युद्ध नहीं रुका तो आ सकता है 'महंगाई का तूफान', तेल से दाल-चावल तक क्या-क्या होगा महंगा; पढ़ें Inside Story
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की कोशिशें नाकाम होने से पश्चिम एशिया महासंग्राम की दहलीज पर है। इस संघर्ष से अब तक अरबों डॉलर का नुकसान हो चुका है ...और पढ़ें

पश्चिम एशिया की जंग से हिल जाएगी दुनिया की अर्थव्यवस्था; आपकी जेब और थाली पर कैसे पड़ेगा सीधा असर। इमेज- एआई जेनरेटेड
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पाकिस्तान में शांति समझौते के लिए अमेरिका और ईरान के वार्ताकारों के बीच 21 घंटे की बातचीत बेनतीजा रही। इससे दोनों पक्षों के बीच हुए दो सप्ताह के युद्धविराम के भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है। अमेरिका और ईरान ने फिर एक-दूसरे को झुकाने के लिए बयानबाजी तेज कर दी है।
ऐसे में सवाल यह भी उठ खड़ा हुआ है कि अब अमेरिका और ईरान पश्चिम एशिया में शांति के लिए बातचीत की मेज पर वापस लौटेंगे या फैसला अब हथियारों से ही होगा? पश्चिम एशिया में संघर्ष क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक मुद्दा है।
इसके राजनीतिक और आर्थिक असर की जद में पूरी दुनिया है। अगर संघर्ष नए सिरे से शुरू होता है तो इसके बहुत व्यापक और गंभीर नतीजे हो सकते हैं। ऐसे में पड़ताल का विषय यह है कि युद्धविराम समझौता पश्चिम एशिया में शांति ला पाएगा या जल्द ही टूट जाएगा...
पश्चिम एशिया को संवारने में कितना खर्च होगा?
अमेरिका- इजरायल और ईरान के बीच एक माह से अधिक समय तक चले युद्ध ने पश्चिम एशिया के देशों को मानवीय, सैन्य और आर्थिक रूप से भारी नुकसान पहुंचाया है।

