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    Fatehpur Temple Or Tomb Clash: फतेहपुर विवाद में सामने आया ये सच, मकबरे के नाम दर्ज जमीन थी जमींदार का बागान

    By Vinod mishra Edited By: Anurag Shukla1
    Updated: Wed, 13 Aug 2025 05:25 PM (IST)

    फतेहपुर में मंदिर-मकबरे की जमीन को लेकर विवाद के बाद सरकारी दस्तावेजों की जांच की गई। राजस्व रिकार्ड के अनुसार जमीन पहले जमींदार का बागान थी फिर शकुंतला मान सिंह और बाद में रामनरेश के नाम दर्ज हुई। 2012 में खतौनी में मकबरा मंगी का नाम दर्ज हुआ। मठ-मंदिर समिति का दावा है कि मकबरे में मंदिर होने के साक्ष्य हैं।

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    आबूनगर स्थित जिस मकबरे को लेकर विवाद।

    जागरण संवाददाता, फतेहपुर। मंदिर-मकबरे के जिस जमीन को लेकर सोमवार को बवाल हुआ था, मंगलवार को दिन भर जमीन को जांचने के लिए सरकारी दस्तावेज पलटे गए। इस दौरान कुछ दस्तावेज सामने आए हैं। आबूनगर स्थित जिस मकबरे को लेकर विवाद है उसकी जमीन राजस्व के असल रिकार्ड 1359 फसली (1952) की खतौनी में जमींदार का बागान के नाम से दर्ज है। बाद में यह शकुंतला मान सिंह के नाम आ गई, फिर यह रामनरेश के नाम दर्ज हुई। पहली बार 2007 में मामला अदालत पहुंचा और 2012 में खतौनी में मकबरा मंगी का नाम दर्ज हो गया था। अब मकबरे को ठाकुरद्वारा बताया जा रहा है, जो पास में ही दूसरे गाटा संख्या में स्थित है।

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    डीएम रविंद्र सिंह ने बताया कि दस्तावेज जांचे जा रहे हैं। पुरात्व विभाग को भो पत्र भी लिखा गया है। मंगलवार को दस्तावेजों की जांच में सामने आया है कि जिस जमीन पर मकबरा है वह जमींदार लाला ईश्वर सहाय के पुत्र नरेश्वर मान सिंह को वरासत से मिली। उनकी मृत्यु के बाद 1970 में जमीन बेटी शकुंतला मान सिंह के नाम चली गई। शकुंतला ने इसे असोथर के रामनरेश को बेच दी और उन्होंने इस पर 34 लोगों को प्लाट भी बेचे। बाद में वह कानपुर में रहने लगे। इसके बाद कभी सामने नहीं आए।

    मकबरे के तत्कालीन मुतवल्ली मो. अनीश ने 2007 में पहला मुकदमा सिविल जज सीनियर डिवीजन के यहां दर्ज किया गया था, जिसमें टाइटिल डिसाइड का फैसला चार जून 2010 को आया था। इसी आदेश के आधार पर 2012 में गाटा नंबर 753 में मकबरा मंगी का नाम दर्ज हुआ था। मुतवल्ली ने हाई कोर्ट में याचिका 2013 में दाखिल की थी, जिसमें दावा किया गया था कि जमीन को शकुंतला मान सिंह के नाम गलत ढंग से रिकार्ड में चढ़वाया गया था। अब मकबरे कब्जे का प्रयास किया जा रहा है। हाई कोर्ट ने उस समय डीएम को जांच कराने करने को कहा था। तत्कालीन डीएम राकेश कुमार ने जांच कराई तब जानकारी हुई कि 2012 में रामनरेश का नाम खतौनी से निरस्त करते हुए मकबरा मंगी के नाम दर्ज कर दी गई थी।

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    समिति का दावा, जमीन मंदिर की

    सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से मुतवल्ली नियुक्त किए गए अबू हुरेरा का दावा है कि मकबरा 1611 में बना था। जमीन राष्ट्रीय संपत्ति घोषित है और यह पुरातत्व विभाग की सूची में दर्ज है या नहीं इसकी जानकारी प्रशासन द्वारा पत्राचार कर पुरातत्व विभाग से मांगी गई है।

    गुंबर का आकार कमल की तरह

    वहीं, मठ-मंदिर संरक्षण संघर्ष समिति के सदस्य धनन्जय द्विवेदी का दावा है कि मकबरे के ऊपरी गुंबद में कमल आकार बना हुआ है, जिसमें शिखर लगाने का स्थान है। ऊपरी हिस्से पर अब भी भगवा रंग की पुरानी पोताई है, लेकिन नवीन पोताई में हरा रंग है। उन्होंने बताया कि वहां घंटा बांधने के लिए जंजीर बंधी है। कई ऐसे चिह्न हैं जो मकबरे के मंदिर होने के साक्ष्य दे रहे हैं।