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    लद्दाख में लोकतांत्रिक संकट, लेह में 9 महीने से चुनाव नहीं, कारगिल में सत्ता संघर्ष से विकास ठप

    By Naveen Sharma Edited By: Rahul Sharma
    Updated: Sun, 21 Jun 2026 07:00 AM (IST)

    लद्दाख की दोनों स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदें अभूतपूर्व संकट में हैं; लेह में 9 महीने से चुनाव नहीं हुए, जबकि कारगिल में मुख्य कार्यकारी पार्षद के खिल ...और पढ़ें

    लेह LAHDC का कार्यकाल अक्टूबर 2025 से खत्म, कारगिल में गठबंधन टूटा।

    लेह LAHDC का कार्यकाल अक्टूबर 2025 से खत्म, कारगिल में गठबंधन टूटा

    HighLights

    1. लेह परिषद चुनाव 9 महीने से लंबित, प्रशासनिक शून्यता।

    2. कारगिल में CEC के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, सत्ता संघर्ष।

    3. विकास कार्य प्रभावित, लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर सवाल।

    नवीन नवाज, श्रीनगर। लद्दाख में स्थानीय स्वशासन की दोनों सबसे महत्वपूर्ण संस्थाएं अभूतपूर्व संकट से गुजर रही हैं। एक ओर लेह स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएएचडीसी) का कार्यकाल समाप्त होने के नौ महीने बाद भी चुनाव नहीं कराए गए हैं, वहीं दूसरी ओर कारगिल स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद राजनीतिक संघर्ष का अखाड़ा बन गई है, जहां मुख्य कार्यकारी पार्षद (सीईसी) डा मोहम्मद जफ्फर अखून के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लंबित है।

    परिणामस्वरूप दोनों जिलों में विकास परियोजनाएं प्रभावित होने लगी हैं और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर सत्ता बचाने और हथियाने के आरोप लगा रहे हैं, जबकि आम जनता विकास कार्यों के ठप पड़ने की कीमत चुका रही है।

    दोनों परिषदों के चुनाव हर पांच वर्ष में होते हैं। प्रत्येक परिषद का नेतृत्व एक अध्यक्ष और कार्यकारी परिषद करती है। अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा प्राप्त होता है, जबकि कार्यकारी पार्षद राज्य मंत्री के बराबर माने जाते हैं।

    लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का कोई विकल्प नहीं

    लेह में वर्ष 1995 में गठित लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद का कार्यकाल अक्टूबर 2025 में समाप्त हो गया था। इसके बावजूद अब तक चुनाव नहीं कराए गए हैं। पूर्व मुख्य कार्यकारी पार्षद और वरिष्ठ भाजपा नेता ताशी ग्यालसन ने स्वीकार किया कि निर्वाचित निकाय के अभाव में प्रशासनिक शून्यता पैदा हो गई है। ग्यालसन ने कहा कि निर्वाचित परिषद के नहीं होने से एक बड़ा प्रशासनिक और लोकतांत्रिक खालीपन पैदा हुआ है। हालांकि उपराज्यपाल प्रशासन लोगों की समस्याओं के समाधान का प्रयास कर रहा है, लेकिन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का कोई विकल्प नहीं हो सकता।

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    उन्होंने चुनाव में देरी के पीछे केंद्र सरकार और विभिन्न राजनीतिक संगठनों के बीच चल रही वार्ताओं का हवाला देते हुए कहाकि लद्दाख के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा जारी है। राजनीतिक संवाद में स्पष्टता आने के बाद परिस्थितियां बदल सकती हैं। नए जिलों के गठन के बाद छोटी-छोटी परिषदों की आवश्यकता महसूस की जा रही है और उसी के अनुरूप आगे चुनाव कराए जाएंगे।

    आखून ने पद छोड़ने से इनकार कर दिया

    उधर कारगिल में हालात और अधिक विस्फोटक हो गए हैं। वर्ष 2023 के चुनावों के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन ने परिषद में बहुमत हासिल किया था। सत्ता साझेदारी समझौते के तहत तय हुआ था कि मुख्य कार्यकारी पार्षद का पद ढाई-ढाई वर्षों के लिए दोनों दलों के बीच साझा होगा। लेकिन अप्रैल में पहला कार्यकाल पूरा होने के बावजूद डा जाफर आखून ने पद छोड़ने से इनकार कर दिया, जिसके बाद राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आ गया।

    14 मई को 30 सदस्यीय परिषद के 16 पार्षदों ने आखून के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया। प्रस्ताव पर कांग्रेस के नौ, नेशनल कॉन्फ्रेंस के पांच और दो निर्दलीय पार्षदों के हस्ताक्षर हैं। मामला अब केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन के पास लंबित है। लद्दाख के सांसद और नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता हनीफा जान ने मौजूदा परिषद नेतृत्व पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कारगिल परिषद लगभग ठप हो चुकी है। 16 पार्षदों का अविश्वास प्रस्ताव एक महीने से अधिक समय से लंबित है और इसके कारण विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। कैपेक्स बजट तक मंजूरी का इंतजार कर रहा है।'

    बहुमत किसके पास, फैसला सदन में होना चाहिए

    उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि यह स्थिति लंबी चली तो द्रास और जंस्कार जैसे इलाकों में गंभीर असर पड़ेगा। इन क्षेत्रों में काम करने की अवधि पहले ही सीमित है क्योंकि सर्दियों में तापमान माइन्स 30 डिग्री तक चला जाता है।' हनीफा जान ने बताया कि उन्होंने पार्षदों और राजनीतिक नेताओं के प्रतिनिधिमंडल के साथ उपराज्यपाल से मुलाकात कर सदन में तत्काल शक्ति परीक्षण कराने की मांग की है। उनका कहना है कि बहुमत किसके पास है, इसका फैसला सदन के भीतर होना चाहिए, न कि राजनीतिक खींचतान के जरिए।

    वहीं, डा मोहम्मद जाफर आखून ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें हटाने की कोशिश राजनीतिक साजिश है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहाकि परिषद के नियमों में शक्ति परीक्षण कराने की कोई निर्धारित समय-सीमा नहीं है। मैं सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए तैयार हूं।

    परिषद के 99 प्रतिशत सदस्य मेरे साथ: आखून

    आखून ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि परिषद के 99 प्रतिशत सदस्य मेरे साथ हैं। कुछ कांग्रेस नेता केवल सत्ता हथियाने के लिए नेतृत्व परिवर्तन की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें कारगिल के विकास की नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ की चिंता है। उन्होंने गठबंधन सहयोगियों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले ढाई वर्षों में न कोई साझा न्यूनतम कार्यक्रम बनाया गया और न ही कोई समन्वय समिति गठित की गई। ऐसे में सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर डालना उचित नहीं है।'

    इस बीच लद्दाख में व्यापक प्रशासनिक पुनर्गठन भी राजनीतिक अनिश्चितता को बढ़ा रहा है। केंद्र सरकार ने हाल ही में पांच नए जिलों की घोषणा की है और सातों जिलों के लिए नए प्रशासनिक ढांचे पर विचार किया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, गृह मंत्रालय भविष्य में सभी जिलों में स्वायत्त विकास परिषदों के गठन और केंद्र शासित प्रदेश स्तर पर एक निर्वाचित निकाय स्थापित करने की संभावना पर भी विचार कर रहा है।