लाहौर में झप्पी, कारगिल में धोखा! जब 'ऑपरेशन सफेद सागर' के पलटवार से थर्राया पाकिस्तान
कारगिल युद्ध में 'ऑपरेशन सफेद सागर' ने भारतीय वायुसेना की निर्णायक भूमिका को उजागर किया, जिसने पाकिस्तान के धोखे का जवाब दिया। ...और पढ़ें

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HighLights
ऑपरेशन सफेद सागर ने कारगिल युद्ध का रुख बदला।
मिराज-2000 ने लेजर-गाइडेड बमों का पहली बार उपयोग किया।
इजरायल ने भारत को महत्वपूर्ण तकनीकी सहायता प्रदान की।
गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। जमीन से ऊंचाई करीब 17 हजार फीट... माइनस में तापमान... सामने दुश्मन, जो पहाड़ की चोटी पर बैठा था और नीचे से चढ़ रहे भारतीय जवानों पर लगातार गोलियां बरसा रहा था। हर हमला भारी पड़ रहा था। तभी 26 मई 1999 की सुबह आसमान में भारतीय लड़ाकू विमानों की गर्जना सुनाई दी।
कुछ ही देर बाद पाकिस्तान के ठिकानों पर ऐसे सटीक हमले हुए कि उसकी पूरी रणनीति बिखरने लगी। यह था 'ऑपरेशन सफेद सागर'... वह मिशन जिसने कारगिल युद्ध का रुख बदल दिया। यह सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं था। यह उस भरोसे का जवाब था जिसे पाकिस्तान ने धोखा देकर तोड़ा था।
आज तारीख है 26 जुलाई। आज से ठीक 27 साल और 5 महीने पहले, फरवरी 1999 में दुनिया ने एक ऐसी तस्वीर देखी थी जिसने भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे तनाव के बीच शांति की नई उम्मीद जगा दी थी।
21 फरवरी 1999 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी दिल्ली से सदा-ए-सरहद बस में सवार होकर लाहौर पहुंचते हैं, इस बस में उस समय के विदेश मंत्री जसवंत सिंह, कपिल देव, देव आनंद और जावेद अख्तर जैरी बड़ी हस्तियां भी मौजूद थीं, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत इस समझौते को लेकर कितना सीरियर था।
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पाकिस्तान के वज़ीर-ए-आज़म नवाज शरीफ भी अटल जी और तमाम लोगों का गर्मजोशी से स्वागत करते हैं। वहीं दूर परवेज मुशर्रफ भी खड़े थे जिन्होंने अटल जी को देखकर सेल्यूट किया। इसके बाद दोनों नेताओं की मुलाकात सिर्फ एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि इसे दक्षिण एशिया में रिश्तों की नई शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा था।
शांति की पहल के पीछे कारगिल की साजिश
लाहौर शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों देशों ने लाहौर घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर किए। परमाणु शक्ति संपन्न होने के बावजूद भारत और पाकिस्तान ने बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने, आपसी विश्वास बढ़ाने और क्षेत्र में शांति बनाए रखने का संकल्प लिया। उस वक्त ऐसा लग रहा था कि शायद दशकों पुरानी दुश्मनी अब इतिहास बनने वाली है। लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि दोस्ती की इस तस्वीर के पीछे एक ऐसी साजिश आकार ले रही है, जो कुछ ही महीनों बाद कारगिल की बर्फीली चोटियों पर खूनी जंग में बदल जाएगी।
जब अटल और नवाज हाथ मिला रहे थे, उसी समय पाकिस्तान की सेना के कुछ अधिकारी, जिनका नेतृत्व जनरल परवेज मुशर्रफ कर रहे थे, कारगिल की ऊंची भारतीय चौकियों पर गुप्त घुसपैठ की योजना को अंजाम दे रहे थे। सर्दियों में भारतीय सेना मौसम की वजह से कुछ ऊंची पोस्ट अस्थायी रूप से खाली करती थी।
