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    'मेरा दिल मत तोड़ो...', क्या पाकिस्तान बनने के बाद पछता रहे थे जिन्ना? नेहरू से की थी मुंबई वाला घर बचाने की अपील

    Updated: Wed, 08 Jul 2026 06:59 PM (IST)

    पाकिस्तान के कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना ने 1948 में जिन्ना के नाम एक संदेश भेजकर अपने बंबई वाले घर को बचाने की अपील की थी। ...और पढ़ें

    पाकिस्तान के 'कायद-ए-आजम' मोहम्मद अली जिन्ना (फोटो- AI Generated)

    पाकिस्तान के 'कायद-ए-आजम' मोहम्मद अली जिन्ना (फोटो- AI Generated)

    गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। एक ऐसा शख्स... जिसे मस्जिद में नमाज़ पढ़ते बहुत कम लोगों ने देखा... जो अंग्रेजी में सोचता था, गुजराती में बात करता था और जिसे खुद उर्दू पर महारत हासिल नहीं थी... जिसे मोहब्बत हुई, तो अपने से 22 साल छोटी एक पारसी लड़की से... जो लंदन की आधुनिक जीवनशैली, बेहतरीन सूट, सिगरेट और शराब के शौकीन था...

    लेकिन इतिहास का विरोधाभास देखिए... इसी इंसान ने आगे चलकर मजहब के नाम पर मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क की मांग की और पाकिस्तान का 'कायद-ए-आजम' बन गया। संस्थापक तो रहा लेकिन जब आखिरी वक्त में उसे खुद उस मुल्क की ज़रूरत थी, तब वह मुल्क उसका न हो सका।

    नियति का खेल भी देखिए जिस शख्स ने भारत के दो टुकड़े कर दिए, करोड़ों लोगों के लिए एक नया देश बना दिया, वह अपनी जिंदगी के आखिरी पलों में लगभग असहाय पड़ा रहा। कराची की तपती गर्मी, मच्छरों के झुंड और एम्बुलेंस खराब हो जाने के कारण करीब एक घंटे तक सड़क पर लाचार इंतजार... इसी तड़प के साथ पाकिस्तान के 'बाबा-ए-कौम' ने दम तोड़ दिया।

    दैनिक जागरण के खास एक्सप्लेनर में आज बात पाकिस्तान के 'कायद-ए-आजम' मोहम्मद अली जिन्ना की।

    11 सितंबर 1948। पाकिस्तान बने अभी सिर्फ 13 महीने हुए थे। देश का संस्थापक बुरी तरह बीमार था। क्वेटा से कराची लाने के लिए विकर्स वाइकिंग एयरक्राफ्ट उतरा, लेकिन एयरपोर्ट से गवर्नर जनरल हाउस तक का सफर भी पूरा नहीं हो पाया। जिस एंबुलेंस में मोहम्मद अली जिन्ना को ले जाया जा रहा था, वह रास्ते में खराब हो गई।

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    तपती गर्मी, मच्छरों के झुंड और करीब एक घंटे तक सड़क पर इंतजार... पाकिस्तान के संस्थापक अपनी जिंदगी के आखिरी पलों में लगभग असहाय पड़े रहे। बाद में दूसरी एम्बुलेंस आई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसी रात जिन्ना ने अंतिम सांस ली। लेकिन जिन्ना उस रात अपनी बहन फातिमा जिन्ना के कान में कुछ कह गए। जो मिस्ट्री अभी तक खुल नहीं पाई है।

    एक ऐसा वकील, जिसे कभी हिंदू-मुस्लिम एकता का राजदूत कहा गया... जिसके पूर्वज कभी हिंदू थे, वही आगे चलकर पाकिस्तान का निर्माता बनता है। पाकिस्तान और भारत का बंटवारा 1947 में हुआ, ठीक एक साल बाद जिन्ना की मौत हो जाती है। जिन्ना चले गए लेकिन पीछे कई सवाल छोड़ गए।

    पहला सवाल: देश के बंटवारे के बाद आखिर मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने मुंबई वाले मशहूर बंगले को बचाने के लिए जवाहरलाल नेहरू से क्या गुहार लगाई थी? 

