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    तीन दिन में पाकिस्तान को तीन बार दी पटखनी: कौन थे मेजर होशियार सिंह दहिया? बॉर्डर 2 में दिखी असली ‘टैंक वॉरियर’ की जांबाजी

    Updated: Tue, 27 Jan 2026 08:21 PM (IST)

    मेजर होशियार सिंह दहिया, जिनकी बहादुरी 1971 के भारत-पाक युद्ध में बसंतर की लड़ाई में दिखी, एक बार फिर 'बॉर्डर 2' फिल्म से सुर्खियों में हैं। उन्होंने ...और पढ़ें

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    जब एक अफसर बना पूरी बटालियन की ताकत: मेजर होशियार सिंह दहिया (फोटो- जागरण ग्राफिक्स)

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    गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। जब होशियारी के साथ बहादुरी का मेल हो जाता है तो दुश्मन के दांत खट्टे होना लाजिमी है। भारतीय इतिहास सीमा पर हमारे जाबांजों के साहस भरे किस्सों से भरा पड़ा है। एक खोजिए, तो अदम्य वीरता की दस मिसालें मिल जाएंगी। लेकिन मेजर होशियार सिंह दहिया की कहानी कुछ अलग ही है।

    बॉर्डर 2 रिलीज हो चुकी है और चारों ओर इसकी चर्चा है। यह सिर्फ किसी एक दिन की जीत की कहानी नहीं, बल्कि वह सच्ची दास्तां है, जिसमें मेजर होशियार सिंह ने घायल शरीर लेकिन अडिग मन के साथ लगातार तीन दिनों तक दुश्मन के भीषण हमलों को नाकाम किया। यह वही कहानी है, जिससे आज भी हमारे सैनिक प्रेरणा लेते हैं, सीखते हैं और सरहद पर गर्व से लिखते हैं - भारत माता की जय।

    मेजर होशियार सिंह दहिया: एक ऐसा नाम, जो बॉर्डर 2 की रिलीज के बाद एक बार फिर सुर्खियों में है। अनुराग सिंह के निर्देशन में बनी यह फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध की सच्ची घटनाओं पर आधारित है और खास तौर पर बसंतर सेक्टर की ऐतिहासिक लड़ाई Battle of Basantar को पर्दे पर जीवंत करती है।

    फिल्म में वरुण धवन ने मेजर होशियार सिंह का किरदार निभाया है और उस बहादुर सैनिक की गाथा को नई पीढ़ी तक पहुंचाया है, जिसने युद्धभूमि में अदम्य साहस और असाधारण नेतृत्व का परिचय दिया। बॉर्डर 2 केवल एक युद्ध फिल्म नहीं, बल्कि कर्तव्य, साहस और राष्ट्रभक्ति की प्रेरक कथा है।

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    कौन थे मेजर होशियार सिंह दहिया?

    मेजर होशियार सिंह दहिया का जन्म 5 मई 1937 को हरियाणा के सोनीपत जिले के सिसाना गांव में एक जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम चौधरी हीरा सिंह था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने रोहतक के जाट कॉलेज में अध्ययन किया। बाद में उन्होंने भारतीय सेना में जाने का निर्णय लिया और 30 जून 1963 को ग्रेनेडियर्स रेजीमेंट में अधिकारी के रूप में भर्ती हुए।

    होशियार सिंह एक कुशल वॉलीबॉल खिलाड़ी भी थे और राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके थे। उनके खेल कौशल से प्रभावित होकर ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया था।

    बैटल ऑफ बसंतर: तीन दिन की ऐतिहासिक जांबाजी

    15, 16 और 17 दिसंबर 1971: इन तीन दिनों में मेजर होशियार सिंह ने जिस अद्भुत साहस और नेतृत्व का परिचय दिया, उसने पाकिस्तान के हर नापाक मंसूबे को ध्वस्त कर दिया। हालात ऐसे बने कि एक दिन पाकिस्तानी सैनिक अपने हथियार, साजो-सामान ही नहीं, बल्कि 85 जवानों को भी छोड़कर मैदान से भागने को मजबूर हो गए।

