    भारत मोटा हो रहा है! Economic Survey ने क्यों बजाया खतरे का अलार्म, अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?

    Updated: Sat, 31 Jan 2026 02:35 PM (IST)

    भारत में मोटापा एक 'साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी' बन गया है, जिससे उत्पादकता और अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहा है। इकोनॉमिक सर्वे 2026 ने चेतावनी दी है क ...और पढ़ें

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    मोटापा देश के लिए खतरा, सेहत ने अर्थव्यवस्था की बढ़ाई चिंता (फोटो- AI Generated)

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। सुबह की चाय के साथ बिस्किट, ऑफिस में घंटों कुर्सी पर बैठना, रात को मोबाइल स्क्रॉल करते हुए डिनर... ये सब अब हमारी रोज़मर्रा की आदतें हैं। लेकिन इन्हीं आदतों का नतीजा है कि भारत आज एक ‘साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी’ की तरफ बढ़ रहा है।

    नाम है- मोटापा (Obesity)

    जो बीमारी कभी अमीर देशों की मानी जाती थी, आज वह भारत के हर वर्ग, हर उम्र और हर राज्य में तेज़ी से फैल रही है। Economic Survey 2026 ने इसे सीधे शब्दों में चेतावनी बताया है- अगर मोटापे पर अभी ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका असर सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की उत्पादकता, श्रमशक्ति और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

    2000 से 2025: भारत कैसे मोटा होता गया

    WHO और UNICEF के आंकड़े बताते हैं कि साल 2000 के बाद भारत में मोटापे का ग्राफ लगातार ऊपर गया है। 2000 में जहां ओवरवेट और मोटापे से ग्रस्त वयस्कों की हिस्सेदारी करीब 10–12 प्रतिशत थी, वहीं 2015 तक यह लगभग 20 प्रतिशत तक पहुंच गई। 2023–24 तक आते-आते शहरी भारत में हर तीसरा वयस्क ओवरवेट या मोटापे का शिकार पाया गया। यह बदलाव तेज़ है और व्यापक भी।

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    फोटो- AI Generated (Some figures and projections may vary.)

    सबसे बड़ा अलार्म बच्चों को लेकर है। यूनिसेफ के मुताबिक, भारत में पांच साल से कम उम्र के बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है, जबकि किशोरों में यह रफ्तार और तेज़ है। वैश्विक स्तर पर देखें तो आज करीब 18.8 करोड़ बच्चे और किशोर मोटापे के साथ जी रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बचपन में मोटापा शुरू हो जाए, तो यह आगे चलकर कई गंभीर बीमारियों की नींव बनता है।

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    भारत की विडंबना: मोटापा भी, कुपोषण भी

    मोटापे के बढ़ते आंकड़ों के बीच भारत की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि देश अब भी कुपोषण से पूरी तरह बाहर नहीं निकला है। NFHS और WHO के आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में बच्चे आज भी स्टंटिंग और अंडरवेट की समस्या से जूझ रहे हैं। यानी भारत आज एक साथ दो विपरीत चुनौतियों से जूझ रहा है कुपोषण और मोटापा।

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    WHO इसे ‘डबल बर्डन ऑफ मालन्यूट्रिशन’ कहता है। कई परिवारों में यह विरोधाभास एक ही छत के नीचे दिखाई देता है। जहां बच्चा या महिला कुपोषित है, वहीं किशोर या वयस्क मोटापे का शिकार। कम पोषण वाला सस्ता खाना पेट तो भर देता है, लेकिन शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं देता। यही स्थिति कुपोषण और मोटापे, दोनों को जन्म देती है।

    Economic Survey का अलार्म: मोटापा एक आर्थिक खतरा

    Economic Survey 2026 ने मोटापे को सिर्फ स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि एक आर्थिक जोखिम के रूप में चिन्हित किया है। सर्वे के मुताबिक अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड- जैसे पैकेज्ड स्नैक्स, स्वीट ड्रिंक्स और इंस्टेंट फूड, भारत में मोटापे के बढ़ते मामलों की बड़ी वजह बन रहे हैं। इनमें अत्यधिक चीनी, नमक और ट्रांस फैट होता है, जो डायबिटीज, हृदय रोग और हाई ब्लड प्रेशर को बढ़ावा देता है।

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    फोटो- AI Generated

    इसके साथ ही शहरी जीवनशैली में शारीरिक गतिविधि की कमी ने समस्या को और गंभीर बना दिया है। लंबे ऑफिस आवर्स, स्क्रीन-आधारित काम और खुले स्थानों की कमी ने चलना-फिरना लगभग खत्म कर दिया है। नतीजा यह है कि कामकाजी उम्र की आबादी की सेहत और उत्पादकता दोनों प्रभावित हो रही हैं।

    आधी दुनिया ओवरवेट...: WHO की चेतावनी

    WHO की फैक्ट शीट के मुताबिक 2022, में दुनिया भर में एक अरब से ज्यादा लोग मोटापे से ग्रस्त थे। इनमें करोड़ों बच्चे और किशोर शामिल हैं। अमेरिका, मैक्सिको और मिस्र जैसे देशों में मोटापा पहले ही सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। WHO ने चेतावनी दी है कि अगर यही रफ्तार बनी रही, तो 2035 तक दुनिया की आधी आबादी ओवरवेट हो सकती है।

    खानपान की आदतें: क्या थाली बदली है या सिर्फ पैकेट?