    दूसरा सवाल: जिन्ना की मौत के 75 साल बाद भी उनकी धार्मिक पहचान पर विवाद क्यों है? आखिर वह शिया थे, सुन्नी थे या दोनों से अलग अपनी पहचान रखते थे? और उनके जनाज़े को लेकर ऐसा क्या हुआ, जिसने इस बहस को और गहरा कर दिया?

    तीसरा सवाल: जब जिन्ना अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों में जियारत के एक बंगले में मौत से जंग लड़ रहे थे, तब उनसे मिलने ऐसा कौन आया था, उस बंद कमरे में आखिर क्या बातचीत हुई, जिसके जिन्ना अपने ही सबसे करीबी लोगों से ठगा हुआ महसूस कर रहे थे?

    आखिर इन सवालों के पीछे की सच्चाई क्या है? इस कहानी में हम जिन्ना की जिंदगी के आखिरी अध्याय से जुड़े इन्हीं रहस्यों, विवादों और ऐतिहासिक तथ्यों की परतें एक-एक करके खोलेंगे।

    साल 1916 में, दार्जिलिंग में जिन्ना की मुलाकात मशहूर उद्योगपति और पारसी समुदाय के प्रभावशाली नेता सर दिनशॉ पेटिट की बेटी रतनबाई पेटिट से हुई। परिवार और करीबी लोग उन्हें प्यार से 'रुट्टी' कहते थे। उस वक्त जिन्ना लगभग 38 साल के थे, जबकि रुट्टी महज़ 16 साल की। यानी दोनों के बीच करीब 22 साल का उम्र का फासला था। उम्र के साथ-साथ दोनों अलग-अलग धर्मों से भी थे। 

    Jinnah Second Wife

    रुट्टी पारसी थीं और जिन्ना मुसलमान। ऐसे में इस रिश्ते का परिवार ने कड़ा विरोध किया। ये वही साल था जब लखनऊ समझौते के समय जिन्ना को हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे बड़ा समर्थक माना जा रहा था। मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की थी। वह संविधान, कानून और संवैधानिक राजनीति में विश्वास रखने वाले बैरिस्टर थे। 

    यही कारण था कि उन्होंने रुट्टी से निकाह के लिए 2 साल का इंतजार किया। जिन्ना का यह दूसरा निकाह था। रुट्टी अपने परिवार के विरुद्ध अपने फैसले पर अडिग रहीं। 18 साल की उम्र पूरी होने के बाद, उन्होंने इस्लाम कबूल किया, अपना नाम मरियम जिन्ना रखा और 19 अप्रैल 1918 को मोहम्मद अली जिन्ना से शादी कर ली।

    यह शादी उस दौर की सबसे चर्चित शादियों में से एक बन गई। हालांकि, यह प्रेम कहानी ज्यादा लंबी नहीं चल सकी। शादी के कुछ वर्षों बाद दोनों के रिश्तों में दूरियां बढ़ने लगीं। 1928 में रुट्टी जिन्ना का घर छोड़कर अलग रहने लगीं। कहा जाता है कि रुट्टी की मौत ने जिन्ना को भीतर तक तोड़ दिया था।

    खैर इसपर हम बाद में आएंगे, इससे पहले बात साल 1920 की करते हैं। 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया। गांधी का मानना था कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सड़क पर उतरना चाहिए और जनआंदोलन के जरिए आजादी की लड़ाई जाए। 

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    गांधी के ठीक उलट जिन्ना का मानना था कि आंदोलन का कुछ खास असर दिखने नहीं वाला। वे चाहते थे कि कुछ संवैधानिक रास्ता अपनाया जाए और धीरे-धीरे उनकी दूरी कांग्रेस से बढ़ती गई।

