'कोलेजियम की कार्यवाही को लेकर नहीं खोलना चाहते हैं नए विवाद का पिटारा', हाई कोर्ट जज की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक नियुक्तियों में कोलेजियम की कार्यवाही को लेकर नया विवाद खोलने से इनकार किया। ...और पढ़ें
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न्याय की चौखट पर 'धैर्य' की परीक्षा (फोटो-पीटीआई)
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने कोलेजियम कार्यवाही में नया विवाद खोलने से इनकार किया।
हाईकोर्ट जज पद के लिए वरिष्ठता ही एकमात्र पैमाना नहीं है।
याचिकाकर्ता को प्रशासनिक स्तर पर अपनी बात रखने की छूट मिली।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। न्यायपालिका की गरिमा और उसकी आंतरिक व्यवस्था की शुचिता को बनाए रखना कितना जरूरी है, इसका एक जीवंत उदाहरण देश की सर्वोच्च अदालत में देखने को मिला।
हिमाचल प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेहद भावपूर्ण लेकिन दोटूक शब्दों में कहा, 'हम कोलेजियम की कार्यवाही को लेकर किसी भी नए विवाद का पिटारा (पेंडोरा बॉक्स) नहीं खोलना चाहते।'
कोर्ट के इस रुख ने साफ कर दिया कि जजों की नियुक्ति में संस्थागत निर्णय और वरिष्ठता के बीच एक महीन रेखा होती है, जिसका सम्मान हर हाल में किया जाना चाहिए।
वरिष्ठता ही एकमात्र पैमाना नहीं
मामला हिमाचल प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी से जुड़ा था, जिनका दर्द यह था कि हाईकोर्ट के जज पद के लिए उनके जूनियर अधिकारियों के नामों की सिफारिश कर दी गई, जबकि वह राज्य के सबसे वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी हैं और उनकी 10 साल की सेवा अभी बाकी है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा, 'सिर्फ इसलिए कि कोई वरिष्ठता सूची में ऊपर है, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह हाई कोर्ट जज के रूप में पदोन्नति की सिफारिश का हकदार हो जाता है।'
कोर्ट ने बेहद संजीदगी से समझाया कि जजों की नियुक्ति का फैसला अंततः हाईकोर्ट कोलेजियम की 'व्यक्तिगत संतुष्टि' (सब्जेक्टिव सैटिस्फेक्शन) पर निर्भर करता है।
न्यायिक पक्ष पर बैठकर सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम को यह निर्देश नहीं दे सकता कि आप अमुक नाम पर इस तरह विचार करें। याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट बलबीर सिंह ने दलील रखी।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम ने दो जून को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के जज के तौर पर तीन न्यायिक अधिकारियों - चिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल - की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।
न्याय की चौखट पर 'धैर्य' की परीक्षा
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की चिंताओं को समझते हुए उन्हें ढांढस भी बंधाया और धैर्य रखने की नसीहत दी। पीठ ने रिकार्ड का हवाला देते हुए कहा कि ऐसा कहीं नहीं दिख रहा कि हाईकोर्ट कोलेजियम ने उनके नाम को खारिज कर दिया है। हो सकता है कि उनका नाम अभी विचाराधीन हो या उसे कुछ समय के लिए टाल दिया गया हो।
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मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को प्रशासनिक स्तर पर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपनी बात रखने की छूट दी और मामले का निपटारा कर दिया।
इस पूरी घटना ने यह संदेश दिया कि न्याय के मंदिर में सिर्फ कानून की किताबें नहीं बोलतीं, बल्कि व्यवस्था पर अटूट विश्वास और 'धैर्य' भी न्याय प्रणाली की रीढ़ हैं।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)