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    नौकरी होने के बावजूद मन में था पति से गुजारा भत्ता लेने का लालच, हाईकोर्ट में खुली पत्नी की पोल

    Updated: Wed, 21 Jan 2026 02:35 PM (IST)

    पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक पत्नी की भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने पाया कि पत्नी ने जानबूझकर अपनी आय, रोजगार और वित्तीय संपत्तियों को छ ...और पढ़ें

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    पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक पत्नी की भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी (प्रतीकात्मक फोटो)

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    राज्य ब्यूरो, चंडीगढ़। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें पत्नी ने भरण-पोषण से इनकार करने वाले पारिवारिक न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि याचिकाकर्ता पत्नी ने जानबूझकर अपने रोजगार, आय और वित्तीय संपत्तियों से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया, इसलिए वह भरण-पोषण की मांग करने की अधिकारी नहीं है।

    मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आलोक जैन ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की भरण-पोषण संबंधी व्यवस्था का उद्देश्य बेसहारा और असहाय महिलाओं व बच्चों को दरिद्रता और बेघरपन से बचाना है, न कि ऐसे मामलों में राहत देना जहां याचिकाकर्ता स्वयं आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद तथ्य छिपाकर न्यायालय से लाभ लेना चाहती हो।

    न्यायालय ने रेखांकित किया कि भरण-पोषण का दावा करने वाली पत्नी का यह दायित्व है कि वह यह सिद्ध करे कि वह स्वयं और आश्रित बच्चे का भरण-पोषण करने में असमर्थ है, जबकि वर्तमान मामले में पत्नी ने अपने रोजगार को छिपाते हुए पति की कथित आय को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया।

    हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाता है, तो उसे केवल निर्मल हाथों से ही नहीं, बल्कि निर्मल मन, निर्मल हृदय और निर्मल उद्देश्य के साथ आना चाहिए। न्यायालय के समय और सार्वजनिक धन का दुरुपयोग कर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर अपने पक्ष में आदेश हासिल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
    यह याचिका कुरुक्षेत्र परिवार न्यायालय द्वारा पारित उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें पत्नी की भरण-पोषण संबंधी अर्जी खारिज कर दी गई थी।

    पत्नी का तर्क था कि पारिवारिक न्यायालय ने यह मानकर त्रुटि की कि उसने अपने रोजगार और आर्थिक स्थिति से जुड़े तथ्यों को छिपाया है। उसने यह भी दावा किया कि उसकी आय इतनी कम है कि उससे उसका गुजारा संभव नहीं है और वह अपने पिता पर निर्भर है। हालांकि, रिकार्ड और साक्ष्यों की गहन जांच के बाद हाईकोर्ट ने इन दलीलों को अस्वीकार कर दिया।

    न्यायालय ने इस तथ्य को भी गंभीरता से लिया कि याचिकाकर्ता ने एक बच्ची को गोद लेने का दावा किया था, लेकिन जिरह के दौरान यह स्वीकार किया कि पति ने कभी गोद लेने की सहमति नहीं दी थी। इसके अलावा, कथित गोद लेने के समर्थन में न तो कोई दस्तावेज, न कोई विधिक प्रक्रिया और न ही कोई आधिकारिक रिकॉर्ड प्रस्तुत किया गया।

    न्यायालय के समक्ष यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता के पास अन्य बैंक खातों के अलावा किसान विकास पत्र और सार्वजनिक भविष्य निधि (पीपीएफ) खाते में 15 लाख रुपये से अधिक की राशि जमा है। हाईकोर्ट ने कहा कि इन तथ्यों से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता किसी तत्काल आर्थिक संकट से नहीं जूझ रही थी, जिसके लिए भरण-पोषण की आवश्यकता हो। निर्धनता या असहायता का कोई मामला सिद्ध नहीं हुआ।

    इन सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि उसे पारिवारिक न्यायालय के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नजर नहीं आती और इसलिए पत्नी की याचिका को खारिज किया जाता है।