इस युद्ध की वजह से दुनिया के कई देशों में ऊर्जा का संकट पैदा हो गया और वैश्विक अर्थव्यवस्था के बड़े संकट में फंसने की आशंका पैदा हो गई थी। एक अनुमान के मुताबिक, पश्चिम एशिया को फिर से संवारने में 600 अरब डॉलर खर्च होंगे।
कितनी मौतें हुई और कितने हताहत हुए?
इस युद्ध में सबसे अधिक जनहानि ईरान और लेबनान में हुई है, जबकि मिसाइल हमलों के कारण फारस की खाड़ी के लगभग हर देश में नागरिक प्रभावित हुए हैं।
| देश / समूह | मौतों की संख्या (अनुमानित) | विवरण |
| ईरान | 3,600 – 7,600+ | इसमें सैन्य कर्मियों के साथ-साथ 1,000 से अधिक नागरिक शामिल हैं। |
| लेबनान | 1,800+ | युद्ध के दौरान 10 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए। |
| इजरायल | 40 | 13 सैनिक और 27 नागरिक मारे गए, 7,400 से अधिक घायल। |
| अमेरिका | 15 | मुख्य रूप से सैन्य कर्मी, बेस हमलों में सैकड़ों घायल। |
| खाड़ी देश | 50 (कुल) | यूएई, कुवैत, बहरीन, सऊदी अरब और ओमान में मौतें दर्ज की गईं। |
आर्थिक और बुनियादी ढांचे का नुकसान
ईरान-इजरायल और अमेरिका की जंग में आर्थिक और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ है, जिससे उबरने में तकरीबन एक दशक लगेगा। इस युद्ध में रणनीतिक रूप से बिजली ग्रिड और पानी के संयंत्रों को निशाना बनाया गया
- ईरान: प्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान 145 अरब डॉलर (करीब 12 लाख करोड़ रुपये) से अधिक होने का अनुमान है। बुशहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र और लगभग 150 नौसैनिक जहाजों को भारी क्षति पहुंची है।
- खाड़ी देश: अरब देशों को 120 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान हुआ। ईरानी ने जवाब में दुबई, अबू धाबी और कुवैत के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों व पानी के संयंत्रों को निशाना बनाया।
- अमेरिका: पेंटागन के अनुसार, पहले महीने में सैन्य खर्च 18 अरब डॉलर रहा, जबकि भविष्य के अभियानों के लिए 200 अरब डॉलर की अतिरिक्त मांग की गई है।
उबरने में लगेगा एक दशक
- पुनर्निर्माण: अंतररष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) का अनुमान है कि पूरे क्षेत्र को दोबारा खड़ा करने में अगले 15 वर्षों में 600 अरब डॉलर का खर्च आएगा।
- वैश्विक प्रभाव: इस युद्ध ने 1970 के दशक के बाद से अब तक का सबसे बड़ा तेल आपूर्ति संकट पैदा कर दिया है।
- तेल कीमतों में भारी उछाल: युद्ध शुरू होते ही कच्चे तेल की कीमतों को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई।
- कीमतों का शिखर: मार्च 2026 के मध्य में ब्रेंट क्रूड की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई थी। युद्ध से पहले यह लगभग 75-80 डॉलर के आसपास थी।
- अस्थिरता: केवल एक सप्ताह के भीतर कीमतों में 25 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई, जो 1990 के खाड़ी युद्ध के बाद की सबसे बड़ी वृद्धि है।
होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी
ईरान ने जवाबी कार्रवाई के रूप में इस संकरे समुद्री रास्ते को आंशिक रूप से बाधित कर दिया था-
- आपूर्ति रुकना: प्रतिदिन लगभग 15 मिलियन बैरल तेल की आवाजाही रुक गई। इससे सऊदी अरब, इराक, यूएई और कुवैत से होने वाला निर्यात पूरी तरह ठप हो गया था।
- बीमा लागत: युद्ध क्षेत्र से गुजरने वाले तेल टैंकरों के लिए समुद्री बीमा प्रीमियम में 500 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक तेल आयात करता है। कीमतों में इस उछाल से भारत का चालू खाता घाटा बढ़ गया। सरकार को खुदरा पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क घटाना पड़ा है।
1- खाद्य सुरक्षा को खतरा
- आपूर्ति श्रृंखला: दुनिया के उर्वरक निर्यात का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा रुक गया है, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।
- ग्लोबल जीडीपी: मुद्रास्फीति के कारण 2026 के लिए ग्लोबल जीडीपी की वृद्धि दर का अनुमान 3.3 प्रतिशत से घटाकर 3.0 प्रतिशत कर दिया गया है।
2- महंगाई की मार
- परिवहन महंगा होने के कारण दुनिया भर में खाद्य और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ गई हैं।
- 11 अरब डॉलर से अधिक खर्च हुए हैं इजरायल के ईरान के खिलाफ युद्ध में शुरुआती अनुमान के अनुसार
3- बुनियादी ढांचे को नुकसान
- ईरान का तेल क्षेत्र: अमेरिकी और इजरायली हवाई हमलों ने ईरान के खार्ग द्वीप तेल टर्मिनल को भारी नुकसान पहुंचाया, जो ईरान के 90 प्रतिशत तेल निर्यात का केंद्र है।
- खाड़ी देशों पर हमले: ईरानी मिसाइलों ने सऊदी अरब और यूएई के कुछ रिफाइनरी और पाइपलाइन केंद्रों को निशाना बनाया, जिससे उनकी उत्पादन क्षमता में अस्थायी रूप से 15-20 प्रतिशत की गिरावट आई।
रणनीतिक तेल भंडार का उपयोग
तेल कीमतों को नियंत्रित करने के लिए दुनियाभर की सरकारों को कदम उठाने पड़े-
- आइईए की कार्रवाई: अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आइईए) के सदस्यों ने अपने आपातकालीन भंडार से लाखों बैरल तेल बाजार में जारी किया।
- अमेरिका का कदम: अमेरिका ने अपने रणनीतिक भंडार से तेल निकाला, लेकिन भंडार पहले से ही कम होने के कारण इसका असर सीमित रहा।
इजरायल फिर शुरू कर सकता है हमले
जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि पश्चिम एशिया में हाल के दिनों में जो शांति दिखाई दे रही है, असल में वह शांति नहीं, बल्कि एक अस्थायी ठहराव है।
अमेरिका और ईरान अभी युद्ध नहीं चाहते, इसलिए हालात कुछ समय के लिए शांत दिख रहे हैं, लेकिन इजरायल का मत अमेरिका से अलग है। भौगोलिक तथा सामरिक दृष्टि से ईरान तथा उसके समर्थित प्राक्सी संगठनों से सबसे ज्यादा खतरा इजरायल को है इसलिए इस क्षेत्र में अंदरूनी तनाव अब भी कायम है।
डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव बताते हैं कि यह अस्थायी ठहराव भी कितने समय तक चलेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि जिन मुददों पर असहमति के कारण यह युद्ध प्रारंभ हुआ था उसका समाधान कब और कैसे होगा। तीन प्रमुख समस्याएं हैं।

