सत्य की राह पर धैर्य का महत्व, पढ़ें संघर्ष से शांति तक का सफर
सहिष्णुता ही सबसे बड़ी तपस्या है। संसार में सत्य और अध्यात्म के मार्ग में बहुत कुछ सहना होगा और स्वीकार करना होगा। ...और पढ़ें

सहनशीलता और स्वीकार का संगम।
मोरारी बापू, (कथावाचक)। एक समय था, जब तप करने के लिए घर छोड़कर जाना होता था। वनों में, गुफाओं में या कहीं एकांत में। आज इसकी आवश्यकता नहीं है। आज अगर कोई अध्यात्म के मार्ग पर है, सच की राह पर है, दूसरों का भला कर रहा है तो उसे बहुत कुछ सहना होगा। यह सहना ही आज का तप है। जो जितना ज्यादा सह रहा है, वह उतना ही बड़ा तप कर रहा है। अपने नजदीकी और घर परिवार के लोगों का भी बहुत कुछ सहना पड़ता है। अपने ही लोग गालियां दें तो कभी बुरा मत मानना, तब मुस्कुरा कर सहन कर लेना। परिणाम अच्छा होगा।
सब कुछ सहना ही तप है
सब कुछ सहना ही तप है। सहो और सबको स्वीकार करते चलो। याद रखना, आप किसी को सुधार नहीं सकते, स्वीकार करना आपके हाथ में है। इसलिए सुधारने का प्रयास मत करो। सबको स्वीकार करो। मानता हूं बहुत कुछ सहना पड़ेगा लेकिन सहो, तप करो। सहने के लिए साहस चाहिए।
आध्यात्मिक जीवन जीना है
साहस आध्यात्म जगत का महामंत्र है। जिसे आध्यात्मिक जीवन जीना है, साधक जीवन जीना है, संसार को रखते हुए ही संन्यास का अनुभव करना है, उसके लिए साहस एक महामंत्र है। यह मार्ग कमजोरों का है ही नहीं। यहां बहुत साहस करना पड़ता है। लेकिन साहस का उल्टा करके सहसा मत करना। कई लोग जल्दी साहस कर देते हैं।
गोस्वामी जी ने मानस में लिखा है - सहसा करि पाछे पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥ अत: साहस को सहसा मत करना। बिना सोचे जल्दी में साहस करो और पीछे से पछतावा हो, वह समझदारी नहीं है।
दिखाने की चेष्टा
अक्सर पूछा जाता है कि हम परेशान क्यों होते हैं। मुझे और आपको तीन चीजें परेशान करती हैं। पहला है कपट। जिसे हम जगत को दिखा नहीं पाते, छिपाते हैं। दूसरा है दंभ। जो हम होते नहीं हैं,वो दिखाने की चेष्टा करते हैं। हम जैसे नहीं हैं, दूसरों को वैसा दिखाने की कोशिश ही दंभ है और ये हमारी परेशानी का बड़ा कारण है। परेशानी का तीसरा कारण माया है, जो कपट भी कराती है, दंभ भी। परेशानियों से बचना है तो साथ कुमार्ग से बचना होगा। कुमार्ग से बचना ही मार्गी होना है।
हम सब साथ मर्यादा का पालन करें तो हम मार्गी हैं। व्यासकथित सप्त मर्यादाओं के पालन में पहला है द्यूत (जुआ) से बचना। दूसरा कुमार्ग है मद्य, शराब। मैं क्यों आपसे छोड़ने की बात कहूं? मैं कोई अच्छी न पिला दूं, ताकि खराब पेय अपने आप छूट जाए। इसलिए मानस की कथा का रस पियो। जिस ग्रंथ में आपकी रुचि हो, उसे पी जाओ।
तीसरा कुमार्ग है शिकार
तीसरा कुमार्ग है शिकार। इससे बचना होगा। निरीह पशुओं का शिकार तो शिकार है ही, मासूम, निर्दोष या किसी का शोषण भी शिकार ही है। चौथा कुमार्ग है संघर्ष। मुझे लगता है संघर्ष ज्यादातर बिना किसी कारण के ही होता है। अकारण एक दूसरे से संघर्ष ऊर्जा को खत्म कर देता है। पांचवां कुमार्ग है स्त्री का अपमान। व्यास कहते हैं कि नारी गौरव है। नारी की आलोचना नहीं, नारी का सम्मान होना चाहिए। युवाओं से विशेष अनुरोध है, बहन-बेटियों की मर्यादा को संभालें। इस कुमार्ग पर चलने से बचें। छठा कुमार्ग है असत्य। सत्य बोलें और जहां तक हो सत्य भी प्रिय ही बोलना चाहिए।
सातवां कुमार्ग है कुसंग
सत्य के नाम पर किसी का अपमान न हो। सातवां कुमार्ग है कुसंग। यह छूट जाए तो हम मार्गी हैं। आप जिसका संग करेंगे, वैसे हो जाएंगे। सत्संग का असर सूक्ष्म होता है मगर दुसंग या कुसंग का असर जल्दी होता है लेकिन सत्संग असर किए बिना नहीं रहता देर से ही सही मगर सत्संग का असर होता अवश्य ही है। यकीन दिलाता हूं सत्संग असर करेगा ही। युवा भाई-बहन, सहिष्णुता, सहनशीलता सीखनी है तो बूढ़ों का संग करो। घर में जो बुजुर्ग है उन्होंने बहुत सहन किया है। उनके पास बैठो।
युवाओं का संग करो
सहिष्णुता क्या होती है, प्रौढ़ता क्या होती है, वह सीखना हो तो दादा के पास बैठो। निरंतर स्फूर्त रहना है, एक्टिव रहना है तो युवाओं का संग करो। बिलकुल निर्दोष रहना है तो बच्चों का संग करो। ज्ञानी होना है तो ज्ञान परक ग्रंथ अथवा तो जिसका ज्ञान मार्ग है, ऐसे किसी महापुरुष का संग करो। भक्ति में डूबना है तो भक्तों का संग करो। अंदर की ग्रंथियों को, ईर्ष्या, निंदा, द्वेष, अहंकार, पूर्वाग्रह, भय, पाप की ग्रंथियों से मुक्त होना है तो भगवत् ग्रंथ का आश्रय करो। वो ग्रंथि मुक्त करेगा। सद्ग्रंथ का आश्रय करो।
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