    साल 1930... ऑल इंडिया मुस्लिम लीग लगभग कमजोर हो चुकी थी। अब इसकी कमान जिन्ना ने अपने हाथों में संभाल ली। वही ऑल इंडिया मुस्लिम लीग जिसकी कहानी 1906 में शुरू हुई थी, अभी के बांग्लादेश की राजधानी ढाका में। इसमें नवाब विकार-उल-मुल्क, नवाब सलीमुल्लाह खान, आगा खान तृतीय जैसे कई मुस्लिम नेता शामिल थे। 

    लाहौर प्रस्ताव की घोषणा

    10 साल बाद 23 मार्च 1940 की दोपहर…लाहौर का मिंटो पार्क लोगों से खचाखच भरा हुआ था। देश के अलग-अलग हिस्सों से आए हजारों प्रतिनिधि और समर्थक ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन में जुटने लगे। मंच पर पार्टी अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना मौजूद दिखाई पड़ रहे थे।

    उनके साथ बंगाल के प्रधानमंत्री 'शेर-ए-बंगाल' के नाम से मशहूर ए. के. फ़ज़लुल हक़, पंजाब के प्रधानमंत्री सिकंदर हयात खान, सिंध के नेता अब्दुल्ला हारून और तमाम नेतागण स्टेज पर बैठे थे। 

    Jinnah

    मंच पर 'शेर-ए-बंगाल' ए. के. फ़ज़लुल हक़ खड़े हुए। उनके हाथ में एक प्रस्ताव था। उस पल शायद वहां मौजूद किसी शख्स ने भी नहीं सोचा होगा कि कागज़ के कुछ पन्नों पर लिखे ये शब्द आने वाले सात वर्षों में करोड़ों लोगों की तकदीर बदल देंगे। यह था लाहौर प्रस्ताव… जिसने अगले सात सालों में भारत के दो टुकड़े कर दिए। अब जिन्ना अगले सात सालों में पाकिस्तान की मांग का सबसे बड़ा चेहरा बन गए।

    मुंबई के मालाबार हिल में गांधी और जिन्ना की मुलाकात

    साल 1944... (बेनतीजा बैठक): पाकिस्तान की मांग अब सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं रह गई थी। देश का भविष्य किस दिशा में जाएगा, यह तय करने की कोशिशें तेज हो चुकी थीं। ऐसे माहौल में सितंबर 1944 में बंबई के मालाबार हिल में जिन्ना हाउस… वही जिन्ना हाउस जिसे लेकर जिन्ना ने नेहरू के नाम चिट्ठी भेजी थी।

    Jinnah Gandhi

    यहां महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना की मीटिंग रखी जाती है। करीब दो हफ्तों तक दोनों के बीच कई दौर की बातचीत चली। गांधी चाहते थे कि भारत एकजुट रहे… दूसरी ओर जिन्ना का कहना था, ‘हिंदू और मुसलमान दो अलग 'कौमें' हैं”, इसलिए मुसलमानों के लिए अलग देश ही समाधान है और नतीजा कुछ नहीं निकला।

    साल 1945... (शिमला सम्मलेन): अब ब्रिटिश सरकार भी समझ चुकी थी कि सत्ता हमेशा के लिए उसके हाथ में नहीं रहने वाली। तो अब आगे क्या करना है इसे लेकर 2 साल पहले नियुक्त किए गए वायसराय लॉर्ड वेवेल एक मीटिंग रखते हैं। ये मीटिंग रखी जाती है पहाड़ों की राजधानी शिमला में। आगे चलकर इसे शिमला सम्मेलन के नाम से जाना गया।

    Shimla Sammelan

    तो अब शिमला सम्मेलन का मेन मकसद ये था कि एक अंतरिम सरकार बनाई जाए और इसके लिए सभी पक्षों को प्रतिनिधित्व का मिलाप हो। अब यहां भी एक समस्या आ खड़ी हुई कि आखिर मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करेगा कौन? जिन्ना चाहते थे प्रतिनिधित्व सिर्फ मुस्लिम लीग करे… लेकिन कांग्रेस इस दावे को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी।

