विजय का वो मास्टरप्लान जिसने फैन क्लब को बनाया 'अजेय चुनावी कैडर', केवल 2 साल में कैसे पलटा तमिलनाडु का पूरा गेम?
तमिलनाडु में सिनेमा के पर्दे से सत्ता के शिखर तक का सफर एक 'पॉलिटिकल स्क्रिप्ट' है, जिसे एमजीआर और जयललिता के बाद अब 'थलापति' विजय दोहरा रहे हैं। ...और पढ़ें

गुरप्रीत चीमा, नई दिल्ली। तमिलनाडु की राजनीति को समझना हो, तो एक लाइन काफी है, यहां नेता पैदा नहीं होते, बनाए जाते हैं… और यह काम अक्सर सिनेमा करता है। कभी पर्दे पर गरीबों के मसीहा बने एम. जी. रामचंद्रन असल जिंदगी में मुख्यमंत्री बन गए।
उनकी विरासत को जे. जयललिता ने सत्ता के शिखर तक पहुंचाया और अब उसी कहानी का नया चैप्टर लिखने निकले हैं ‘थलापति’ विजय। लेकिन यह सिर्फ एंट्री नहीं है, यह एक स्क्रिप्टेड राइज़ है… धीरे-धीरे, सोच-समझकर और सही टाइमिंग के साथ।
आज के फ्लैशबैक में चलते हैं तमिलनाडु… जहां राजनीति सिर्फ विधानसभा में नहीं, सिल्वर स्क्रीन पर भी लिखी जाती है। यहां हीरो पहले पर्दे पर जनता को बचाता है… और फिर उसी जनता का नेता बन जाता है। लेकिन हर कहानी हिट नहीं होती… कोई दो साल में ‘थलापति’ बनकर उभरता है, तो कोई सुपरस्टार होते हुए भी वोट की लड़ाई में फ्लॉप हो जाता है।
विजय का सफर स्टारडम से शुरू होता है, लेकिन राजनीति तक पहुंचने की कहानी कहीं ज्यादा दिलचस्प है। 1974 में जन्मे विजय के लिए फिल्म इंडस्ट्री नई नहीं थी, पिता एस. ए. चंद्रशेखर खुद डायरेक्टर थे।
शुरुआती फिल्में चलीं, फिर 2000 के दशक में विजय ने खुद को ‘मास हीरो’ के तौर पर स्थापित कर लिया। लेकिन उनकी फिल्मों में एक पैटर्न था… वह सिर्फ एंटरटेन नहीं करते थे, सिस्टम से लड़ते थे, करप्शन पर वार करते थे, और आम आदमी की आवाज बनते थे। यहीं से राजनीति की पहली लाइन लिखी गई।
-1778072543367.jpg)
असल गेम 2010 के बाद शुरू हुआ। ‘मर्सल’, ‘सरकार’ जैसी फिल्मों में सरकार पर सवाल, टैक्स सिस्टम पर कटाक्ष… यह सब सिर्फ डायलॉग नहीं थे, यह पॉलिटिकल सिग्नल थे। उस वक्त तमिलनाडु की राजनीति भी ट्रांजिशन में थी। एम. करुणानिधि और जयललिता जैसी दिग्गज हस्तियां जा चुकी थीं। एक खाली जगह थी… और विजय ने उसे पहचाना।
खबरें और भी
लेकिन स्टार से नेता बनने का सबसे बड़ा चैलेंज क्या होता है? रियल कनेक्ट। स्क्रीन पर तालियां मिलती हैं, लेकिन जमीन पर भरोसा कमाना पड़ता है और यही वो जगह है जहां ज़्यादातर स्टार्स फेल हो जाते हैं।
-1778070112618.png)
'रील इमेज' को रियल भरोसे में बदलने का मास्टरप्लान
विजय ने इस गैप को जल्दी पहचान लिया। उन्होंने अपने फैन क्लब्स को सिर्फ ‘स्टारडम का एक्सटेंशन’ नहीं रहने दिया, बल्कि धीरे-धीरे उन्हें पॉलिटिकल मशीन में बदलना शुरू किया। जो फैन पहले कटआउट लगाते थे, बैनर संभालते थे, उन्हें सामाजिक कामों में लगाया गया।
ब्लड डोनेशन कैंप, फूड डिस्ट्रीब्यूशन, एजुकेशन सपोर्ट… ये सब सिर्फ इवेंट नहीं थे, बल्कि एक सुनियोजित ग्राउंड कनेक्ट का हिस्सा थे। कोविड के दौरान जब सिस्टम कई जगहों पर लड़खड़ा रहा था, तब उनकी टीम जमीन पर एक्टिव दिखी। राशन पहुंचाना, जरूरतमंदों की मदद करना…. यहीं से नैरेटिव बदलना शुरू हुआ।
यही वो मोमेंट था, जब जनता ने उन्हें सिर्फ ‘फिल्मी हीरो से एक्चुअल हीरो मानना शुरू किया। और राजनीति में यही सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट होता है जब पहचान स्टार से हटकर भरोसे में बदलती है। यहां एक नाम एक बार फिर चर्चा में आता है… प्रशांत किशोर। उन्होंने भी एक अलग रास्ता चुना, बिहार में ‘जन सुराज’ के जरिए सीधे जनता के बीच जाने का।