परमाणु कार्यक्रम पर टकराव
पहला ईरान का परमाणु कार्यक्रम, इजरायल के लिए यह एक बड़ा खतरा है। उसे डर है कि अगर ईरान के पास परमाणु हथियार आ गए, तो उसकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। हालांकि, इस मुद्दे के निपटारे के लिए अमेरिका तथा इजरायल की नीतियां भिन्न है।
प्रॉक्सी नेटवर्क का खतरा
उनके मुताबिक, अमेरिका इसे वार्ता तथा प्रतिबंधों से सुलझाना चाहता है, वहीं इजरायल सैन्य कार्रवाई का पक्षधर है। दूसरी समस्या ईरान का 'प्राक्सी नेटवर्क' यानी ऐसे संगठन हैं, जो सीधे सत्ता में नहीं हैं परंतु ईरान के समर्थन से काम करते हैं, जैसे लेबनान में हिज्बुल्ला और गाजा में हमास।
इजरायल के लिए ये संगठन सीधा खतरा हैं। अक्टूबर 2023 में बड़ी आतंकी घटना में हमास ने इजरायल के 1200 से ज्यादा लोगों को मार दिया था तथा सैंकड़ो लोगों को बंधक बनाकर सालों तक अपने कब्जे में रखा।
अमेरिका-इजरायल में भी हैं मतभेद
इसलिए इजरायल इनके खिलाफ लगातार सैन्य कार्रवाई करता रहता है। वहीं, अमेरिका इन मुद्दों को थोड़ा व्यापक नजरिये से देखता है। वह खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता और शांति बनाए रखने के लिए कई बार इजरायल से संयम बरतने को कहता है। इस तरह अमेरिका और इजरायल के बीच पूरी तरह विरोध नहीं है, लेकिन उनके सोच में अंतर जरूर है।
तीसरा मुद्दा ईरान में सत्ता परिवर्तन है। इस पर इजरायल और अमेरिका की आपसी सहमति है। अब सवाल उठता है कि क्या ऐसा हो सकता है कि अमेरिका और ईरान के बीच कुछ समझौता हो जाए, लेकिन इजरायल और ईरान के बीच तनाव जारी रहे। यह संभावना काफी हद तक सच लगती है क्योंकि इजरायल अपनी सुरक्षा को लेकर खुद फैसले लेता है।

सत्ता परिवर्तन का मुद्दा
अगर उसे खतरा महसूस होता है, तो वह अमेरिका की परवाह किए बिना भी कार्रवाई कर सकता है। यही वजह है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम भी हो जाए, तब भी इजरायल और ईरान के बीच टकराव जारी रह सकता है।
लेबनान इस पूरे समीकरण में सबसे खतरनाक मोर्चा बन सकता है। वहां हिज्बुल्ला की ताकत काफी ज्यादा है। दक्षिणी लेबनान लगभग हिजबुल्ला के कब्जे में है और वहां लेबनान सरकार की भी भूमिका सीमित है। अगर लेबनान में बड़ा संघर्ष होता है, तो वह संघर्ष पूरे क्षेत्र को युद्ध में धकेल सकता है, अर्थात अभी इस क्षेत्र में शांति संभव नहीं, बल्कि बिखरा हुआ संघर्ष चलता रहेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान में हुई शांति वार्ता बेनतीजा रही है। ईरान का होर्मुज स्ट्रेट को बंद करना तथा इजरायल का लेबनान पर लगातार हमला करना दो बड़े मसले हैं और दोनों पर ईरान तथा अमेरिका अड़े हुए हैं। ऐसे में मौजूदा शांति की सतह के नीचे अस्थिरता लगातार बनी हुई है और संघर्ष कभी भी दोबारा शुरू हो सकता है।
क्या लगता है सहमति बनेगी या जंग जारी रहेगी?
इंडिया फाउंडेशन के रिसर्च फेलो डॉ. पवन चौरसिया कहते हैं कि अमेरिका-इजरायल द्वारा 28 फरवरी को ईरान पर किए गए हमले से प्रारंभ हुआ क्षेत्रीय युद्ध देखते ही देखते पश्चिम एशिया से आगे निकल गया और इसने पूरे विश्व को अपने चपेट में ले लिया। ऐसा होने के कई कारण हैं।

