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    सबसे पहले किसे हुए थे बाबा बर्फानी के दर्शन, कैसे शुरू हुई भगवान शिव के प्राकृतिक शिवलिंग की पूजा?

    Updated: Tue, 21 Apr 2026 01:23 PM (IST)

    बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए भक्तों का इंतजार अब खत्म होने वाला है। यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन 15 अप्रैल से शुरू हो चुके हैं और इस साल यात्रा 3 जून से ...और पढ़ें

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    बाबा बर्फानी के दर्शन का महत्व (Picture Credit- AI Generated)

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। माना जाता है कि अमरनाथ की कठिन चढ़ाई के बाद बाबा अमरेश्वर (बर्फानी) के दर्शन मात्र से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। क्या आप जानते हैं कि इस रहस्यमयी गुफा की खोज कैसे हुई और सबसे पहले बाबा बर्फानी के दर्शन का सौभाग्य किसे मिला था? आइए जानते हैं इससे जुड़ी कुछ पौराणिक कथाएं।

    बाबा बर्फानी के दर्शन का महत्व

    'बृंगेश संहिता' व 'नीलमत पुराण' जैसे ग्रंथों में यह वर्णन मिलता है कि, अमरनाथ के दर्शन करने वाले व्यक्ति को काशी से 10 गुना, प्रयाग से 100 गुना और नैमिषारण्य से 1000 गुना अधिक पुण्य मिलता है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्ची श्रद्धा से अमरेश्वर शिवलिंग के दर्शन करता है, उसके लिए सीधे मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यही वह पवित्र गुफा है, जहां भगवान शिव ने माता पार्वती को 'अमर कथा' यानी सृष्टि और अमरता का रहस्य की कथा सुनाई थी।

    Amarnath ai

    (Picture Credit- AI Generated)

    सबसे पहले किसने किए दर्शन?

    बाबा बर्फानी के दर्शन को लेकर दो प्रमुख मान्यताएं मिलती हैं, जो इस प्रकार हैं -

    1. पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, कश्मीर की घाटी पानी में डूबी हुई थी, जो एक विशाल झील थी। ऋषि कश्यप ने कई नदियों और छोटी धाराओं के माध्यम से पानी को बाहर निकाल दिया। उन दिनों, ऋषि भृगु हिमालय की यात्रा पर उस रास्ते से गुजर रहे थे, तभी उन्हें यह पवित्र गुफा मिली। इसलिए ऋषि भृगु को अमरेश्वर शिवलिंग के दर्शन करने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है।

    इस तरह शुरू हुई अमरनाथ यात्रा

    स्थानीय और लोक कथाओं के अनुसार, 15वीं शताब्दी में बूटा मलिक नाम के एक चरवाहे ने इस गुफा की खोज की थी। एक दिन बूटा मलिक को एक संत मिले, जिन्होंने उसे अपना कोयले से भरा एक थैला थमा दिया। घर पहुंचकर जब चरवाहे ने थैला खोलकर देखा, तो कोयला सोने के सिक्कों में बदल चुका था।

    वह हैरान होकर संत को धन्यवाद देने के लिए वापस उसी स्थान पर गया, लेकिन संत वहां नहीं थे। तब चरवाहे को अमरनाथ की गुफा और उसमें विराजमान बर्फ का चमकता हुआ शिवलिंग मिला। जब लोगों ने इस लिंगम के बारे में सुना, तो यह तीर्थयात्रा का एक प्रमुख केंद्र बन गया।

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    (Picture Credit- AI Generated)

    इतिहास के पन्नों में अमरनाथ

    अमरनाथ यात्रा केवल मान्यताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी मौजूद हैं। कल्हण द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक 'राजतरंगिणी' में अमरेश्वर शिवलिंग का उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि रानी सूर्यमती ने 11वीं शताब्दी में त्रिशूल भेंट किया था।

    Sourceश्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड

    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।