उनकी रणनीति भी ग्राउंड कनेक्ट पर टिकी थी। पदयात्राएं, लोकल इश्यूज़, डायरेक्ट बातचीत। हालांकि, चुनावी नतीजों में उन्हें सफलता नहीं मिली, ‘विकेट आउट’ हो गए। अब तमिलनाडु में रणनीति के स्तर पर माना जाता है कि उन्होंने विजय के कैंप को यह समझाया कि सिर्फ भीड़ जुटाना काफी नहीं है, भरोसा बनाना जरूरी है। इमेज शिफ्ट हुआ… ‘एंग्री स्टार’ से ‘जिम्मेदार लीडर’।
और फिर आई औपचारिक एंट्री… पार्टी लॉन्च, पब्लिक स्पीच और एक क्लियर मैसेज… ‘मैं सत्ता के लिए नहीं, सिस्टम बदलने आया हूं’। यह लाइन नई नहीं है, लेकिन विजय के केस में काम करती है, क्योंकि उनकी ऑन-स्क्रीन इमेज पहले से यही कहती आई है।
-1778070230257.jpg)
अब बात थलापति विजय से पहले के चेहरों की, जिन्होंने सिनेमा से सत्ता तक का सफर तय किया… और उन लोगों की भी, जो पर्दे की चमक लेकर राजनीति में उतरे, लेकिन कहानी वैसी नहीं लिख पाए, जैसी शुरुआत में दिख रही थी।
दक्षिण भारत में सिनेमा और राजनीति का रिश्ता पुराना है। एन. टी. रामाराव ने आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की जड़ें हिला दी थीं। चिरंजीवी ने कोशिश की, लेकिन उतनी सफलता नहीं मिली। पवन कल्याण आज भी स्ट्रगल मोड में हैं।
तमिलनाडु में भी हर स्टार सफल नहीं हुआ। कमल हासन की पार्टी अभी तक बड़ा असर नहीं डाल पाई। रजनीकांत ने एंट्री का एलान किया, लेकिन पीछे हट गए। दक्षिण भारत की राजनीति को समझना हो तो एक बात साफ माननी पड़ेगी। यहां सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, मास इमोशन की फैक्ट्री रहा है और इसी फैक्ट्री से कई बार सीधे नेता निकले हैं।
आंध्र प्रदेश में एनटी रामा राव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। 1980 के दशक में उन्होंने सिर्फ एक पार्टी नहीं बनाई, बल्कि ‘तेलुगु आत्मसम्मान’ का नैरेटिव खड़ा किया। नतीजा… कांग्रेस जैसी स्थापित ताकत की जड़ें हिल गईं।

'सिल्वर स्क्रीन' के भगवान को बनाया 'जनता का नायक'
आंध्र प्रदेश की राजनीति में एनटीआर का उदय सिर्फ एक अभिनेता के नेता बनने की कहानी नहीं है। यह आत्मसम्मान बनाम सत्ता की लड़ाई का क्लासिक उदाहरण है। 1980 की शुरुआत में हालात ऐसे थे कि कांग्रेस आंध्र प्रदेश में लगभग ‘डिफॉल्ट पावर’ बन चुकी थी। दिल्ली हाईकमान के फैसले यहां की राजनीति तय करते थे।
मुख्यमंत्री बदलना हो या नीतियां तय करनी हों, अक्सर स्थानीय भावना से ज्यादा ‘केंद्रीय आदेश’ हावी रहता था।यहीं से एनटीआर ने एक बहुत सटीक नब्ज पकड़ी ‘तेलुगु वारी आत्मगौरव’। उन्होंने इसे सिर्फ नारा नहीं रहने दिया, बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन में बदल दिया। उनका मैसेज साफ था, ‘दिल्ली नहीं, अब आंध्र अपनी किस्मत खुद तय करेगा।’
इस नैरेटिव को जमीन पर ले जाने के लिए उन्होंने 1982 में तेलुगू देशम पार्टी बनाई और फिर शुरू उनका चैतन्य रथ यात्रा नाम से ऐतिहासिक कैंपेन शुरू होता है। यह कोई साधारण रैली नहीं थी। एक वैन (रथ) में बैठकर एनटीआर ने गांव-गांव, कस्बे-कस्बे घूमकर सीधे लोगों से संवाद किया। उस दौर में जब टीवी और सोशल मीडिया नहीं थे, यह डायरेक्ट कनेक्ट ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना। लेकिन हर कहानी ऐसी नहीं रही।