दुनिया का क्या होगा युद्ध का असर?
भले ही इस युद्ध में केवल दो पक्ष अमेरिका एवं इजरायल और ईरान ही थे। परंतु इस युद्ध की जद में खाड़ी के वो सारे देश भी आ गए, जो अमेरिका के सहयोगी माने जाते हैं और जिनकी जमीन पर उसके सैन्य अड्डे मौजूद हैं।
एक महीने से अधिक चले इस युद्ध ने भारी जान माल की तबाही की और इस युद्ध में निर्णायक मोड़ 8 अप्रैल को आया, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ दो सप्ताह के संघर्षविराम की घोषणा की।
यह घोषणा उन्होंने अपने स्व-निर्धारित समय-सीमा से ठीक कुछ घंटे पहले की, जिसमें उन्होंने ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य को ब्लाक किए जाने की स्थिति में ईरान की संस्कृति को ही समाप्त कर देने की चेतावनी दे दी थी।
ऐसे में यह डर था कि युद्ध अब अपने सबसे भयानक स्तर पर आने वाला है लेकिन ऐन वक्त पर तथाकथित रूप से पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुआ यह समझौता आशाओं और संभावनाओं के साथ-साथ चुनौतियों के भी द्वार खोलने वाला है।

कौन-से कारक हैं जो शांति में रोड़ा बन रहे?
संघर्षविराम की सफलता को लेकर जानकार पूरी तरह से आश्वस्त नहीं हैं और इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि इस संघर्षविराम को अमेरिका और ईरान अपनी-अपनी तरह से परिभाषित करना चाहते हैं।
एक तरफ ईरान मानता है कि इस संघर्षविराम के अंतर्गत इजरायल द्वारा लेबनान के ऊपर की जा रही सैन्य कार्यवाही को भी रोका जाना चाहिए, वहीं अमेरिका ने यह साफ कर दिया है कि लेबनान इस संघर्षविराम से पूरी तरह से बाहर है।
दरअसल, लेबनान में इजरायल का प्रमुख निशाना शिया चरमपंथी संगठन हिजबुल्ला है, जिसे इजरायल अपने अस्तित्व और अपनी सुरक्षा के लिए एक प्रमुख चुनौती मानता है। वहीं ईरान के लिए वह फलस्तीनियों की आवाज को उठाने वाला उसका एक प्रमुख सहयोगी है जिसे हमास और हाउती के साथ-साथ इजरायल के खिलाफ ‘प्रतिरोध की धुरी’ माना जाता है।
दूसरा कारण है कि जो ईरान की दस सूत्रीय मांग है, वो अमेरिका के पंद्रह सूत्रीय मांग से न केवल अलग हैं, बल्कि परस्पर विरोधी भी है। उदाहरण के लिए, ईरान की यह मांग है कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपने सभी सैन्य अड्डों को समाप्त कर दे।

इसके विपरीत अमेरिका इजरायल और अपने अन्य सहयोगियों की सुरक्षा के लिए चाहता है कि ईरान पूरी तरह से अपने परमाणु कार्यक्रम को त्याग दे। ऐसे में दोनों देशों का सभी शर्तों पर सहमत होना मुश्किल नजर आ रहा है।
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हिजबुल्ला और मांगों का टकराव
भारत की दृष्टि से देखा जाए तो यह संघर्ष विराम, यदि वास्तविक रूप से लागू होता है, तो उसके लिए काफी सकारात्मक रहेगा। पश्चिम एशिया भारत का दूरस्थ नहीं निकट का पड़ोसी है जिसके साथ कहीं न कहीं भारत की समुद्री सीमा भी लगती है।
भारत के लिए यह क्षेत्र राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की गतिविधि का सीधा प्रभाव भारत के हितों पर पड़ता है। भारत की ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा तो परोक्ष रूप से पश्चिम एशिया पर अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर है क्योंकि यह क्षेत्र भारत के गैस एवं तेल आयात का एक बड़ा स्रोत है।
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