क्या है पुण्य और पाप का असली स्वरूप? जानें प्रमुख बातें
जिसमें दूसरे को कष्ट होता है, वह पाप है। जिसमें दूसरे को सुख होता है, वह पुण्य है। पुण्य और पाप वृत्ति हैं, धर्म नहीं। पाप-पुण्य वाणी से, क्रिया से, च ...और पढ़ें

पुण्य-पाप को समझने की एक नई दृष्टि।
स्वामी मैथिलीशरण (संस्थापक अध्यक्ष, श्रीरामकिंकर विचार मिशन)। विरोधाभास सृष्टि और काल का अकाट्य सत्य है। दुख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, स्वर्ग-नरक, दानव-देवता, ऊंच नीच, अमृत-विष, माया-ब्रह्म, जीव और ईश्वर, संपत्ति-दरिद्रता, ये सभी विरोधाभास सृष्टि के निर्माण और संचालन के लिए प्रयोग में आने वाले पदार्थ हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी का उद्घोष है कि सृष्टि गुण-दोषमयी है। इसमें से गुण को ग्रहण करना और दोष का परित्याग करने के विवेक के अतिरिक्त आनंदमय जीवन के लिए कोई अन्य मार्ग नहीं है। यदि ईश्वर कृपा करे तो इस प्रकार की मति बन जाना संभव है। पाप और पुण्य दोनों की कई श्रेणियां हैं। न तो सारे पुण्य पुण्यात्माओं के द्वारा होते हैं, न ही सारे पाप पापात्माओं के द्वारा होते हैं।
पाप और पुण्य की व्याख्या
महत्वपूर्ण सूत्र यह है कि पाप या पुण्य किस भाव से किया गया। बहुधा पाप और पुण्य की व्याख्या हमारे अपने निजी स्वार्थ पर निर्भर होती है। यदि वह दूसरे के पाप का परिणाम है, तब हमें वह भी श्रेष्ठ लगता है। इसके विपरीत, यदि हमारा व्यक्तिगत कोई लाभ नहीं है, यदि दूसरे को लाभ मिल गया तो वह पुण्य भी समाज में बहिष्कार और उपहास का माध्यम बन जाता है। इसीलिए वेद कुछ के स्थान पर “सब” शब्द का प्रयोग करते हैं। “सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत”। जो हो वह सबके लिए हो। सब सुखी रहें, हम सभी के आनंद और सुख की कामना करें, इस स्थिति में पाप की कोई सत्ता रह ही नहीं जाएगी। श्रीरामचरितमानस में रामराज्य में गुणों के संदर्भ में इसी “सब” शब्द का ही प्रयोग किया गया है। सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।। सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।। सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।। सब उदार सब परउपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।
राम जब जीवन और हृदय में आ जाते हैं तो पुण्य बुद्धि का विषय न रहकर स्वभाव बन जाता है। परिणामस्वरूप वह जीवन में उस गुण की संज्ञा में आ जाता है, जहां जो भी होता है, वह सबके लिए सुखकारी और आनंदकारी होता है। पुण्य का कर्ता यदि अहंकार है और पाप का कर्ता भी अहंकार है तो परिणाम दोनों का खराब होगा। जिसमें दूसरे को कष्ट होता है, वह पाप है। जिसमें दूसरे को सुख होता है, वह पुण्य है। पुण्य और पाप वृत्ति हैं, धर्म नहीं। पाप-पुण्य वाणी से भी होते हैं, क्रिया से भी होते हैं, चिंतन से भी होते हैं, दान और परोपकार से भी होते हैं। धर्म के साथ जुड़कर पाप और पुण्य अधिक विराट रूप धारण कर लेते हैं। धर्म जीवन में धारण करने की वस्तु है। धार्मिक व्यक्ति की पहचान है कि वह कहीं पर प्रमाणित होने या दूसरों की तुलना में सर्वश्रेष्ठ कहलाने की कामना वृत्ति से बहुत ऊपर होता है।
असत्य से बढ़कर कोई पाप नहीं
ऐसी वृत्ति पुण्य रूप दिखने पर भी पाप को बल देने वाली होती है। तुलसीदास जी जब कहते हैं कि “नहिं असत्य सम पातक पुंजा” असत्य से बढ़कर कोई पाप नहीं है, तो उसका तात्पर्य केवल यह नहीं है कि जो वाणी से सत्य बोले वह पुण्यात्मा है, बाकी सब पापी हैं। अपितु वे यह कहना चाहते हैं कि जो सत्य है और जो सत है, उसी सत और सत्य रूप ईश्वर के प्रति जो समर्पित है, उससे कभी पाप होगा ही नहीं। धर्म, व्यक्ति, समाज, जाति कोई भी यदि ईश्वर को समर्पित है तो उसके कार्यों से दूसरों को दुख देने जैसा पाप नहीं होता है। यदि किसी में सबको नीचा दिखाकर सर्वश्रेष्ठ बनने की निम्न महत्त्वाकांक्षा है तो वह न तो पुण्य है, न ही धर्म है। होलिका यदि प्रह्लाद को गोद में लेकर जल जाती है तो इसका तात्पर्य यह नहीं है कि ब्रह्मा का वरदान असत्य सिद्ध हो गया, अपितु तथ्य यह है कि होलिका को यह वरदान नहीं था कि वह दूसरे को मारने के लिए भी उस वरदान का दुरुपयोग पाप के रूप में करे तो भी नहीं जलेगी।