चिरंजीवी और कमल हासन कहां कमजोर पड़े?
2008 में जब चिरंजीवी ने प्रजा राज्यम पार्टी लॉन्च की, तो माहौल बिल्कुल लहर जैसा था। रैलियों में भारी भीड़, मीडिया में जबरदस्त चर्चा… सब कुछ एक ’पॉलिटिकल स्टार एंट्री’ जैसा लग रहा था। लेकिन समस्या यहीं छिपी थी। भीड़ और वोटर अलग होते हैं। उनकी पार्टी का कोर नैरेटिव क्लियर नहीं था। वो बदलाव की बात कर रहे थे, लेकिन ‘कैसा बदलाव?’ यह स्पष्ट नहीं हो पाया।
संगठन नया और कमजोर था। बूथ लेवल पर कैडर की कमी थी। टिकट वितरण और लोकल लीडरशिप में भी असंतुलन दिखा। नतीजा 2009 के चुनाव में अच्छी खासी वोट शेयर के बावजूद सीटें बहुत कम आईं। आखिरकार पार्टी को कांग्रेस में मर्ज करना पड़ा।

वहीं पवन कल्याण का केस थोड़ा अलग है, लेकिन उतना ही दिलचस्प भी है। उन्होंने जन सेना पार्टी के जरिए खुद को ‘सिस्टम के खिलाफ आवाज’ के रूप में पेश किया। लेकिन फिर भी उनकी पार्टी स्ट्रगल कर रही है। कारण कंसिस्टेंसी की कमी, क्योंकि राजनीति में लगातार जमीन पर दिखना पड़ता है।
पवन कल्याण की एक्टिविटी अक्सर ‘स्पाइक्स’ में दिखती है.. कभी बहुत एक्टिव, फिर लंबे गैप। फिर एक कारण संगठन की कमजोरी भी है, एनटीआर के समय की तरह मजबूत, अनुशासित कैडर अभी तक पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया।
वहीं अगर कमल हासन की बात की जाए तो 2018 में कमल हासन की राजनीति में एंट्री ऐसे हुई, मानो उन्होंने पारंपरिक सियासी पटकथा को चुनौती देते हुए अपनी अलग स्क्रिप्ट लिखने का फैसला किया हो।
- जहां दूसरे स्टार इमोशन या पहचान की राजनीति करते हैं, वहां कमल हासन ने ‘गवर्नेंस, ट्रांसपेरेंसी और एंटी-करप्शन’ को अपना कोर नैरेटिव बनाया।
- उन्होंने मक्कल नीधि मैयम के जरिए यह मैसेज दिया, ‘राजनीति साफ भी हो सकती है, और प्रोफेशनल तरीके से चल सकती है।’ कमल हासन की राजनीति एक दिलचस्प कहानी जैसी है… बातें मजबूत, लेकिन पकड़ अभी सीमित।
- तमिलनाडु की सियासत लंबे समय से द्रविड़ियन मॉडल पर चलती रही है, जहां सामाजिक न्याय, वेलफेयर और पहचान की राजनीति गहराई से जुड़ी है।
- ऐसे माहौल में उनका ‘साफ-सुथरी राजनीति’ वाला मैसेज शहरों के पढ़े-लिखे लोगों को तो पसंद आता है, लेकिन गांव और गरीब तबके तक उतनी ताकत से नहीं पहुंच पाता, इसलिए बड़ा वोट बैंक नहीं बन पाता।
दूसरी तरफ DMK और AIADMK जैसी पार्टियां सालों से जमीन पर काम कर रही हैं, उनके पास हर बूथ तक मजबूत नेटवर्क है, जबकि उनकी पार्टी MNM अभी भी ज्यादा उनकी इमेज पर टिकी हुई दिखती है।
2021 के चुनाव में भी यही देखने को मिला। जोरदार प्रचार और पहचान के बावजूद वोट तो मिले, लेकिन सीट नहीं आई। इससे साफ है कि सिर्फ लोगों को जानना काफी नहीं, उन्हें वोट में बदलना असली चुनौती है। ऊपर से, जहां पहले से दो बड़ी पार्टियों के बीच सीधी टक्कर हो, वहां तीसरी ताकत बनना और मुश्किल हो जाता है।
इसलिए कमल हासन की राजनीति आज भी चर्चा में जरूर है, लेकिन अभी उसे जमीन पर बड़ी ताकत बनने के लिए लंबा रास्ता तय करना है।

