Gita Ke Updesh: जीवन की कठिन परिस्थिति का कैसे करें सामना, जानें गीता के ये उपदेश
श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में कर्तव्य और अधिकार का ज्ञान दिया। गीता के उपदेश जीवन में सही मार्गदर्शन करने का काम करते हैं। गीता में कुछ ऐसी बातों का उल्लेख है जिन्हें जीवन में अपना लिया जाए तो इससे आपको कठिन परिस्थिति से निकलने में मदद मिल सकती है।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश श्रीमद्भगवत गीता में निहित हैं। इसके पाठ से व्यक्ति को न केवल जीवन में सही मागर्दशन मिलता है, बल्कि दुख-दर्द और चिंता से भी मुक्ति मिलती है। न केवल भारत में, बल्कि विदेशों में भी लोग श्रीमद्भगवत गीता का पाठ करते हैं। चलिए जानते हैं गीता के कुछ ऐसे श्लोक, जो मुश्किल समय से निपटने में मदद कर सकते हैं।
1. मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।2.14।।
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण, अर्जुन से कहते हैं कि जीवन में सुख-दुख का आना-जाना लगा रहता है। ऐसे में जो व्यक्ति इन्हें सहना सीख लेता है, उसे जीवन में आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।
2. "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ।।"
गीता के इस श्लोक में श्रीकृष्ण, अर्जुन से कहते हैं कि तेरा अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फलों पर नहीं। इसलिए तू कर्म के फल के प्रति आसक्त न होकर या केवल कर्म कर। अर्थात व्यक्ति केवल कर्म कर सकता है, उसके द्वारा मिलने वाले फल को तय नहीं कर सकता। इसलिए व्यक्ति को सारी चिंताएं छोड़कर केवल अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए।
3. सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।
इस श्लोक में कहा गया है कि, व्यक्ति जैसा विश्वास करता है, वैसा ही बन जाता है। उदाहरण के तौर पर अगर आप हमेशा नकारात्मक सोचते रहते हैं, तो जीवन में भी नकारात्मक चीजें होने लगती हैं, वहीं सकारात्मक व्यक्ति बुरे वक्त को भी सकारात्मक रूप से लेता है। इसलिए मनुष्य को खुद पर भरोसा रखना चाहिए और अपनी सोच सकारात्मक रखनी चाहिए।
4. चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥
इस श्लोक का अर्थ है कि चिंता से ही दुख की उत्पत्ति होती है, किसी और कारण से नहीं। जो व्यक्ति चिंता से रहित है, वह व्यक्ति सभी इच्छाओं से भी मुक्त हो जाता है ।
5. उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।6.5।।
इस श्लोक का अर्थ है कि व्यक्ति को खुद का उद्धार करना चाहिए, न कि पतन, क्योंकि हम खुद ही अपने मित्र होते हैं और खुद ही अपना शत्रु भी बन सकते हैं। ऐसे में अगर आप इस बात को समझेंगे, तो आपके लिए कठिन समस से निकलना और भी आसान हो जाएगा।
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