बंगाल चुनाव: संदेशखाली में बदले हालात, लेकिन डर अभी बाकी; 'भय बनाम भरोसा' की लड़ाई
संदेशखाली में उत्पीड़न के बाद हालात बदले हैं, प्रशासन सक्रिय है, लेकिन लोगों के मन में डर अब भी बाकी है। कालिंदी नदी के किनारे स्थित यह इलाका अब 'भय ब ...और पढ़ें
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बंगाल चुनाव संदेशखाली बताएगा जख्म भरे या अभी भी हरे (फाइल फोटो)
जयकृष्ण वाजपेयी, संदेशखाली। सुबह की हल्की हवा में कालिंदी नदी, भेड़ी (मछली पालन केंद्र) और धूप में सूखती मिट्टी की गंध घुली है। इस प्राकृतिक शांति के बीच संदेशखाली की फिजा में एक अनकहा सन्नाटा अब भी तैर रहा है। हवा भी धीरे चल रही है, मानो डर को जगाना नहीं चाहती।
कोलकाता के करीब स्थित यह द्वीपीय इलाका, जो कभी उत्पीड़न और भय का प्रतीक बन गया था, अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। कभी शाहजहां शेख और उसके सहयोगियों के नाम से कांपने वाला यह इलाका अब बदलता दिख रहा है।
क्या है सवाल?
दीवारों के रंग बदले हैं, प्रशासन सक्रिय हुआ है, लेकिन लोगों के मन से डर पूरी तरह गया है या नहीं, सवाल अब भी कायम है। चुनावी माहौल में ध्रुवीकरण की कोशिशों के बीच मतदाता अपने पुराने जख्मों को तौल रहे हैं। ऐसे में संदेशखाली क्या संदेश देता है, इसपर लोगों की नजरें टिकी हैं।
जुबान खामोश, पर आंखें बोलती हैंपात्रो पाड़ा, कालोनी पाड़ा और पुकुरपाड़ा की तंग गलियों में चलते हुए बीते दौर की परतें खुलती जाती हैं। ग्रामीण बताते हैं कि मछली पालन के नाम पर जबरन जमीन कब्जाने का सिलसिला इतना व्यापक था कि विरोध करना असंभव हो गया था।
कई परिवारों ने अपनी पुश्तैनी जमीन गंवाई, तो महिलाओं ने असुरक्षा और अपमान झेला। आंदोलन में महिलाओं की भूमिका अहम रही। उनमें से कई अब रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में चली गई हैं। गोद में छह महीने की बच्ची लिए मानुषी सरदार कहीं जा रही थीं। बातचीत में उनके चेहरे की चिंता साफ झलकती है।
उनके पति तमिलनाडु में काम करते हैं। क्या काम करते हैं, यह भी उन्हें ठीक से नहीं पता। सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है या नहीं, इस पर भी उनका जवाब स्पष्ट नहीं है। शब्द कम हैं, लेकिन हालात बहुत कुछ कह रहे हैं।आंदोलन की मुखर आवाज को भाजपा ने चुनावी रण में उतारासंदेशखाली में 2024 में जमीन कब्जाने और उत्पीड़न के खिलाफ महिलाओं ने तृणमूल नेताओं के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया था।
भाजपा ने इस गुस्से को राजनीतिक दिशा देने के लिए आंदोलन की सबसे मुखर आवाज, रेखा पात्रा को इस बार ¨हगलगंज से टिकट देकर चुनावी रण में उतार दिया है। महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के इर्द-गिर्द भाजपा के लिए यह एक मजबूत नैरेटिव के तौर पर उभरा है। आंदोलन का चेहरा रहीं रेखा पात्र का घर आज भी साधारण ही है, एस्बेस्टस की झोपड़ी जैसा।
उनके पड़ोसी सनत बताते हैं कि हालात पहले से बेहतर जरूर हुए हैं, लेकिन डर की स्मृति अभी बाकी है। एक अन्य महिला दबी जुबान में कहती हैं कि जो महिलाएं आंदोलन में आगे थीं, उनमें से कई अब बाहर काम करने चली गई हैं। गांव की पूर्णिमा बताती हैं कि अब रात में बाहर निकलने में पहले जैसा डर नहीं लगता।
चुनावी प्रयोगशाला और साख की लड़ाईराजनीतिक रूप से भी संदेशखाली अब केंद्र में है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां 8387 वोटों से बढ़त मिली थी, जिसने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है। इस बार भाजपा ने सनत सरदार और तृणमूल ने झरना सरदार को उम्मीदवार बनाया है।
बराबरी पर TMC-BJP
दोनों दलों का प्रचार यहां बराबरी पर दिखता है। तृणमूल के नेता दिलीप अब डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं और दावा कर रहे हैं कि कब्जाई गई अधिकांश जमीनें लौटाई जा चुकी हैं।सम्मान और सुरक्षा की लड़ाईअनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित इस सीट पर लड़ाई केवल सत्ता की नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा की भी है।
धर्म आधारित ध्रुवीकरण के प्रयासों के बीच स्थानीय लोग उस दौर को याद कर रहे हैं जब उनकी शिकायतें अनसुनी रह जाती थीं। संदेशखाली का यह चुनाव केवल एक सीट का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह तय करेगा कि यहां 'भय' जीतेगा या 'भरोसा'।
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