    कई दिनों तक चली बातचीत आखिरकार बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। इसके साथ ही समझौते की उम्मीद भी लगभग टूटने लगी। मुस्लिम लीग अब बातचीत पर डिपेंडेंट नहीं रहना चाहती थी। असली खेल अब शुरू होता है।

    डायरेक्ट एक्शन डे

    साल 1946... पार्टी 16 अगस्त 1946 का दिन निर्धारित करती है कि इस दिन देशभर के मुसलमान जुटें और आंदोलन करें। मतलब अब कोई मीटिंग नहीं, कोई वार्ता नहीं  'डायरेक्ट एक्शन डे’ की तरह देखा जाए। लेकिन यही एक्शन डे… ब्लैक डे में बदल गया।

    Direct Action Day

    भयानक सांप्रदायिक हिंसा हुई, सबसे पहले कलकत्ता की सड़कों पर भीषण दंगे भड़के। चार दिनों तक शहर आग, हिंसा और लाशों से भर गया। हजारों लोग मारे गए और लाखों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। इसके बाद नोआखाली, बिहार, पंजाब और देश के कई अन्य हिस्सों में भी सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। 

    India After Gandhi

    प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब India After Gandhi में लिखते हैं-
    1946 में कलकत्ता में बड़े पैमाने पर दंगों की शुरुआत करवाकर जिन्ना और मुस्लिम लीग ने दोनों समुदायों के बीच तीखा ध्रुवीकरण करवाने की कोशिश की। उन्होंने ऐसा करके अंग्रेजों पर दबाव डाला कि आखिरकार जब वे कभी हिंदुस्तान से वापस जाएं तो मुल्क का बंटवारा करके जाएं।  

    वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन का एलान

    3 जून 1947... महीनों की असफल बातचीत, बढ़ती हिंसा और राजनीतिक गतिरोध के बाद आखिरकार आखिरी फैसला सामने आया। भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने रेडियो प्रसारण के जरिए घोषणा की। इस घोषणा में साफ कर दिया गया कि ब्रिटिश भारत का बंटवारा होगा। भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र देश बनाए जाएंगे।

    Jinnah Speech

    पाकिस्तान बनने से तीन दिन पहले 11 अगस्त 1947 को जिन्ना ने पाकिस्तान की संविधान सभा में एक ऐसा भाषण दिया, जिससे वहां कुछ अजीब सी स्थिति बन गई। 

    यह भी पढ़ें: पाकिस्तान के ये 5 तानाशाह जो हिन्दुस्तान में हुए पैदा, बाद में भारत के ही खिलाफ रची साजिश 

    जिन्ना की स्पीच-

    'आप अपने मंदिरों में जाने के लिए स्वतंत्र हैं। आप अपनी मस्जिदों में जाने के लिए स्वतंत्र हैं। आप किसी भी धर्म, जाति या पंथ से हों, इसका राज्य के कामकाज से कोई संबंध नहीं होगा। समय के साथ हिंदू, हिंदू नहीं रहेंगे और मुसलमान, मुसलमान नहीं रहेंगे, नागरिक के रूप में सभी बराबर होंगे।'

    जिन्ना की वायसराय से ऊंची कुर्सी पर बैठने की जिद्द

    एक एक चर्चित किस्सा और भी है, 14 अगस्त 1947... कराची में पाकिस्तान के जन्म का ऐतिहासिक समारोह होने वाला था। मोहम्मद अली जिन्ना देश के पहले गवर्नर जनरल के रूप में शपथ लेने वाले थे और भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन भी इस समारोह में मौजूद थे। 

    Jinnah Chair

    अब जिन्ना इस दौरान एक मांग करते हैं। जिन्ना चाहते थे कि मंच पर उनकी कुर्सी माउंटबेटन की कुर्सी के बराबर हो या फिर उससे ऊंची हो, ताकि पूरा पाकिस्तान देखे उसका गवर्नर जनरल किसी भी ब्रिटिश अधिकारी से नीचे नहीं है। हालांकि, ब्रिटिश प्रोटोकॉल के तहत इस मांग को स्वीकार नहीं किया गया।

