Delimitation: क्या होता है परिसीमन, जो बदल देगा लोकसभा और विधानसभा की सीटों का गणित?
केंद्र सरकार लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में बढ़ रही है, जिससे परिसीमन बहस का केंद्र बन गया है। यह निर्वाचन ...और पढ़ें


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। केंद्र सरकार लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 करने और महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसके साथ ही परिसीमन बहस के केंद्र में आ गया है। राजनीति में परिसीमन का अर्थ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को दोबारा निर्धारित करना होता है। यह केवल सीटों का गणित नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन तय करने वाली प्रक्रिया भी है।
लोकसभा एवं विधानसभाओं की सीटें किस राज्य में कितनी होंगी और उनकी सीमाएं कैसी होंगी, यह परिसीमन से ही तय होता है। चुनावी प्रक्रिया में महिलाओं को आरक्षण देने के लिए सरकार 131वां संविधान संशोधन विधेयक और परिसीमन विधेयक पेश करने जा रही है।
इसके लिए 16 अप्रैल से तीन दिनों का संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है। सीट निर्धारण के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाया जाना है। यहीं से विवाद शुरू हो गया है।
विपक्षी दलों का कहना है कि परिसीमन से दक्षिण भारत की तुलना में उत्तर के राज्यों की सीटों में अधिक वृद्धि हो सकती है। इससे भाजपा को लाभ मिल सकता है, क्योंकि इन राज्यों में उसकी स्थिति मजबूत है, जबकि दक्षिण और अन्य राज्यों की हिस्सेदारी घट सकती है।
हालांकि सरकार की ओर से स्थिति स्पष्ट की गई है कि सभी राज्यों मे पचास फीसद सीटें बढ़ाई जाएंगी। इसे अलग से शेड्यूल में दिखाया जाएगा और बिल पेश करने के वक्त सदन में सभी दलों को आश्वस्त किया जाएगा।
परिसीमन क्या है और कैसे होता है?
परिसीमन संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसके तहत निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय होती हैं। आखिरी परिसीमन 2001 की जनगणना के आधार पर 2002 में हुई थी। लेकिन संवैधानिक बाध्यता के कारण सीटों की संख्या नहीं बढ़ी लिहाजा देश में ऐसे कई संसदीय क्षेत्र हैं जहां एक क्षेत्र में 20-25 लाख तक की आबादी होती है।
अब 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन भी किया जाएगा और चूंकि सीटों की संख्या बढ़ने वाली है लिहाजा जनसंख्या का वितरण भी सही होगा और जनता को सही तरह से प्रतिनिधित्व भी मिलेगा। अब तक चार बार परिसीमन हुआ- 1952, 1963 , 1973 और 2002। आखिरी बार 1973 में सीटों की संख्या 522 से बढ़ाकर 545 किया गया था।
साथ ही 1976 में जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहन देने के लिए सीटों के पुनर्निर्धारण पर रोक लगा दी गई थी। बाद में इस रोक को 2001 और फिर 2026 तक बढ़ाया गया। अब यह रोक हटने वाली है, जिससे परिसीमन के बाद देश के चुनावी नक्शे में व्यापक बदलाव आ सकता है।
नए प्रस्ताव में क्या बदलाव है?
