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    नागा साधुओं के हाथ में हमेशा क्यों होता है यह खास बर्तन? जानें 'ब्रह्म पात्र' से जुड़ा रहस्य

    Updated: Mon, 09 Mar 2026 11:38 AM (IST)

    कुंभ मेले में नागा साधुओं के हाथ में दिखने वाले 'ब्रह्म पात्र' (Brahma Patra) का रहस्य क्या है? जानें क्यों इसे ब्रह्मा जी का सृजन माना जाता है। ...और पढ़ें

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    'ब्रह्म पात्र' का असली रहस्य (Image Source: AI-Generated)

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    धर्म डेक्स, नई दिल्ली। कुंभ मेले या अन्य धार्मिक स्थलों पर आपने अक्सर नागा साधुओं को देखा होगा। भस्म लगाए, त्रिशूल पकड़े और सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुक्त ये साधु हमेशा आम लोगों के लिए एक बड़े रहस्य का विषय रहे हैं। लेकिन, क्या आपने कभी गौर किया है कि वस्त्रहीन रहने वाले इन साधुओं के पास हमेशा एक खास तरह का बर्तन होता है?

    इस अनोखे बर्तन को 'ब्रह्म पात्र' या 'तुंबा' के नाम से जाना जाता है। आखिर यह पात्र क्या है और नागा साधुओं से इसका इतना गहरा संबंध क्यों है।

    ब्रह्मा जी का विशेष सृजन

    मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र पात्र की रचना स्वयं भगवान ब्रह्मा जी ने की थी। इस ब्रह्म पात्र की एक सबसे बड़ी खूबी यह है कि प्रकृति ने इसे जानबूझकर तीखा (कड़वा) बनाया है। इसके पीछे एक बहुत ही व्यावहारिक कारण है। इसे तीखा इसलिए बनाया गया है ताकि कोई गाय या अन्य जानवर इस तुंबे को चबा या खा न सके। इसके अलावा, संन्यासियों का ऐसा भी मानना है कि यह तुंबा केवल एक बर्तन नहीं है, बल्कि यह पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक है।

    साधुओं की 'तिजोरी'

    हम और आप अपने जरूरी सामान और पैसों को सुरक्षित रखने के लिए अलमारी या तिजोरी का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन, नागा साधु दिगंबर (वस्त्रहीन) होते हैं और सांसारिक सुखों से उनका कोई लेना-देना नहीं होता। उनके पास भौतिक संपत्ति के नाम पर कुछ भी नहीं होता। ऐसे में, यह ब्रह्म पात्र ही उनके लिए उनकी एकमात्र अलमारी या तिजोरी का काम करता है। यह पात्र ही उनकी सबसे बड़ी और अनमोल संपत्ति है।

    Brahma

    (Image Source: AI-Generated)

    अत्यंत पवित्रता और सोने का नियम

    नागा साधु अपने इस ब्रह्म पात्र को बहुत ज्यादा पवित्र मानते हैं। उनके लिए यह देवतुल्य है, इसलिए वे इस पात्र को कभी भी किसी गंदी या अशुद्ध जगह पर नहीं रखते हैं। उनकी दिनचर्या में भी इस पात्र का खास ध्यान रखा जाता है। जब नागा साधु रात को सोते हैं, तो वे इस ब्रह्म पात्र को या तो अपने सिरहाने के पास रखते हैं, या फिर इसे अपने त्रिशूल और डंडे पर सुरक्षित रूप से टांग देते हैं।

    भिक्षा से लेकर भोजन तक का साथी

    नागा साधुओं का जीवन अत्यंत सादगी भरा होता है और वे भोजन के लिए भिक्षा पर निर्भर होते हैं। जब वे भिक्षा मांगने के लिए निकलते हैं, तो वे इसी ब्रह्म पात्र का ही इस्तेमाल करते हैं। साधु इसी पात्र में अपना भोजन ग्रहण करते हैं और प्यास लगने पर इसी बर्तन से पानी भी पीते हैं।

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