    कहानी की शुरुआत गुरदासपुर और अमृतसर से सटे शकरगढ़ क्षेत्र से होती है। 1971 के युद्ध की रणनीति के तहत भारतीय सेना की 3 ग्रेनेडियर्स बटालियन को बसंतर नदी पर ब्रिजहेड स्थापित करने का कार्य सौंपा गया था। इसी दौरान मेजर होशियार सिंह को पाकिस्तान के जरपाल क्षेत्र पर कब्जा करने का आदेश मिला।

    यह इलाका पाकिस्तानी चौकियों और भारी बारूदी सुरंगों से भरा हुआ था। दुश्मन ने मशीनगन और मोर्टार फायर से भारतीय सैनिकों को रोकने की भरसक कोशिश की, लेकिन भारतीय जवान डटे रहे।
    Battle of basantar

    15 दिसंबर, 1971

    मेजर होशियार सिंह दहिया बाईं ओर की अग्रिम कंपनी की कमान संभाल रहे थे। जबरदस्त क्रॉसफायर और भारी गोलाबारी के बावजूद उन्होंने आक्रमण का नेतृत्व किया और भीषण आमने-सामने की लड़ाई के बाद जरपाल पर कब्जा कर लिया।

    16 दिसंबर, 1971

    इस दिन दुश्मन ने तीन जवाबी हमले किए, जिनमें दो टैंकों के साथ थे। मेजर होशियार सिंह गोलियों और टैंक फायर की परवाह किए बिना खाई से खाई तक जाकर जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। उनके नेतृत्व में सभी हमले विफल कर दिए गए।

    17 दिसंबर, 1971

    दुश्मन ने भारी तोपखाने के साथ अंतिम हमला किया। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मेजर होशियार सिंह मोर्चे पर डटे रहे। उन्होंने स्वयं मशीनगन संभाली और दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया। अंततः पाकिस्तानी सेना अपने कमांडिंग ऑफिसर और 85 सैनिकों को छोड़कर पीछे हटने को मजबूर हुई। युद्धविराम तक मेजर होशियार सिंह ने मोर्चा नहीं छोड़ा।

    Battle of basantar

    फोटो: सोशल मीडिया

    युद्ध के बाद की भूमिका

    1971 की ऐतिहासिक बहादुरी के बाद मेजर होशियार सिंह दहिया का सैन्य करियर निरंतर आगे बढ़ता रहा। 1976 में वे मेजर बने और ऑफिसर ट्रेनिंग स्कूल में जवानों को प्रशिक्षण दिया। 1983 में उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल बनाया गया और बाद में कर्नल के मानद पद के साथ वे सेवानिवृत्त हुए।

    सेना से रिटायरमेंट के बाद उन्होंने जयपुर में सादगीपूर्ण जीवन जिया। 6 दिसंबर 1998 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके परिवार में पत्नी और तीन बच्चे हैं, जिनमें से दो बेटे भारतीय सेना में सेवा दे चुके हैं।

    मेजर होशियार सिंह दहिया की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि जीवन का सबक है। पहले 1971: Beyond Borders में उनकी वीरता दिखाई गई और अब बॉर्डर 2 के जरिए उनकी हिम्मत और देशभक्ति नई पीढ़ी, खासकर Gen Z, तक पहुंच रही है।

    Border 2 देख खुश हुआ मेजर का परिवार

    उधर, चचेरे भाई कर्नल होशियार सिंह के नक्शेकदम पर चलते हुए सेना का हिस्सा रहे हवलदार मेजर नारायण सिंह ने दैनिक जागरण से फिल्म बॉर्डर-2 को लेकर बातचीत की और कहा कि यह फिल्म भाई की बहादुरी को और जीवंत बनाएगी। उन्होंने बताया, “बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों से सुना है कि भाई पर फिल्म बनी है। यह हमारे पूरे परिवार के लिए गर्व की बात है।”

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