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    भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में SC का CBI जांच से इनकार, याचिकाकर्ता से कहा- हाई कोर्ट जाइए

    Updated: Tue, 30 Jun 2026 12:32 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के भोजपुर जिले में भरत भूषण तिवारी के एनकाउंटर मामले में सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। ...और पढ़ें

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    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के भोजपुर जिले में हुए भरत भूषण तिवारी के एनकाउंटर मामले में सीबीआई जांच की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने PIL दायर करने वाले वकील से कहा कि वे अपनी याचिका के साथ संबंधित हाई कोर्ट जा सकते हैं।

    इस PIL में उन पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई है, जिन्होंने भरत तिवारी को एनकाउंटर में मार गिराय। PIL में एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति गठित करने की भी मांग की गई थी।

    जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वे इस मामले को लेकर पटना हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाएं।

    सुप्रीम में क्या हुआ?

    जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू हुई, पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा- आप कौन हैं?

    याचिका दायर करने वाले वकील विशाल तिवारी ने दलील दी कि यह जनहित याचिका (PIL) व्यापक जनहित में दायर की गई है। इस पर पीठ ने कहा, "नहीं, माफ कीजिए। इस पर सुनवाई नहीं होगी आपको हाई कोर्ट जाने की छूट है।

    याचिका में सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) से जांच की भी मांग की गई थी, जिसमें कहा गया था कि इस मामले में तुरंत, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की जरूरत है।

    क्या है पूरा मामला?

    बिहार के भोजपुर जिले के बिलौटी गांव के रहने वाले भरत भूषण तिवारी की 17 जून को पुलिस एनकाउंटर में हुए मौत ने विवाद खड़ा कर दिया है। उनके परिवार का दावा है कि पुलिस की गोली लगने से पहले उन्होंने सरेंडर कर दिया था और अपना हथियार फेंक दिया था। बिहार सरकार ने शनिवार को इस घटना की न्यायिक जांच की घोषणा की थी।

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    अपनी याचिका में वकील विशाल तिवारी ने कहा है कि लोकतांत्रिक समाज में पुलिस को सजा देने वाली अथॉरिटी नहीं बनने दिया जा सकता, क्योंकि यह अधिकार सिर्फ न्यायपालिका के पास है। बिहार की घटना का जिक्र करते हुए याचिका में कहा गया है कि इससे पुलिस की कार्यप्रणाली और एनकाउंटर के दौरान बल के इस्तेमाल पर बहस छिड़ गई है।

    क्या है याचिका में?

    याचिका में कहा गया कि पिछले कुछ सालों में एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल हत्याओं (न्यायिक प्रक्रिया से बाहर की हत्याओं) की घटनाएं बढ़ी हैं, जो कानून के शासन के लिए एक बड़ी चुनौती है। इसमें दावा किया गया कि हाल ही में पूरे बिहार में पुलिस एनकाउंटर तेजी से बढ़े हैं।इसमें दावा किया गया कि तिवारी की हत्या संदिग्ध लगती है।

    इसमें सुप्रीम कोर्ट के 2014 के एक फैसले का जिक्र किया गया, जिसमें पुलिस एनकाउंटर की जांच के मामलों में कई गाइडलाइंस जारी की गई थीं, जिनमें मौत या गंभीर चोट लगी हो।

    याचिका में कहा गया, "फर्जी एनकाउंटर या पुलिस कस्टडी/जेल में आरोपी की मौत/हत्या कानून के शासन को कमजोर करती है। अगर इन हत्याओं को यह कहकर सही ठहराया जाता है कि मारा गया आरोपी गैंगस्टर था या उसका आपराधिक इतिहास रहा है, तो यह समाज को आंख के बदले आंख वाले कानून की ओर ले जाएगा।"

    याचिका में केंद्र से यह निर्देश देने की भी मांग की गई है कि वह सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को एडवाइज़री जारी करे ताकि वे सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले में दिए गए निर्देशों और गाइडलाइंस का पालन करें।

    क्या बोली पुलिस?

    पुलिस के बयान में कहा गया कि तिवारी ने लगातार पुलिस पर गोली चलाई, जिसके जवाब में आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी और इस दौरान उनके पैर में गोली लगी। घायल भरत तिवारी की मौत इलाज के लिए पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल ले जाते समय हो गई। (समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)

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