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    TMC में सेंध, एनसीपी का विभाजन और कांग्रेस में आंतरिक कलह; 'घर वापसी' की राह काफी मुश्किल

    Updated: Thu, 18 Jun 2026 11:14 PM (IST)

    ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का कांग्रेस में विलय नहीं होगा। दोनों पार्टियों ने इस तरह की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे "बेबुनि ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. 1999 में बनी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) विभाजित हो चुकी है 

    2. ममता बनर्जी 15 साल के शासन के बाद मात्र 80 सीटों पर सिमट गईं

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का कांग्रेस में विलय नहीं होगा। दोनों पार्टियों ने इस तरह की अटकलों को सिरे से खारिज कर दिया है और इसे "बेबुनियाद अफवाह" बताया है।

    वहीं, इन चर्चाओं ने एक बड़ी राजनीतिक बहस छेड़ दी है कि क्या कांग्रेस से अलग होकर अपनी राह चुनने वाले नेता जैसे ममता बनर्जी और शरद पवार को अब भाजपा के खिलाफ विपक्ष को मजबूत करने के लिए 'घर वापसी' पर विचार करना चाहिए?

    2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की करारी हार के बाद ये चर्चाएं तेज हुईं। ममता बनर्जी 15 साल के शासन के बाद मात्र 80 सीटों पर सिमट गईं और भाजपा पहली बार राज्य में सरकार बनाने में सफल रही।

    हार के बाद कई नवनिर्वाचित विधायक और करीबी सहयोगी पार्टी छोड़कर भाजपा के संपर्क में पहुंच गए। अभिषेक बनर्जी पर पुराने नेताओं की नाराजगी साफ दिखी।

    इसी संकट के बीच ममता बनर्जी को कांग्रेस नेतृत्व से मदद मांगनी पड़ी, जिसने 'घर वापसी' की बहस को हवा दी। शरद पवार की भी स्थिति कम चुनौतीपूर्ण नहीं है।

    1999 में बनी उनकी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) विभाजित हो चुकी है और उन्होंने पार्टी का नाम व प्रतीक अपने भतीजे अजीत पवार गुट को गंवा दिया। उद्धव ठाकरे की शिवसेना भी बगावत और आगे की संभावित टूट से जूझ रही है।

    'घर वापसी' की बहस
    शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने सबसे पहले इस विचार को आगे बढ़ाया कि कांग्रेस से निकली पार्टियां मूल संगठन में लौटकर भाजपा के खिलाफ एकजुट होनी चाहिए। पूर्व राजस्थान सीएम अशोक गहलोत ने कहा कि "समय आ गया है", जबकि महाराष्ट्र कांग्रेस नेता नाना पटोले ने भी ममता और पवार जैसे नेताओं को मजबूत कांग्रेस की जरूरत बताई।

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    क्यों छोड़ी थी कांग्रेस?

    ममता बनर्जी 1998 में कांग्रेस से अलग नहीं हुईं क्योंकि विचारधारा अलग थी, बल्कि उन्होंने महसूस किया कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे को हरा नहीं सकती। उन्होंने टीएमसी बनाकर 2011 में वाम शासन का 34 साल का सफर खत्म कर दिया।

    शरद पवार 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर सवाल उठाकर अलग हुए और महाराष्ट्र में अपनी पहचान बनाई। जगन मोहन रेड्डी भी उत्तराधिकार की लड़ाई में कांग्रेस छोड़कर वाईएसआरसीपी लेकर सफल हुए। उस समय भाजपा आज जितनी मजबूत नहीं थी। क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस की कमजोरी से बनी जगह भर रही थीं।

    अब क्या बदला?

    बीजेपी का तेज उभार... अब ये पार्टियां कांग्रेस से ज्यादा भाजपा से सीधा मुकाबला कर रही हैं। राजनीतिक विश्लेषक राहुल वर्मा के अनुसार, पहले कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत थी, लौटने वाले नेताओं को जगह मिल जाती थी। लेकिन आज पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश या महाराष्ट्र में कांग्रेस खुद कमजोर है।