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    न विलय, न विदाई: उपेन्द्र कुशवाहा का बड़ा एलान, अपने दम पर करेंगे भविष्य की राजनीति

    Updated: Sat, 13 Jun 2026 11:51 PM (IST)

    पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर फिर से चुने जाने के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने साफ संदेश दिया कि वह किसी राजनीतिक सहारे की तलाश में नहीं हैं और उनकी पार ...और पढ़ें

    न विलय, न विदाई, अपने दम पर राजनीति करेंगे कुशवाहा (फोटो- एक्स)

    न विलय, न विदाई, अपने दम पर राजनीति करेंगे कुशवाहा (फोटो- एक्स)

    HighLights

    1. दिल्ली से कुशवाहा ने दिया भाजपा को भरोसे का संदेश, मगर अस्तित्व से समझौता भी नहीं

    2. कुशवाहा ने संगठनात्मक स्तर पर भी अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश की है

    अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) के दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय अधिवेशन ने बिहार की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से चल रही तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया।

    पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर फिर से चुने जाने के बाद उपेंद्र कुशवाहा ने साफ संदेश दिया कि वह किसी राजनीतिक सहारे की तलाश में नहीं हैं और उनकी पार्टी का स्वतंत्र अस्तित्व आगे भी कायम रहेगा। उन्होंने स्पष्ट इशारा किया कि रालोमो का न तो भाजपा में विलय होने जा रहा है और न ही जदयू में।

    दरअसल, काफी समय से चर्चा चल रही थी कि बदलते सियासी समीकरणों के बीच कुशवाहा अपनी पार्टी का भविष्य किसी बड़े दल के साथ जोड़ सकते हैं। मगर अधिवेशन में उन्होंने सभी कयासों को खारिज कर दिया। यह संदेश भी दिया कि एनडीए में मजबूती से बने रहने के साथ ही अपनी अलग सियासी पहचान को भी बनाए रखेंगे।

    मीडिया से बातचीत में कुशवाहा ने अपने पुत्र और बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश को लेकर उठ रहे सवालों का भी खुलकर जवाब दिया। दीपक अभी किसी सदन के सदस्य नहीं हैं, जिसके कारण उनके मंत्री पद को लेकर चर्चाएं तेज हैं।

    कुशवाहा ने दो-टूक कहा कि दीपक मौजूदा एनडीए सरकार के पूरे कार्यकाल तक मंत्री बने रहेंगे और उन्हें इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी। दीपक प्रकाश को लेकर कुशवाहा जिस आत्मविश्वास के साथ बोल रहे हैं, उससे माना जा रहा कि उन्हें भाजपा की ओर से आश्वासन मिल चुका है।

    खबरें और भी

    आने वाले दिनों में उनके मंत्री बने रहने का संवैधानिक रास्ता निकाल लिया जा सकता है। एक दिन पहले पटना में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी कुशवाहा की लाइन पर ही प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि वह स्वयं भी कभी बिना किसी सदन का सदस्य बने छह महीने तक मंत्री रह चुके हैं।

    कुशवाहा ने संगठनात्मक स्तर पर भी अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश की है। उन्होंने आलोक कुमार सिंह को फिर से बिहार में पार्टी की कमान सौंपी है, जो राजपूत समाज से हैं।

    काराकाट क्षेत्र में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है, जो उपेंद्र कुशवाहा की पारंपरिक संसदीय सीट रही है। पिछले लोकसभा चुनाव में राजपूत मतदाताओं की नाराजगी को उनकी हार का एक बड़ा कारण माना गया था। ऐसे में आलोक को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर कुशवाहा ने सामाजिक समीकरणों को साधने का प्रयास किया है।

    दिल्ली में राष्ट्रीय अधिवेशन करने के पीछे भी एक संदेश छिपा दिखाई देता है। कुशवाहा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 12 वर्षों की उपलब्धियों की खुलकर सराहना की।

    उसी भाव से उन्होंने नीतीश कुमार के कार्यों को भी सराहा और संकेत देने का प्रयास किया कि वह एनडीए के विश्वसनीय सहयोगी हैं और गठबंधन छोड़ने की उनकी कोई मंशा नहीं है।

    हालांकि पार्टी ने यह भी कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और रोजगार के क्षेत्र में राज्य को अभी लंबा सफर तय करना है। इन क्षेत्रों में और व्यापक तथा प्रभावी प्रयास किए जाने की आवश्यकता है।

    पटना का नाम फिर पाटलिपुत्र करने की मांग

    कुशवाहा ने बिहार की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देने की मांग भी उठाई और कहा कि पटना का नाम फिर से पाटलिपुत्र किया जाना चाहिए। उन्होंने पलायन को रोकने तथा कृषि आधारित उद्योगों के बड़े पैमाने पर विस्तार को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करने की मांग की। उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के सम्मान में संसद परिसर में उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित करने की मांग भी रखी।