    बंबई वाले घर में रह गया था जिन्ना का 'दिल'

    भारत का बंटवारा हो चुका था। मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर जनरल बन चुके थे, लेकिन उनका दिल अब भी बंबई के मालाबार हिल पर बने अपने पसंदीदा बंगले 'साउथ कोर्ट' में अटका हुआ था। यही वह घर था, जिसे उन्होंने अपनी पसंद से बनवाया था और हर ईंट से लगाव था। 

    Jinnah House

    इसी दौरान भारत के पहले पाकिस्तान स्थित उच्चायुक्त श्री प्रकाश जब जिन्ना से मिले, तो बातचीत के दौरान जिन्ना ने अपने बंबई वाले बंगले का जिक्र किया।

    Pakistan at the helm

    भारत सरकार के कैबिनेट सचिवालय में पूर्व विशेष सचिव तिलक देवाशेर अपनी किताब Pakistan at the Helm में लिखते हैं- 

    "जिन्ना ने श्री प्रकाश से कहा, ‘जवाहरलाल से कहना कि मेरा दिल मत तोड़ो। मैंने इस घर को ईंट-ईंट जोड़कर बनाया है। तुम नहीं जानते कि मुझे बंबई से कितना प्यार है।’ उन्होंने यह भी इच्छा जताई कि उस बंगले को किसी प्रतिष्ठित विदेशी दूतावास या किसी छोटे यूरोपीय परिवार अथवा किसी सुसंस्कृत भारतीय राजघराने को किराए पर दे दिया जाए, ताकि उसकी देखभाल होती रहे। उनका विश्वास था कि एक दिन वे फिर बंबई लौटेंगे और अपने उसी घर में समय बिताएंगे।"

    बताया जाता है कि जवाहरलाल नेहरू ने जिन्ना की इस इमोशनल अपील का सम्मान किया और उनके जीते जी उस बंगले को शत्रु संपत्ति घोषित नहीं किया। लेकिन सितंबर 1948 में जिन्ना की मृत्यु होने के बाद के वर्षों में कानूनी और सरकारी प्रक्रियाओं के तहत यह संपत्ति भारतीय सरकार के नियंत्रण में आ गई।

    बंगला बहन फातिमा के नाम कर गए थे जिन्ना

    ऐसा कहा जाता है कि जिन्ना ने अपनी वसीयत में यह संपत्ति फातिमा जिन्ना के नाम की थी। जी हां.. फातिमा जिन्ना… जो कि मोम्मद अली जिन्ना के आखिरी दिनों में उनके साथ थीं।

    दरअसल, 1948 आते-आते उन्होंने महसूस करना शुरू कर दिया था कि उनके भाई की सेहत अब पहले जैसी नहीं रही। बाहर की दुनिया के लिए जिन्ना अब भी पाकिस्तान के गवर्नर जनरल थे, लेकिन बंद कमरों में उनका शरीर तेजी से जवाब दे रहा था। लगातार खांसी, कमजोरी और सांस लेने में तकलीफ बढ़ती जा रही थी।

    Jinnah Sister

    डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें कराची से पहले क्वेटा और फिर जियारत ले जाया गया, ताकि ठंडी जलवायु में उनकी तबीयत में कुछ सुधार हो सके। 

    जिन्ना टीबी और फेफड़ों की गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे, लेकिन इसकी जानकारी बेहद सीमित लोगों तक ही थी। फातिमा जिन्ना, प्राइवेट डॉक्टर कर्नल इलाही बख्श और कुछ चुनिंदा अधिकारियों के अलावा शायद ही कोई जानता था कि पाकिस्तान का संस्थापक अपनी जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहा है। एक ऐसी घटना हुई जिसने इस कहानी को और रहस्यमय बना दिया।

