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    जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विकास, बुनियादी सुविधाओं का हो सहज वितरण

    By Sanjay PokhriyalEdited By:
    Updated: Sat, 24 Jul 2021 10:55 AM (IST)

    जनसंख्या नियंत्रण नीति को अनेक लोग आस्थाओं के साथ भी जोड़ कर देखते हैं और समर्थन या विरोध इसी आधार पर करते हैं। बढ़ती जनसंख्या का धार्मिक असुंतलन एक वर्ग के लोगों के मन में आशंका भी उत्पन्न करता है।

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    जागरूक व्यक्तियों और संस्थाओं को इस दिशा में पहल करनी चाहिए।

    शिवप्रकाश। उत्तर प्रदेश सरकार नई जनसंख्या नीति (2021-2030) लेकर आई है। इसके उद्देश्यों को घोषित करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि इस नीति से संसाधनों की आपूर्ति, जनसंख्या विस्फोट में रोकथाम, मूलभूत सुविधाओं मसलन रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य का जन सामान्य तक सहज वितरण हो पाएगा। वर्ष 1968 में पाल आर एहरिच ने अपने शोध पत्र ‘द पापुलेशन बम’ में जनसंख्या विस्फोट को अनियंत्रित कैंसर के समान बताया है। अधिक जनसंख्या गरीबी, पर्यावरण में क्षरण एवं राजनीतिक अस्थिरता पैदा करती है। साथ ही बेरोजगारी व अपराधों में वृद्धि का कारण भी बनती है।

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    जनसंख्या नियंत्रण नीति सामने आने के साथ ही कुछ लोगों द्वारा विरोध का स्वर भी दिखाई देने लगा है। कुछ ने तो इसे विधि के विधान में व्यवधान बताया। हम जानते हैं कि प्राकृतिक संसाधन एवं पर्यावरण जो मनुष्यों के जीवन को बचाने के लिए आवश्यक है, वह भी विधि का विधान ही है। जल, जंगल और जमीन को नष्ट करने से मनुष्य भी नहीं बचेगा। बढ़ती जनसंख्या इन सभी को प्रभावित करती है। बेतहाशा जनसंख्या वृद्धि के कारण सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सरकारी सुविधाएं भी अपर्याप्त होती जा रही हैं। गत दिनों कोरोना संक्रमण के बेहद प्रभावी होने के दौर में सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं पर्याप्त प्रयास करने के बाद भी अपर्याप्त ही थीं। ऐसा नहीं है कि यह चुनौती केवल स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में ही उभरी है। ये चुनौतियां शिक्षा के क्षेत्र में भी हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर बड़ी आबादी का कितना दबाव बढ़ गया है यह किसी से छिपा नहीं है। ये चुनौतियां तेजी से बढ़ती आबादी के मुकाबले बुनियादी ढांचे के विकास से भी जुड़ी हैं।

    ऐसा नहीं है कि ज्यादा जनसंख्या से केवल उन्हीं चीजों पर बोझ बढ़ रहा है जो सरकार की तरफ से दी जानी हैं। प्राकृतिक संसाधनों की बात करें तो भोजन, पानी, ईंधन आदि की चुनौती भी देश के सामने बड़ी होती जा रही है। सामाजिक असमानता का दायरा भी देश में बढ़ता जा रहा है। प्रत्येक राजनीतिक पार्टी चुनाव घोषणा पत्र जारी करते समय रोजगार देने का वायदा करती है, लेकिन इसमें सफल नहीं हो पाती। कारण रोजगार सृजन सीमित है। लिहाजा बेरोजगारों की संख्या में वृद्धि के कारण इनका समन्वय ही नहीं हो पाता।

    भारत में जनसंख्या विस्फोट की विकराल समस्या को समझने के लिए आंकड़ों पर ध्यान देना होगा। जनगणना 2011 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में जनसंख्या वृद्धि दर 17.2 फीसद रही है। इसे वार्षिक आधार पर इस प्रकार समझा जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र की जनसंख्या रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2010 से लेकर 2019 के बीच भारत की आबादी की वृद्धि दर 1.2 से बढ़कर 1.36 हो गई है जो चीन के मुकाबले दोगुनी है। इस आंकड़े के मुताबिक 2020 में भारत की आबादी लगभग 138 करोड़ हो चुकी है।

    जनसंख्या नियंत्रण नीति को अनेक लोग आस्थाओं के साथ भी जोड़ कर देखते हैं और समर्थन या विरोध इसी आधार पर करते हैं। बढ़ती जनसंख्या का धार्मिक असुंतलन एक वर्ग के लोगों के मन में आशंका भी उत्पन्न करता है। घटनाओं पर संगठित प्रतिक्रिया एवं चुनाव में सामूहिक मतदान इस आशंका को और भी पुष्ट करते हैं। हमें जनसंख्या नीति का समर्थन या विरोध लिंग, भाषा, क्षेत्र अथवा आस्था के आधार पर करने के या समाज हित व भविष्य की चुनौतियों को आधार मानकर करना चाहिए। उत्तर प्रदेश सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण नीति में सहायक तत्वों को प्रोत्साहन एवं इसका अनुपालन न करने वालों को हतोत्साहित करने की व्यवस्था की है। इस व्यवस्था के साथ साथ समाज में जनजागरण का प्रयास भी करना होगा। जागरूक व्यक्तियों और संस्थाओं को इस दिशा में पहल करनी चाहिए।

    [राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री, भाजपा]