सिर्फ भूगोल नहीं, विरासत से भारत का ताज है कश्मीर, डॉ. कर्ण सिंह बोले- 'गांधीजी ने इसे उम्मीद की किरण कहा था'
डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि कश्मीर अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के कारण "भारत का मुकुट" है, जिसे सांप्रदायिक सौहार्द की पहचान के रूप में सुरक्षित ...और पढ़ें

डॉ. कर्ण सिंह ने आह्वान किया कि कश्मीर में अंतरधार्मिक संवाद केंद्र बने और उर्दू को सम्मान मिले।
HighLights
कश्मीर अपनी सांस्कृतिक विरासत से भारत का मुकुट है।
गांधीजी ने कश्मीर को "उम्मीद की किरण" बताया था।
स्थायी अंतरधार्मिक संवाद केंद्र की स्थापना का प्रस्ताव।
राज्य ब्यूरो, श्रीनगर। पूर्व केंद्रीय मंत्री और जम्मू-कश्मीर के पूर्व सदर-ए-रियासत डॉ. कर्ण सिंह ने शनिवार को कहा कि कश्मीर केवल भौगोलिक दृष्टि से नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के कारण भी "भारत का मुकुट" है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सदियों से सांप्रदायिक सौहार्द, सह-अस्तित्व और साझा संस्कृति की पहचान रहे कश्मीर की इस विरासत को हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
शेर-ए-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र (एसकेआईसीसी) में आयोजित अंतरधार्मिक संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. सिंह ने महात्मा गांधी के उस ऐतिहासिक कथन को याद किया, जिसमें उन्होंने विभाजन की हिंसा के दौर में कश्मीर को "उम्मीद की एक किरण" बताया था। उन्होंने कहा, "गांधीजी ने उस कठिन समय में कहा था कि यदि उन्हें कहीं प्रकाश और आशा की किरण दिखाई देती है तो वह कश्मीर में है। यह सम्मान यहां की सांप्रदायिक सौहार्द और सह-अस्तित्व की परंपरा के कारण मिला था।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतरधार्मिक संवाद का उद्देश्य किसी धर्म की श्रेष्ठता सिद्ध करना नहीं, बल्कि परस्पर समझ और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करना है। "यह शास्त्रार्थ नहीं, संवाद का मंच है। हर धर्म का अपना दर्शन और मूल्य है। हमें एक-दूसरे को समझने की आवश्यकता है," उन्होंने कहा। ऋग्वेद के मंत्र "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सत्य एक है, जिसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रूपों में होती है।
दुनिया को नफरत नहीं, प्रेम की जरूरत है
डॉ. सिंह ने कहा कि कश्मीर वैदिक परंपरा, बौद्ध धर्म, कश्मीर शैव दर्शन, ललद्यद, शाह-ए-हमदान और शेख नूर-उद-दीन नूरानी जैसी महान विभूतियों की कर्मभूमि रहा है। "दुनिया को नफरत नहीं, प्रेम की जरूरत है। हम अलग-अलग धर्मों और भाषाओं से हो सकते हैं, लेकिन सबसे पहले इंसान हैं।"
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उन्होंने कश्मीर में स्थायी अंतरधार्मिक संवाद केंद्र की स्थापना का प्रस्ताव रखते हुए कहा कि इससे विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच संवाद को संस्थागत स्वरूप मिलेगा। साथ ही उर्दू भाषा के संरक्षण की वकालत करते हुए उन्होंने कहा, "उर्दू का जन्म भारत में हुआ है।
यह कोई विदेशी भाषा नहीं, बल्कि हमारी साझा सांस्कृतिक विरासत का अमूल्य हिस्सा है। इसे अधिक सम्मान और प्रोत्साहन मिलना चाहिए।" उन्होंने विश्वास जताया कि जम्मू-कश्मीर भविष्य में भी राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक बहुलता और सामाजिक सद्भाव का प्रेरक केंद्र बना रहेगा।