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पाकिस्तान ने इसी कमजोरी का फायदा उठाया। उसके सैनिक मुजाहिदीन का भेष बनाकर भारतीय सीमा के भीतर कई चोटियों पर कब्जा कर चुके थे। भारत को इसका अंदाजा भी नहीं था। बाद में खुद नवाज शरीफ ने स्वीकार किया कि लाहौर समझौते का उल्लंघन पाकिस्तान की गलती थी।
मई 1999 की शुरुआत में कारगिल के बटालिक क्षेत्र में रहने वाले चरवाहे ताशी नामग्याल ने कुछ संदिग्ध लोगों को पहाड़ों पर देखा। उसने भारतीय सेना को सूचना दी। शुरुआत में लगा कि कुछ घुसपैठिए होंगे, लेकिन जब जांच हुई तो पता चला कि मामला कहीं ज्यादा बड़ा है। पाकिस्तान की नियमित सेना कई ऊंची चोटियों पर बैठ चुकी थी और श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग पर नजर रख रही थी।
चरवाहे की खबर से 'ऑपरेशन विजय' और एयरफोर्स की चुनौती
भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय शुरू किया। लेकिन जल्दी ही समझ आ गया कि यह कोई नॉर्मल युद्ध नहीं है। दुश्मन 16 से 18 हजार फीट की ऊंचाई पर बैठा था। ऊपर बैठे सैनिक को नीचे चढ़कर आने वाले सैनिक पर हमेशा बढ़त मिलती है। हर हमला भारी नुकसान में बदल रहा था। तोलोलिंग, टाइगर हिल और द्रास की पहाड़ियां आग उगल रही थीं।
इसी बीच एक बड़ा सवाल दिल्ली पहुंचा। क्या भारतीय वायुसेना को युद्ध में उतारा जाए?
पिछला रिकॉर्ड देखा जाए तो… 1947, 1965 और 1971 की वॉर में एयरफोर्स ने बड़ी भूमिका निभाई थी। हालांकि, एक बात यह भी थी कि कारगिल का लेआउट थोड़ा अलग था। पहली बार लड़ाई इतनी ऊंचाई पर हो रही थी। पहाड़ों के बीच बम गिराना आसान नहीं था। जरा-सी चूक अपने ही सैनिकों पर भारी पड़ सकती थी।
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अब इस बीच पीएम वाजपेयी एक साफ निर्देश देते हैं… वो निर्देश यह था कि… भारतीय विमान नियंत्रण रेखा यानी LoC पार नहीं करेंगे। भारत दुनिया को यह संदेश देना चाहता था कि वह अपनी जमीन वापस ले रहा है, युद्ध का विस्तार नहीं कर रहा। यही फैसला बाद में भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत बना।
26 मई 1999… भारतीय वायुसेना ऑपरेशन सफेद सागर शुरू करती है। 1971 के बाद पहली बार कश्मीर में इतनी बड़ी हवाई कार्रवाई होने जा रही थी। लेकिन यह किसी फिल्म जैसा आसान मिशन नहीं था। इतनी ऊंचाई पर हवा पतली होती है। इंजन की क्षमता घट जाती है। बम की दिशा बदल जाती है। हेलीकॉप्टर की उड़ान सीमित हो जाती है। मिसाइल लॉक करना मुश्किल हो जाता है। फिर भी भारतीय वायुसेना ने चुनौती स्वीकार की।
शुरुआती झटकों के बाद 'मिराज-2000' और लेजर बमों का कहर
मिग-21, मिग-23, मिग-27, जगुआर और सबसे अहम मिराज-2000 को मिशन में लगाया गया। शुरुआत में मिग-27 और मिग-21 ने कई हमले किए, लेकिन कुछ टेक्निकल और कई तरह की चुनौतियां सामने आईं। एक मिग-27 के इंजन में खराबी आ गई। उसे बचाने पहुंचे मिग-21 को पाकिस्तानी मिसाइल ने मार गिराया।
फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता पाकिस्तान की कैद में चले गए जबकि स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा दुश्मन की गोली का शिकार हो गए। उनकी शहादत पूरे देश को झकझोर गई। इसके बाद रणनीति बदली गई। अब मैदान में आया मिराज-2000…. यहीं से ऑपरेशन सफेद सागर का असली चेहरा दुनिया ने देखा।
