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    Exclusive: हरीश राणा केस जीतने वाले वकील की जुबानी; सुप्रीम कोर्ट में कैसे लड़ी 'सम्मान से मरने' की लंबी जंग?

    Updated: Thu, 12 Mar 2026 02:28 PM (IST)

    सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को 13 साल के संघर्ष के बाद परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति देकर भारत के कानूनी इतिहास में एक मानवीय मिसाल कायम की ...और पढ़ें

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    सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता मनीष जैन से दैनिक जागरण की विशेष बातचीत। जागरण

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    संक्षेप में पढ़ें

    जागरण संवाददाता, गाजियाबाद। भारत के कानूनी इतिहास में 11 मार्च 2026 का दिन एक मानवीय और संवेदनशील मिसाल के रूप में दर्ज हो गया, जब सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के 31 वर्षीय युवक हरीश राणा को परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति दी।

    इस फैसले ने न केवल एक असहाय परिवार के 13 वर्षों के संघर्ष को विराम दिया, बल्कि इच्छामृत्यु से जुड़े कानून को नई दिशा भी दी। इस पूरे मामले में हरीश राणा के पिता अशोक राणा की ओर से निशुल्क पैरवी करने वाले सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता मनीष जैन से दैनिक जागरण के उप मुख्य संवाददाता शाहनवाज अली की बातचीत की।

    यह मामला आप तक कैसे पहुंचा ?

    अशोक राणा से मेरी मुलाकात मोहन नगर में ब्रह्माकुमारी लवली दीदी के माध्यम से हुई। उन्होंने आग्रह किया कि कोर्ट के जरिए मदद कीजिए। पहले हम दिल्ली हाई कोर्ट गए, जहां याचिका खारिज हो गई। इसके बाद 2024 में सुप्रीम कोर्ट में दोबारा अर्जी दाखिल की।

    आप इस केस को आप कैसे देखते हैं?

    यह केस सिर्फ कानूनी बहस नहीं था, बल्कि एक पिता और माँ के अंतहीन दर्द और उसकी टूटती उम्मीदों की कहानी थी। 13 साल तक अपने बेटे को वेंटिलेटर पर जीवित रखना, हर दिन वही पीड़ा देखना यह किसी भी इंसान के लिए असहनीय है। कोर्ट ने यहां कानून के साथ-साथ करुणा को भी महत्व दिया। दिल्ली हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक लंबी लड़ाई

    2024 में क्या निर्णायक मोड़ आया?

    तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने अपने कार्यकाल के अंतिम दिनों में, 8 नवंबर 2024 को इस मामले में बेहद संवेदनशील आदेश दिए। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार को हरीश राणा के लिए मेडिकल असिस्टेंस और समुचित देखभाल सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। इससे केस को एक नई मानवीय दिशा मिली।

    अंतिम फैसला कैसे आया?

    11 मार्च 2026 को जस्टिस जे बी परदीवाला और जस्टिस के वी विश्वनाथन की खंडपीठ ने एक पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। यह फैसला 2018 के कॉमन कॉज सिद्धांतों पर आधारित था, लेकिन खास बात यह रही कि यह भारत का पहला ऐसा मामला है, जिसमें कोर्ट ने सीधे तौर पर इसकी मंजूरी दी।

    कोर्ट ने एम्स को निर्देश दिए कि हरीश राणा के जीवन रक्षक उपकरण गरिमा के साथ हटाए जाएं और पल्लिएटिव केयर के जरिए यह सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा न हो।

    इस फैसले का व्यापक असर क्या होगा?

    यह निर्णय भविष्य में उन परिवारों के लिए रास्ता खोलेगा, जो असाध्य बीमारी और निरंतर पीड़ा से जूझ रहे हैं। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि जीवन की गरिमा, केवल जीवन को खींचते रहने में नहीं, बल्कि सम्मानजनक विदाई में भी होती है।

    एक पिता की जीत, एक बेटे की शांति

    वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष जैन कहते हैं कि इस केस में मेरी भूमिका एक वकील से ज्यादा, एक संवेदनशील इंसान की थी। अगर इस फैसले से एक पिता को मानसिक शांति मिली और एक बेटे को पीड़ा से मुक्ति, तो यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।

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