पाप-पुण्य का अर्थ
पाप और पुण्य के बीच की सूक्ष्म रेखा को समझना आवश्यक होता है। महाभारतकाल में कौरवों की ओर जो सैनिक या सेनापति थे, वे सब के सब पापी नहीं थे। केवल पाप-पुण्य का अर्थ न जानने के कारण वहां महाभारत हो गया। वे सब न अपने गुणों का सदुपयोग कर पाए और न ही पुण्य के फल धर्म को ही पा सके। पुण्य का परिणाम यदि ईश्वर है तो वह पुण्य है। यदि पुण्यात्मा अपनी निजी प्रतिष्ठा तथा अपने को पुण्यात्मा कहलाने का झंडा फहराने के लिए पुण्य कर रहा है तो ऐसी स्थिति में वह समाज में विकृत प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंद्विता को जन्म देगा। उस स्थिति में भौतिक रूप से दिखाई देने वाला पुण्य जो पाप भाव से किया जा रहा है, विनाश को प्राप्त हो जाता है।
बुराई का अंत
श्रीरामचरितमानस में वर्णित एक राजा प्रतापभानु के जीवन में यही हुआ। उसकी महत्त्वाकांक्षा इतनी बढ़ गई कि वह अंत में रावण और कुंभकर्ण बन गया। दंभयुक्त पुण्य और समाज में श्रेष्ठ और पुण्यात्मा कहलाने के नाम पर बुराई और पाप के प्रति दिखाई देने वाली निष्ठा रूप पुण्य भी अंत में विनाश को ही प्राप्त होता है। जो गांधारी अपने पुण्य के परिणामस्वरूप प्राप्त तपबल की शक्ति का उपयोग भगवान को शाप देकर अपने को पुण्यात्मा मानती है, अपनी आंखों का उपयोग पति धृतराष्ट्र की सेवा के लिए न करके आंखों पर काली पट्टी बांधकर अपने को पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ कहलवाने की कामना से पुण्यात्मा बनना चाह रही थी, वह गांधारी यह नहीं समझ पाई कि उसका शाप इसलिए सिद्ध हो सका, क्योंकि भगवान उस विनाश के संकल्प को पहले ही कर चुके थे।
निष्ठा और समर्पण का आधा
कोई सिद्धि हो, धर्म हो, सत्य या कितनी भी तपस्या हो, जिसकी निष्ठा और समर्पण का आधार ईश्वर के प्रति शरणागति नहीं होगा, वह व्यक्ति को आंखें होते हुए भी अंधा बना देगा। यदि सूरदास की तरह कृष्ण को समर्पित आंखें हैं तो अंधी आंखों से भी वे भगवान के नित्य शृंगार का भेद बता देंगे। भगवान की कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण अर्जुन के जीवन में दिखाई देता है। जो अर्जुन कौरवों के विरुद्ध युद्ध करने को पाप समझकर भगवान से कह रहा था कि निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन:॥ अर्थात हे कृष्ण! इन आतताइयों को मारकर हमें तो पाप ही तो लगेगा।
ज्ञान, भक्ति और कर्म
उसी अर्जुन को पाप और पुण्य की वास्तविक व्याख्या ज्ञान, भक्ति, कर्म के 18 अध्यायों की गीता सुनाकर भगवान ने अर्जुन को वह कृपादृष्टि दे दी कि वह कहने लगा कि नष्टो मोह:स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव।। अर्थात आपकी कृपा से मेरा यह मोह कि सामने दिखाई देने वाले मेरे संबंधी और अपने हैं, मैं उनके पापों को नहीं देख पा रहा था। अब आपकी कृपा से मेरा संदेह और मोह दूर हो गया, अब मैं वही करूंगा जो आप कहेंगे। यह भक्त के भाव की चरम परिणति है।
पाप-पुण्य की लौकिक व्याख्या
व्यक्ति पाप-पुण्य की लौकिक व्याख्याओं से ऊपर उठकर उसके परम तत्त्व को समझकर अपनी निष्ठा और आस्था को ईश्वर विषयक बनाकर स्वयं को तथा समस्त लोक के कल्याण का माध्यम बन जाता है। विडंबनाओं से प्रभावित न होकर ईश्वर (जिसमें समस्त विरोधी धर्मों का वास है) में निष्ठ होकर जो वे कराएं, निमित्त होकर करके उसके पुरुषार्थ का वह फल प्राप्त करना चाहिए, जो पाप और पुण्य से भी ऊपर है। जो भक्ति, ज्ञान तथा मोक्ष का प्रदाता है।
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