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मिराज-2000 ने पहली बार इतनी ऊंचाई पर लेजर-गाइडेड बमों का इस्तेमाल किया। पाकिस्तान की सप्लाई लाइन, गोला-बारूद के ठिकाने और कमांड सेंटर सटीक निशाने पर तबाह होने लगे। मुंथो ढालो में पाकिस्तान के बड़े लॉजिस्टिक बेस पर लगभग 1000 पाउंड के लेजर-गाइडेड बम गिराए गए।
यह हमला पाकिस्तान के लिए इतना विनाशकारी साबित हुआ कि उसकी रसद व्यवस्था बुरी तरह टूट गई। इसके बाद ऊंचाइयों पर बैठे सैनिकों तक खाना, गोला-बारूद और मदद पहुंचाना लगभग असंभव हो गया।
मिशन के पीछे है दिलचस्प कहानी
इस मिशन के पीछे एक दिलचस्प कहानी भी है। उस समय भारत के पास पर्याप्त लेजर-गाइडेड बम नहीं थे। फ्रांस कुछ तकनीकी मदद देने में हिचक रहा था। ऐसे समय में इजरायल ने बेहद तेजी से भारत को लेजर-गाइडेड बम किट, निगरानी उपकरण और जरूरी तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया। विशेषज्ञों के मुताबिक इसी मदद ने मिराज-2000 की मारक क्षमता कई गुना बढ़ा दी। ऐसा माना जाता है कि भारत-इजरायल रक्षा संबंधों की मजबूत नींव यहीं से पड़ी।
ऑपरेशन सफेद सागर के साथ-साथ एयरफोर्स उस दौरान दिन-रात टोही मिशन भी चला रही थी। दुश्मन की हर हरकत रिकॉर्ड की जा रही थी। सेना को रियल टाइम जानकारी मिल रही थी कि कौन-सी चोटी पर कितने सैनिक हैं, कहां बंकर बने हैं और किस रास्ते से सप्लाई पहुंच रही है। सेना और वायुसेना के बीच ऐसा तालमेल पहले कभी नहीं देखा गया था।
कारगिल युद्ध का एक बेहद रोचक किस्सा भी अक्सर लोगों की नजर से छूट जाता है।
पाकिस्तानी सेना लगातार दुनिया को यह बताने की कोशिश कर रही थी कि कारगिल में लड़ने वाले सिर्फ कश्मीरी मुजाहिदीन हैं। लेकिन एक इंटरसेप्टेड फोन कॉल ने पूरी कहानी बदल दी। भारतीय एजेंसियों ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ और लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अजीज खान के बीच हुई बातचीत रिकॉर्ड कर ली।
टेप से बेनकाब पाकिस्तान का झूठ
इस बातचीत से साफ हो गया कि घुसपैठ के पीछे सीधे पाकिस्तान की सेना है। भारत ने यह रिकॉर्डिंग सार्वजनिक कर दी। पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान का झूठ बेनकाब हो गया।
युद्ध के दौरान एक और दिलचस्प बात सामने आई।
भारतीय सेना को कई जगह पाकिस्तानी सैनिकों के पास ऐसे दस्तावेज मिले जिनसे साबित हुआ कि वे नॉर्दर्न लाइट इन्फैंट्री के नियमित सैनिक थे, कोई मुजाहिदीन नहीं। पाकिस्तान लंबे समय तक अपने मारे गए सैनिकों के शव लेने से भी इनकार करता रहा। उधर मोर्चे पर भारतीय सैनिक एक-एक चोटी वापस लेने के लिए जान की बाजी लगा रहे थे।

पत्रकार हरिंदर बावेजा अपनी किताब A Soldier's Diary: Kargil – The Inside Story में एक घटना का जिक्र करती हैं। तोलोलिंग की लड़ाई के दौरान एक गोला कश्मीर सिंह के बिल्कुल पास फटा। उनका हाथ शरीर से अलग हो गया। लेकिन उन्होंने दर्द की परवाह नहीं की। अपने कटे हुए हाथ को दूसरे हाथ से उठाया और सुरक्षित स्थान की तरफ बढ़ते रहे ताकि बाकी जवानों का मनोबल न टूटे। कारगिल सिर्फ हथियारों का युद्ध नहीं था, यह अद्भुत साहस का भी युद्ध था।
