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    Chaitra Navratri 2025: मां कात्यायनी की पूजा के समय करें इस स्तोत्र का पाठ, दूर हो जाएंगे सभी संकट

    By Pravin KumarEdited By: Pravin Kumar
    Updated: Wed, 02 Apr 2025 10:00 PM (IST)

    धार्मिक मत है कि देवी मां कात्यायनी (Chaitra Navratri 2025) की पूजा करने से साधक को पृथ्वी लोक पर सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। साथ ही दुखों का नाश होता है। मां कात्यायनी की पूजा करने से अविवाहित जातकों की शीघ्र शादी के योग बनते हैं। वहीं विवाहित महिलाओं के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है।

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    Chaitra Navratri 2025: मां कात्यायनी को कैसे प्रसन्न करें?

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। Chaitra Navratri 2025 Day 6: चैत्र नवरात्र के छठे दिन जगत जननी आदिशक्ति मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त व्रत रखा जाता है। मां कात्यायनी की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही सुखों में अपार वृद्धि होती है।

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    ज्योतिष मनोकामना पूर्ति के लिए मां कात्यायनी की पूजा करने की सलाह देते हैं। शीघ्र विवाह के इच्छुक जातक नवरात्र के छठे दिन मां कात्यायनी की विशेष पूजा करते हैं। अगर आप भी मां कात्यायनी की कृपा पाना चाहते हैं, तो नवरात्र के छठे दिन भक्ति भाव से माता रानी की पूजा करें। साथ ही पूजा के समय देवी कवच और स्तोत्र का पाठ और मंत्र जप करें।

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    माता कात्यायनी के मंत्र

    1. या देवी सर्वभू‍तेषु मां कात्यायनी रूपेण संस्थिता।

    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

    2. चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

    कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥

    3. क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम

    4. ओम देवी कात्यायन्यै नमः॥

    5. एत्तते वदनम साओमयम् लोचन त्रय भूषितम।

    पातु नः सर्वभितिभ्य, कात्यायनी नमोस्तुते।।

    माँ कात्यायनी देवी स्तोत्र

    वन्दे वांछित मनोरथार्थचन्द्रार्घकृतशेखराम्।

    सिंहारूढचतुर्भुजाकात्यायनी यशस्वनीम्॥

    स्वर्णवर्णाआज्ञाचक्रस्थितांषष्ठम्दुर्गा त्रिनेत्राम।

    वराभीतंकरांषगपदधरांकात्यायनसुतांभजामि॥

    पटाम्बरपरिधानांस्मेरमुखींनानालंकारभूषिताम्।

    मंजीर हार केयुरकिंकिणिरत्नकुण्डलमण्डिताम्।।

    प्रसन्नवंदनापज्जवाधरांकातंकपोलातुगकुचाम्।

    कमनीयांलावण्यांत्रिवलीविभूषितनिम्न नाभिम्॥

    स्तोत्र

    कंचनाभां कराभयंपदमधरामुकुटोज्वलां।

    स्मेरमुखीशिवपत्नीकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥

    पटाम्बरपरिधानांनानालंकारभूषितां।

    सिंहास्थितांपदमहस्तांकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥

    परमदंदमयीदेवि परब्रह्म परमात्मा।

    परमशक्ति,परमभक्ति्कात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥

    विश्वकर्ती, विश्वभर्ती,विश्वहर्ती,विश्वप्रीता।

    विश्वाचितां,विश्वातीताकात्यायनसुतेनमोअस्तुते॥

    कां बीजा, कां जपानंदकां बीज जप तोषिते।

    कां कां बीज जपदासक्ताकां कां सन्तुता॥

    कांकारहषणीकां धनदाधनमासना।

    कां बीज जपकारिणीकां बीज तप मानसा॥

    कां कारिणी कां मूत्रपूजिताकां बीज धारिणी।

    कां कीं कूंकै क:ठ:छ:स्वाहारूपणी॥

    अथार्गलास्तोत्रम्

    ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।

    दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

    जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।

    जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥

    मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।

    रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

    पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।

    तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥

    इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।

    स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥

    कात्यायनी जी की आरती 

    जय जय अम्बे जय कात्यायनी।

    जय जग माता जग की महारानी॥

    बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहावर दाती नाम पुकारा॥

    कई नाम है कई धाम है। यह स्थान भी तो सुखधाम है॥

    हर मन्दिर में ज्योत तुम्हारी। कही योगेश्वरी महिमा न्यारी॥

    हर जगह उत्सव होते रहते। हर मन्दिर में भगत है कहते॥

    कत्यानी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की॥

    झूठे मोह से छुडाने वाली। अपना नाम जपाने वाली॥

    बृहस्पतिवार को पूजा करिए। ध्यान कात्यानी का धरिये॥

    हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी॥

    जो भी माँ को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥

    जय जय अम्बे जय कात्यायनी।

    जय जग माता जग की महारानी॥

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