वहीं रजनीकांत का फैसला दक्षिण भारत की राजनीति को समझने का एक अहम केस स्टडी है। सालों तक उनकी एंट्री को लेकर चर्चा चलती रही। हर बार जब वो इशारा करते, राजनीतिक हलचल तेज हो जाती। 2017 में उन्होंने साफ कहा कि वो राजनीति में आएंगे और ‘सिस्टम बदलेंगे’ यानी उम्मीदें अपने चरम पर पहुंच गईं।
उनके पास वो सब था, जो किसी भी नए नेता के लिए सपना होता है। बड़ी फैन फॉलोइंग, जबरदस्त पहचान और एक ‘आउटसाइडर’ की इमेज। लेकिन फिर अचानक उन्होंने पीछे हटने का फैसला कर लिया।
यह भी पढ़ें- तमिलनाडु के किंग बने विजय, अब किंगमेकर पर नजर... सरकार बनाने के लिए 10 सीटों की जरूरत; समझें समीकरण
कारण क्या था? सबसे बड़ा कारण उन्होंने खुद बताया, स्वास्थ्य और जोखिम। कोविड के समय उनकी तबीयत को लेकर चिंता थी और उन्होंने माना कि इतनी अनिश्चितता में एक्टिव पॉलिटिक्स में आना सही नहीं होगा।

आज के तमिलनाडु में एमके स्टालिन एक मजबूत और स्थापित नेता के तौर पर खड़े थे। जिनकी राजनीति संगठन, अनुभव और जमीन से जुड़े लंबे सफर पर टिकी है। लेकिन इसी बीच अब विजय की एंट्री इस पूरे समीकरण को दिलचस्प बना देती है। जहां विजय सीधे स्टारडम और बड़ी फैन फॉलोइंग के साथ मैदान में उतरे, वहीं स्टालिन की कहानी बिल्कुल उलटी रही है।

स्टालिन बनाम विजय
उन्होंने शुरुआत में फिल्मों और टीवी में छोटी भूमिकाएं जरूर कीं, लेकिन जल्दी ही राजनीति को अपना रास्ता बना लिया। एम करुणानिधि के बेटे होने के बावजूद उन्होंने सीधे ऊपर छलांग नहीं लगाई, बल्कि DMK की यूथ विंग से कार्यकर्ताओं के साथ, जनता के बीच जमीनी काम शुरू किया। इमरजेंसी के दौरान जेल जाना, फिर चेन्नई के मेयर बनना, मंत्री और डिप्टी सीएम के रूप में काम करना। इन सबने उन्हें धीरे-धीरे एक अनुभवी नेता में बदला।
लेकिन 2026 के चुनाव ने यह दिखा दिया कि राजनीति में सबसे मजबूत किले भी हिल सकते हैं। विजय की पार्टी ने न सिर्फ एंट्री की बल्कि सीधे सत्ता के दरवाजे तक पहुंच गई, 100 से ज्यादा सीटों के साथ पारंपरिक DMK-AIADMK सिस्टम को चुनौती दे दी। यही वह मोमेंट था जहां दो अलग रास्ते आमने-सामने दिखे…
एक, स्टालिन का रास्ता… जो सालों की मेहनत, संगठन और धीरे-धीरे बने भरोसे से तैयार हुआ।
दूसरा, विजय का रास्ता… जहां स्टारडम को रणनीति, ग्राउंड नेटवर्क और युवाओं के कनेक्ट के साथ जोड़कर सीधे चुनावी ताकत में बदला गया।
-1778070784052.jpg)
और दक्षिण भारत की राजनीति का वही पुराना सवाल, ‘क्या भीड़ वोट में बदलेगी?’ इसका जवाब इस बार मिल चुका है। विजय की सबसे बड़ी ताकत उनकी ‘कहानी’ थी और इस बार जनता ने उस कहानी को सिर्फ सुना नहीं, बल्कि उस पर भरोसा भी किया। उनकी टीम ने फैन बेस को कैडर में बदला, लोकल मुद्दों को नैरेटिव बनाया और एक नई राजनीतिक ऊर्जा खड़ी की, जिसे कई एक्सपर्ट्स Gen-Z वेव भी मान रहे हैं।
यह भी पढ़ें- तमिलनाडु में विजय को मिलेगा 'हाथ' का साथ, TVK के साथ नई सरकार बनाने की तैयारी में कांग्रेस
लेकिन इस जीत के साथ कहानी खत्म नहीं होती… यहीं से असली स्क्रिप्ट शुरू होती है। क्योंकि अब मुकाबला चुनाव जीतने का नहीं, सिस्टम चलाने का है। अब चुनौती यह है कि क्या विजय वही मजबूत, टिकाऊ इकोसिस्टम बना पाएंगे, जैसा DMK ने दशकों में खड़ा किया। क्योंकि राजनीति में कोई रीटेक नहीं होता।
फिलहाल, स्टेज सेट है… कैमरा ऑन है… और तमिलनाडु के नए ‘थलापति’ अपना सबसे बड़ा रोल निभाने के लिए तैयार हैं।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।