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    जातिवाद का क्रूर चेहरा, बेटियों की अंतरजातीय शादी के कारण पिता के शव को कंधा देने से मुकरा गांव

    Updated: Wed, 25 Feb 2026 02:20 PM (IST)

    ओडिशा के नबरंगपुर जिले के कोंगरा गांव में जातिवाद का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। बेटियों की अंतरजातीय शादी से नाराज ग्रामीणों ने दुर्जन मांझी के ...और पढ़ें

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    बेटियों की अंतरजातीय शादी के कारण पिता के शव को कंधा देने से मुकरा गांव

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    संतोष कुमार पांडेय, अनुगुल। ओडिशा के नबरंगपुर जिला अंतर्गत तेंतुलिखुंटी ब्लॉक के कोंगरा गांव में जातिवाद की एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। यहां बेटियों की अंतरजातीय शादी (Inter-caste marriage) की ‘सजा’ एक परिवार को इस कदर भुगतनी पड़ी कि ग्रामीणों ने मृतक के पार्थिव शरीर को श्मशान घाट तक ले जाने में भी मदद करने से इनकार कर दिया।

    बेटियों के विवाह से नाराज थे ग्रामीण:

    मिली जानकारी के अनुसार कोंगरा गांव निवासी दुर्जन मांझी का बुधवार देर रात निधन हो गया। परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं। आरोप है कि उनकी दोनों बेटियों ने अपनी जाति से बाहर विवाह किया था, जिससे कुछ ग्रामीण नाराज थे। यही नाराजगी उनके निधन के बाद खुलकर सामने आई।

    परिजनों का कहना है कि जब अंतिम संस्कार की तैयारी की जा रही थी, तब ग्रामीणों से शव को कंधा देने की गुहार लगाई गई, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए साफ मना कर दिया कि परिवार ने “जाति की मर्यादा” तोड़ी है।

    बड़े बेटे ने भी बनाई दूरी:

    घटना को और भी पीड़ादायक बनाते हुए मृतक के बड़े बेटे ने भी कथित तौर पर जातिगत पाबंदियों का हवाला देते हुए अंतिम संस्कार में शामिल होने से इनकार कर दिया। ऐसे में परिवार पूरी तरह असहाय हो गया।

    अंततः छोटे बेटे शिव मांझी, छोटी बेटी स्वप्ना मांझी (जिसने अंतरजातीय विवाह किया था), मृतक की बहन और एक भतीजे ने मिलकर शव को श्मशान घाट तक पहुंचाया और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की। बताया जा रहा है कि कुछ पड़ोसी मौके पर मौजूद थे, लेकिन किसी ने भी कंधा देने की हिम्मत नहीं दिखाई।

    प्रशासन से कार्रवाई की मांग:

    इस अमानवीय घटना से इलाके में आक्रोश है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि आज भी गांवों में जातिगत भेदभाव जिंदा है और यह घटना उसी का उदाहरण है। मृतक के परिजन अब जिला प्रशासन से मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

    परिवार का कहना है कि यह केवल उनके साथ अन्याय नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है। सवाल उठ रहा है कि क्या आज भी सामाजिक बंधनों के नाम पर इंसानियत को इस तरह दफनाया जाता रहेगा?

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