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    सोशल इंजीनियरिंग का दांव: तमिलनाडु में DMK को मात देने के लिए, भाजपा तैयार कर रही मजबूत सामाजिक गठबंधन

    Updated: Fri, 06 Feb 2026 12:11 AM (IST)

    तमिलनाडु में होने वाले 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी अब "बिहार मॉडल" को अपन ...और पढ़ें

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    तमिलनाडु में DMK को मात देने के लिए भाजपा तैयार कर रही मजबूत सामाजिक गठबंधन

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। तमिलनाडु में होने वाले 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी अब "बिहार मॉडल" को अपनाकर राज्य की राजनीति में अपनी पैठ जमाने की कोशिश कर रही है। हाल ही में बिहार में मिली जीत से उत्साहित होकर, भाजपा तमिलनाडु में एक मजबूत सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन तैयार कर रही है।

    भाजपा की "बिहार जैसी रणनीति": सामाजिक इंजीनियरिंग और गठबंधन

    बिहार में भाजपा ने प्रमुख जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे दलों (जैसे LJP, HAM, RLM) के साथ मिलकर एक ऐसा वोट बैंक बनाया था जिसने विपक्ष के मुस्लिम-यादव आधार को चुनौती दी। तमिलनाडु में भी भाजपा इसी तरह की 'सामाजिक इंजीनियरिंग' कर रही है:

    मुख्य गठबंधन

    भाजपा ने एआईएडीएमके (अन्नाद्रमुक) के साथ दोबारा गठबंधन किया है। इस गठबंधन के तहत एआईएडीएमके राज्य स्तर पर नेतृत्व (EPS के अधीन) करेगी, जबकि राष्ट्रीय नेतृत्व प्रधानमंत्री मोदी के हाथों में होगा।

    जाति आधारित प्रतिनिधित्व

    वन्नियार समुदाय: गठबंधन में PMK (डॉ. अंबुमणि रामदास) को शामिल किया गया है, जिसका उत्तर तमिलनाडु के वन्नियार बेल्ट में मजबूत प्रभाव है।

    दलित और OBC वोट: भाजपा खुद को दलितों के मसीहा के रूप में पेश कर रही है। पार्टी के राज्य अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन (ओबीसी चेहरा) और केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन (दलित चेहरा) के माध्यम से विभिन्न समुदायों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
    थेवर समुदाय: पार्टी OPS (ओ. पनीरसेल्वम) और TTV दिनाकरण (AMMK) को भी साथ लाने का प्रयास कर रही है ताकि दक्षिण तमिलनाडु के थेवर वोट बैंक को सुरक्षित किया जा सके।

    सीटों का गणित: खबरों के मुताबिक, NDA के सीट-बंटवारे के फॉर्मूले के तहत AIADMK लगभग 160-170 सीटों पर और भाजपा 45-50 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है।


    क्या यह रणनीति सफल होगी?

    हालांकि भाजपा का यह "अंकगणित" कागज पर मजबूत दिखता है, लेकिन इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं:

    द्रविड़ियन विचारधारा: तमिलनाडु की राजनीति दशकों से 'द्रविड़ियन गौरव' और 'क्षेत्रीय पहचान' पर आधारित रही है। विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का 'हिंदुत्व' कार्ड यहां बिहार की तरह प्रभावी नहीं हो सकता।


    सत्तारूढ़ DMK की रणनीति: मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इस "बिहार मॉडल" को मतदाताओं के साथ धोखाधड़ी बताया है और दावा किया है कि राज्य की जनता भाजपा-अन्नाद्रमुक गठबंधन को नकार देगी।


    नए खिलाड़ियों का उदय: अभिनेता विजय की पार्टी (TVK) की एंट्री ने शहरी और युवा वोटों के समीकरण को उलझा दिया है, जो किसी भी गठबंधन का खेल बिगाड़ सकती है।


    शहरी बनाम ग्रामीण: विशेषज्ञ मानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में जातिगत गठबंधन काम कर सकता है, लेकिन शहरी तमिलनाडु में मतदाता सुशासन और विकास के मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं।

    भाजपा की बिहार जैसी रणनीति का उद्देश्य DMK विरोधी वोटों को एकजुट करना और जातिगत समीकरणों के माध्यम से 'जीतने वाला गठबंधन' बनाना है। हालांकि, तमिलनाडु की विशिष्ट राजनीतिक संस्कृति में यह रणनीति "अंकगणित" (Maths) में तो सही हो सकती है, लेकिन चुनावी "केमिस्ट्री" (Chemistry) में कितनी सफल होगी, यह चुनाव परिणाम ही तय करेंगे।