भाजपा-झामुमो में न दोस्ती का ऐलान, न दुश्मनी का इजहार; झारखंड की राजनीति में क्या चल रहा?
झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के बाद झामुमो और भाजपा के बीच नए समीकरण उभर रहे हैं, जिससे महागठबंधन में बेचैनी है। ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। झारखंड की राजनीति में राज्यसभा चुनाव के बाद पैदा हुई हलचल सिर्फ महागठबंधन के भीतर की खींचतान तक सीमित नहीं रह गई है। इसके बहाने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और भाजपा के रिश्तों को लेकर भी नए सवाल उठने लगे हैं।
महागठबंधन में बेचैनी है, जबकि भाजपा इंतजार और संयम की रणनीति पर चलती दिख रही है। सियासी घटनाएं बता रही हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन कांग्रेस को बैकफुट पर रखते हुए अपनी संभावनाओं का दायरा बढ़ाना चाह रहे हैं। भाजपा का रुख भी झामुमो के प्रति टकराव का नहीं है।
राज्यसभा चुनाव ने बदली हवा
राज्यसभा चुनाव में राजग समर्थित परिमल नाथवानी की जीत ने इन अटकलों को और बल दिया है। भाजपा में यह धारणा मजबूत हुई है कि बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ उसके संबंध भले ही कटु रहे हों, मगर झारखंड में झामुमो के साथ स्थिति वैसी नहीं है।
विपक्षी गठबंधन के विभिन्न दलों के हालिया हश्र को देखते हुए झामुमो भी भाजपा से व्यर्थ टकराव लेने के पक्ष में नहीं दिखता। ऐसे में दोनों दल संभलकर कदम बढ़ा रहे हैं और समय का इंतजार कर रहे हैं।
कांग्रेस प्रत्याशी को मिली हार
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी की हार के बाद महागठबंधन के भीतर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, लेकिन पूरे विवाद में हेमंत सोरेन की चुप्पी सबसे अधिक चर्चा में रही। चुनाव परिणाम के बाद उनकी पत्नी कल्पना सोरेन के साथ दिल्ली यात्रा की खबरों ने कई तरह की चर्चाओं को जन्म दिया।
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कयास लगाए जा रहे कि हेमंत ने दिल्ली में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की है। हालांकि भाजपा के शीर्ष सूत्र ऐसी किसी मुलाकात से इनकार करते हैं। बावजूद घटनाओं को राजनीतिक नजरिए से जोड़कर देखा जा रहा है।
नासिक में साईं दर्शन के बाद हेमंत सोरेन का दिल्ली पहुंचना और अपने दिवंगत पिता एवं झामुमो संस्थापक शिबू सोरेन के लिए मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में पद्म विभूषण सम्मान ग्रहण करना भी चर्चाओं का हिस्सा है।
भाजपा-झामुमो की बढ़ती नजदीकियां
भाजपा-झामुमो की बढ़ती नजदीकियों के सवाल पर झारखंड के एक वरिष्ठ नेता की टिप्पणी भी काफी कुछ कह जाती है। उनका कहना है कि जल्दी भी क्या है। एक-एक कदम आगे बढ़ रहे हैं। वक्त आएगा तो दूरियां भी खत्म हो जाएंगी।
दरअसल, झारखंड भाजपा की हालिया गतिविधियां भी ऐसे समीकरणों की ओर संकेत करती हैं। विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत लगाने के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बाद भाजपा ने झामुमो के साथ सीधे टकराव की रणनीति को पीछे छोड़ दिया है। केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा शिबू सोरेन को पद्म विभूषण से सम्मानित किया जाना भी इसी संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा नेता के कार्यक्रम में हेमंत सोरेन
हेमंत सोरेन के संकेतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रांची में केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता संजय सेठ के एक कार्यक्रम में उनकी उपस्थिति को इसी संदर्भ में देखा गया। इससे संदेश गया कि मतभेदों के बाद भी संवाद और संबंध बनाए रखने में दोनों पक्षों की दिलचस्पी है।
कांग्रेस को भी इसका आभास है। यही वजह है कि राज्यसभा चुनाव में हार के बाद भी उसने झामुमो पर सीधे आरोप लगाने से परहेज किया। उसने कठघरे में राजद और भाकपा-माले को ही रखा। यह प्रश्न नहीं उठाया कि जब जीत के लिए 28 वोट पर्याप्त थे तो झामुमो उम्मीदवार के पक्ष में दो अतिरिक्त वोट क्यों डलवाए गए।