तमिलनाडु में विजय का 'कैबिनेट ऑफ फर्स्ट्स', युवा-दलित और नए चेहरों को मिला मौका
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने 2026 चुनाव के बाद "कैबिनेट ऑफ फर्स्ट्स" का गठन किया है, जिसमें पहली बार गठबंधन सरकार, युवा, दलित और ब्राह्मण ...और पढ़ें

विजय कैबिनेट ने बदली तमिलनाडु की राजनीति (फाइल फोटो)

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने मंत्रिमंडल विस्तार के साथ राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव करने की कोशिश की है। 2026 विधानसभा चुनाव के बाद बने इस नए मंत्रिमंडल को “कैबिनेट ऑफ फर्स्ट्स” कहा जा रहा है, क्योंकि इसमें कई ऐसे फैसले लिए गए हैं जो राज्य की राजनीति में पहले कभी नहीं देखे गए।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि तमिलनाडु में पहली बार गठबंधन सरकार का मंत्रिमंडल बना है। पिछले कई दशकों से राज्य में एक ही पार्टी की सरकार और उसी पार्टी का मंत्रिमंडल बनने की परंपरा रही थी, लेकिन टीवीके के नेतृत्व वाली सरकार ने इस व्यवस्था को बदल दिया है।
इस नए मंत्रिमंडल में युवाओं को भी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। 33 मंत्रियों में से 11 मंत्री 40 साल से कम उम्र के हैं। इसे राज्य के इतिहास का सबसे युवा मंत्रिमंडल माना जा रहा है।
नए चेहरों पर विजय का बड़ा दांव
मुख्यमंत्री विजय ने लगभग पूरी तरह नए चेहरों पर भरोसा जताया है। 33 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में केवल एक मंत्री ऐसा है, जिसे पहले मंत्री बनने का अनुभव है। बाकी सभी पहली बार सरकार में शामिल हुए हैं।
सरकार ने सामाजिक संतुलन पर भी खास ध्यान दिया है। मंत्रिमंडल में सात दलित मंत्रियों को जगह दी गई है। माना जा रहा है कि सहयोगी दल वीसीके के मंत्रियों के शामिल होने के बाद यह संख्या बढ़कर आठ हो सकती है।
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पिछली डीएमके सरकार, जो सामाजिक न्याय की राजनीति को अपना मुख्य आधार मानती थी, उसमें केवल चार अनुसूचित जाति मंत्री थे। ऐसे में विजय सरकार का यह कदम बड़ा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है।
ब्राह्मण मंत्रियों को जगह देकर तोड़ी पुरानी परंपरा
विजय सरकार ने दो ब्राह्मण मंत्रियों को भी मंत्रिमंडल में शामिल किया है। इसे तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति से बड़ा बदलाव माना जा रहा है। डीएमके और एआईएडीएमके जैसी पार्टियां लंबे समय से ब्राह्मण समुदाय को मंत्रिमंडल में जगह देने से बचती रही हैं।
यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता, जो खुद ब्राह्मण समुदाय से थीं, उन्होंने भी अपने कार्यकाल में ब्राह्मण मंत्रियों को शामिल नहीं किया था। द्रविड़ राजनीति की शुरुआत ही ब्राह्मणवाद विरोध और सामाजिक न्याय के मुद्दों से हुई थी। ऐसे में विजय का यह फैसला राजनीतिक तौर पर काफी अहम माना जा रहा है।
डीएमके-एआईएडीएमके की राजनीति को चुनौती
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विजय का यह मंत्रिमंडल डीएमके और एआईएडीएमके की लंबे समय से चली आ रही राजनीति को चुनौती देने की रणनीति का हिस्सा है। युवा चेहरों, अलग-अलग समुदायों और नए सामाजिक समीकरणों को साथ लाकर विजय सरकार खुद को एक आधुनिक और ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली सरकार के रूप में पेश करना चाहती है।
हालांकि, सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इतने नए चेहरों वाला यह मंत्रिमंडल प्रशासनिक अनुभव की कमी के बावजूद कितना प्रभावी काम कर पाता है।
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