LoC न लांघने की कूटनीतिक जीत और भारत की वापसी
ऑपरेशन सफेद सागर का असर धीरे-धीरे साफ दिखने लगा। पाकिस्तान की सप्लाई टूट चुकी थी। उसकी चौकियां लगातार तबाह हो रही थीं। भारतीय सेना ने तोलोलिंग, प्वाइंट 5140, प्वाइंट 4875 और आखिरकार टाइगर हिल जैसी रणनीतिक चोटियों पर कब्जा वापस लेना शुरू कर दिया।
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भारत ने पूरी लड़ाई के दौरान LoC पार नहीं की। यही हमारी सबसे बड़ी नैतिक और कूटनीतिक जीत बनी। अमेरिका के साथ-साथ इंटरनेशनल लेवल पर पहली बार खुलकर पाकिस्तान पर दबाव बना। आखिरकार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अमेरिका जाकर राष्ट्रपति बिल क्लिंटन से मदद मांगनी पड़ी। लेकिन वहां भी उन्हें सेना हटाने की सलाह ही मिली।
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भारत सरकार के कैबिनेट सचिवालय में पूर्व विशेष सचिव तिलक देवाशेर अपनी किताब Pakistan at the Helm में लिखते हैं- अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान दोनों को कई संदेश भेजे। जून 1999 के मिडिल में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने दोनों देशों के नेताओं से बात की और पत्र लिखकर पाकिस्तान से सेना हटाने और भारत से संयम बरतने की अपील की।
लेकिन जैसे-जैसे पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने लगा, नवाज शरीफ घबरा गए।
क्लिंटन की दोटूक और 26 जुलाई को 'ऑपरेशन विजय' की फतेह
2 और 3 जुलाई 1999 को उन्होंने राष्ट्रपति क्लिंटन से बातचीत कर अमेरिका से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की, ताकि लड़ाई रुक सके और कश्मीर मुद्दे पर बातचीत शुरू हो। क्लिंटन ने साफ शब्दों में कहा कि जब तक पाकिस्तान LoC के पीछे अपनी सेना नहीं हटाता, तब तक अमेरिका कोई मध्यस्थता नहीं करेगा।
साल 26 जुलाई 1999… करीब दो महीने तक चले युद्ध के बाद भारत ने ऑपरेशन विजय की सफलता की घोषणा की। कारगिल की सभी प्रमुख चोटियां वापस भारतीय नियंत्रण में आ चुकी थीं। 500 से ज्यादा भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, लेकिन भारत ने अपनी जमीन वापस हासिल कर ली।
ऑपरेशन सफेद सागर ने भारतीय वायुसेना को भी हमेशा के लिए बदल दिया। इस युद्ध के बाद भारत ने सटीक हथियारों, आधुनिक निगरानी प्रणालियों, ड्रोन, एयरबोर्न अर्ली वार्निंग सिस्टम और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर पर तेजी से निवेश किया। यही बदलाव आगे चलकर बालाकोट एयर स्ट्राइक जैसी कार्रवाई की तकनीकी नींव बना।

आज भारतीय वायुसेना दुनिया की सबसे सक्षम एयर फोर्स में गिनी जाती है, वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ मॉडर्न मिलिट्री एयरक्राफ्ट (WDMMA) की ग्लोबल एयर पावर रैंकिंग में IAF.. इंडियन एयरफोर्स ने चीन की पीएलए एयर फोर्स को पीछे छोड़ दिया है। और सबसे बड़ी बात भारतीय वायुसेना ने यह ऐतिहासिक उपलब्धि लगातार पांचवीं बार हासिल की है।
आज जब भारतीय वायुसेना दुनिया की सबसे सक्षम एयर फोर्स में गिनी जाती है, तो कहीं न कहीं इस यात्रा की सबसे चमकदार कहानी कारगिल की उन्हीं बर्फीली चोटियों से होकर गुजरती है, जहां ऑक्सीजन कम थी, लेकिन भारतीय जवानों का हौसला आसमान से भी ऊंचा था।