    एक और बड़ा सवाल हमारे बदलते खानपान को लेकर है। क्या भारत सच में हेल्दी खाना छोड़ रहा है, या हेल्दी खाना उसकी पहुंच से बाहर होता जा रहा है? दाल, सब्ज़ी और मोटा अनाज की जगह पैकेज्ड फूड इसलिए नहीं आया क्योंकि लोग अनजान हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वह सस्ता, सुविधाजनक और हर समय उपलब्ध है।

    तो क्या मोटापे की असली लड़ाई सिर्फ स्वाद से नहीं, बल्कि समय, कीमत और सुविधा से जुड़ी हुई है? अगर जंक फूड सस्ता और हेल्दी खाना महंगा रहेगा, तो बदलाव की उम्मीद किससे की जाए?

    बच्चों की थाली कौन तय कर रहा है?

    बच्चों के मोटापे पर चिंता जताई जा रही है, लेकिन सवाल यह भी है कि उनकी थाली कौन तय कर रहा है। स्कूल कैंटीन, ऑनलाइन फूड डिलीवरी और विज्ञापनतीनों मिलकर बच्चों की खाने की पसंद को प्रभावित कर रहे हैं। अगर स्कूलों के आसपास जंक फूड आसानी से मिलता रहेगा और हेल्दी विकल्प सिर्फ किताबों में रहेंगे, तो मोटापे पर काबू कैसे पाया जाएगा?

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    फोटो- AI Generated

    बच्चों का भविष्य दांव पर

    विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि बचपन में मोटापा सिर्फ वजन बढ़ने की समस्या नहीं है। इससे कम उम्र में ही टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। मोटापा बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है- आत्मविश्वास में कमी, सामाजिक अलगाव और अवसाद जैसी समस्याएं सामने आने लगी हैं। इसका सीधा असर पढ़ाई, खेल और भविष्य की कार्यक्षमता पर पड़ता है।

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    दैनिक जागरण डिजिटल ने इस विषय को गहराई से समझने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के एडिशनल प्रोफेसर डॉ. मंजूनाथ से बातचीत की।

    डॉ. मंजूनाथ के अनुसार, “मोटापा आज भारत के लिए एक गंभीर और तेजी से बढ़ता हुआ स्वास्थ्य संकट बन चुका है। यह न केवल हृदय, फेफड़ों और जोड़ों को प्रभावित करता है, बल्कि पूरे मेटाबॉलिक सिस्टम पर भी गहरा असर डालता है। अनियंत्रित मोटापा जीवन की गुणवत्ता को कम करता है और समय से पहले गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ा देता है। इससे निपटने के लिए जीवनशैली में बदलाव के साथ-साथ समय पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप बेहद जरूरी है।”

    मोटा अनाज: समाधान या सिर्फ नारा?

    इसी संकट के बीच सरकार मोटे अनाज- जैसे बाजरा, ज्वार और रागी को समाधान के रूप में आगे बढ़ा रही है। ये अनाज फाइबर और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स से भरपूर हैं, इनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है और ये मोटापा व कुपोषण दोनों से लड़ने में मददगार माने जाते हैं। Global Millets Conference जैसे मंचों पर भारत इन्हें ‘स्मार्ट फूड’ के रूप में पेश कर रहा है।

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    लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ मोटा अनाज प्रमोट करने से समस्या हल हो जाएगी? शहरों में मोटा अनाज अक्सर ‘हेल्थ फूड’ के नाम पर महंगे दामों पर बिक रहा है, जबकि जिन तबकों में कुपोषण और मोटापा दोनों की समस्या सबसे ज्यादा है, वहां इसकी पहुंच सीमित है। अगर मोटा अनाज समाधान है, तो उसे नारे से निकालकर आम आदमी की थाली तक पहुंचाना होगा।

    खानपान और बाजार: असली लड़ाई कहां है?

    मोटापा सिर्फ व्यक्तिगत पसंद का नतीजा नहीं है। यह उस बाजार व्यवस्था का भी परिणाम है, जहां सस्ता और नुकसानदेह खाना हर जगह उपलब्ध है, जबकि हेल्दी विकल्प महंगे या मुश्किल हैं। स्कूल कैंटीन, फूड डिलीवरी ऐप्स और आक्रामक विज्ञापन बच्चों की खाने की आदतें तय कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सिर्फ जागरूकता से मोटापे की लड़ाई जीती जा सकती है, या इसके लिए कड़े नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत होगी।

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    फोटो- AI Generated

    सवाल जो जवाब मांगते हैं

    • क्या मोटापा वाकई व्यक्ति की पसंद का नतीजा है, या उस सिस्टम का, जो सस्ता लेकिन नुकसानदेह खाना हर जगह उपलब्ध कराता है और हेल्दी विकल्प को मुश्किल बना देता है?
    • अगर मोटा अनाज समाधान है, तो क्या वह आज आम आदमी की थाली तक पहुंच पा रहा है, या “हेल्थ फूड” बनकर महंगे बाजार तक सीमित है?
    • जब बच्चों की खाने की आदतें स्कूल, विज्ञापन और फूड डिलीवरी ऐप्स तय कर रहे हों, तो मोटापे की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

    स्रोत:

    UNISEF की आधिकारिक वेबसाइट

    डिजिटल संसद की वेबसाइट

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