केंद्र सरकार ने परिसीमन का मसौदा तैयार कर लिया है, जिसमें तीन प्रमुख बदलाव का प्रस्ताव है। लोकसभा सीटों की संख्या 545 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। इसमें राज्यों की सीटें 530 से बढ़ाकर 815 और केंद्र शासित प्रदेशों की सीटें 20 से बढ़ाकर 35 तक करने की बात कही गई है। यानी अब तक केंद्र में सत्ता के लिए जो बहुमत का आंकड़ा 272 का था वह बढ़कर 426 हो जाएगा। दूसरा बदलाव जनसंख्या के आधार से जुड़ा है।
पहले तय था कि नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सीटों का निर्धारण होगा, लेकिन अब यह निर्णय संसद पर छोड़ा जाएगा। यानी बहुमत से यह तय किया जा सकेगा कि परिसीमन के लिए किस जनगणना को आधार बनाया जाए। सरकार की ओर से 2011 की जनगणना को आधार बनाने की बात कही गई है।
तीसरा बदलाव 1976 से लागू उस सुरक्षा प्रविधान को हटाने से जुड़ा है, जो जनसंख्या नियंत्रण वाले राज्यों को राजनीतिक नुकसान से बचाता था। अब जनसंख्या आधारित सीट निर्धारण का रास्ता साफ हो सकता है।
उत्तर बनाम दक्षिण
परिसीमन को लेकर विपक्षी दलों और दक्षिण के राज्यों की से विरोध किया जा रहा है। उनका आरोप है कि दक्षिण के राज्यों की सीटें घटेंगी और भाजपा शासित केंद्र सरकार की ओर से यह विधेयक इसिलए लाया जा रहा है ताकि केंद्र की सत्ता में दबदबा बरकरार रखा जा सके।
उनकी ओर से कहा जा रहा है कि हिंदी भाषी राज्यों की लोकसभा सीटों की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत से बढ़कर 43 प्रतिशत से अधिक हो सकती है, जबकि दक्षिण भारत की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत से घटकर लगभग 21 प्रतिशत रह सकती है। लेकिन ऐसी स्थिति तब होगी जब सीटों की संख्या जनसंख्या के अनुपात में बढ़ेंगी।
सरकार की ओर से तर्क दिया जा रहा है कि 2011 की जनसंख्या को आधार इसलिए बनाया जाएगा ताकि वितरण सही हो सके। सीटों की संख्या अलग से शेड्यूल में होगी जिसमें यह दिखाया जाएगा कि किस राज्य में कितनी सीटें बढ़ रही है। उनका दावा है कि हर राज्य में पचास फीसद सीटें बढ़ेंगी।
परिसीमन आयोग का गठन कैसे होता है?
नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक संसद से पारित होने के बाद केंद्र सरकार अधिसूचना जारी कर परिसीमन आयोग का गठन करेगी। आयोग का कार्यकाल केंद्र सरकार तय करती है और आवश्यकता होने पर इसे बढ़ाया भी जा सकता है। सामान्यतया इतने बड़े क्षेत्र के सीमांकन और वाद प्रतिवाद, आपत्तियां, हर क्षेत्र के मैप के प्रकाशन आदि में डेढ़ से दो साल का वक्त लगता है।
अध्यक्ष और सदस्य कौन होते हैं?
आयोग के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। इसके पदेन सदस्यों में मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नामित चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के राज्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। प्रत्येक राज्य में 10 सहयोगी सदस्य होते हैं। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नामित पांच सांसद और विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नामित पांच विधायक। इन्हें मतदान का अधिकार नहीं होता, लेकिन ये सुझाव और स्थानीय इनपुट देते हैं।
आयोग के अधिकार और कामकाज
परिसीमन आयोग को सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां होती हैं। यह गवाहों को समन जारी कर सकता है और दस्तावेज एवं सार्वजनिक अभिलेख मांग सकता है। आयोग पहले मसौदा प्रस्ताव जारी करता है, फिर जनता से आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित करता है तथा जनसुनवाई आयोजित करता है। इसके बाद अंतिम आदेश जारी किया जाता है।
अधिसूचना जारी होने के बाद आयोग के आदेशों को कानून का दर्जा मिल जाता है। इन्हें न अदालत में चुनौती दी जा सकती है और न ही संसद या विधानसभा इनमें संशोधन कर सकती है। ये आदेश अगली लोकसभा या विधानसभा के गठन के साथ लागू होते हैं। चुनाव आयोग बाद में केवल तकनीकी त्रुटियों को सुधार सकता है, लेकिन सीमाओं में बदलाव नहीं कर सकता।
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