    डॉ. इलाही बख्श की किताब With the Quaid-i-Azam During His Last Days के मुताबिक, जिन्ना अपनी बिगड़ती सेहत को लेकर देश के नाम एक आधिकारिक घोषणा करने पर विचार कर रहे थे। लेकिन तभी जियारत में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान उनसे मिलने पहुंचते हैं। लियाकत अली की मुलाकात का जिक्र फातिमा जिन्ना की किताब 'My Brother' में भी मिलता है।

    Qaid E Azam

    दोनों किताबों की जानकारी को मिलाकर बताया जाए तो लियाकत अली जिस समय जिन्ना से मिलने पहुंचे उस समय फातिमा जिन्ना के पास ऊपर वाले कमरे में बैठी थीं और जिन्ना बेड पर थे।

    खबर मिलती है कि लियाकत साहब कायद-ए-आजम से मिलने आए हैं। फातिमा नजाने क्यों उस समय टालने की कोशिश करती हैं लेकिन जिन्ना कहते हैं ‘फाती... तुम नीचे चली जाओ और उन्हें ऊपर भेज दो’। फातिमा नीचे जाती हैं, लियाकत अली ऊपर। दोनों के बीच बंद कमरे में करीब आधे घंटे तक बातचीत होती है। 

    डॉ. इलाही बख्श लिखते हैं 

    'उस मुलाकात के बाद न सिर्फ जिन्ना का मूड पूरी तरह बदल गया, बल्कि उनकी बीमारी को सार्वजनिक करने का विचार भी ठंडे बस्ते में चला गया। आखिर उस कमरे में क्या बात हुई, इसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड आज तक सामने नहीं आया।
    लेकिन जब लियाकत अली खान बाहर निकले और फातिमा वापस कमरे में पहुंचीं, तो उन्होंने अपने भाई के चेहरे पर पहले जैसी शांति नहीं देखी। उनके मुताबिक, जिन्ना बेहद थके हुए, परेशान और टूटे हुए दिखाई दे रहे थे। '

    फातिमा को लगता था, उनके भाई के स्वास्थ्य के तेजी से बिगड़ने के पीछे सिर्फ बीमारी नहीं थी, बल्कि उन्हें अपने कुछ सबसे करीबी साथियों से भी गहरा झटका लगा था। फातिमा ने विशेष रूप से पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान का जिक्र करते हुए संकेत दिया कि जिन्ना खुद को उनके व्यवहार से आहत और ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। 

    जिन्ना की मौत के बाद एक और विवाद शुरू हो गया था, जो आज तक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। सवाल था, क्या मोहम्मद अली जिन्ना शिया थे या सुन्नी?

    जिन्ना का जन्म एक खोजा इस्माइली परिवार में हुआ था। बाद में कई इतिहासकारों ने दावा किया कि उन्होंने इमामी शिया मत अपना लिया था, जबकि कुछ अन्य रिसर्चर्स का कहना है कि पब्लिक लाइफ में जिन्ना ने खुद को किसी एक फिरके से जोड़कर पेश नहीं किया। 

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    तिलक देवाशेर अपनी किताब Pakistan: At the Helm में लिखते हैं, 'उनके अंतिम संस्कार के समय यह विवाद खुलकर सामने आ गया। सबसे पहले कराची के गवर्नर जनरल हाउस में, सिर्फ परिवार और चुनिंदा लोगों की मौजूदगी में, शिया परंपरा के अनुसार जनाजे की नमाज अदा की गई। इसके कुछ देर बाद कराची में हजारों लोगों की मौजूदगी में सुन्नी रीति से सार्वजनिक नमाज-ए-जनाजा पढ़ाई गई, जिसकी इमामत मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी ने की।'

    यानी, एक ही दिन जिन्ना के दो जनाज़े हुए एक शिया परंपरा के अनुसार और दूसरा सुन्नी परंपरा के अनुसार। यही घटना आगे चलकर इस बहस की सबसे बड़ी वजह बनी कि आखिर मोहम्मद अली जिन्ना की धार्मिक पहचान क्या थी। जिस व्यक्ति ने एक नया मुल्क बनाया, उसकी अपनी मजहबी पहचान पर सवाल उसकी मौत के बाद भी बरकरार रहे।

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