न दवा काम आई न दुआ: इच्छामृत्यु के लिए AIIMS शिफ्ट हुआ हरीश; बेटे का दर्द खत्म करने को मां-बाप ने दिल पत्थर किया
Harish Rana AIIMS Shift for Euthanasia: सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की इजाजत मिलने के बाद गाजियाबाद के हरीश राणा को 13 साल बाद इच्छामृत्यु के लिए ए ...और पढ़ें

हरीश राणा इच्छामृत्यु के लिए एम्स में शिफ्ट मां बोली- बेटे की पीड़ा खत्म करने का फैसला सबसे भारी। ग्राफिक्स- अमन कुमार।
डिजिटल डेस्क, गाजियाबाद। 14 मार्च की सुबह… गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन स्थित एंपायर सोसाइटी की 13वीं मंजिल के उस फ्लैट में परिजन, पड़ोसी, डॉक्टर, अधिकारी और कुछ अनजान चेहरे मौजूद हैं, लेकिन आवाजें सुनाई नहीं दे रही हैं, घर में सन्नाटा इस कदर पसरा है कि सांसों की आहट तक साफ सुनाई दे जाए। मां दिल पर पत्थर रखे अविरल आंखों से विदाई की तैयारी कर रही हैं, तो पिता भर्राए गले से बुढ़ापे की लाठी को विदा कर रहे हैं।
13 साल तक लक्ष्मण की तरह बड़े भाई की सेवा करने वाले छोटे भाई को पता है, उसके 'राम' के कष्टप्रद जीवन का वनवास खत्म हो रहा है, लेकिन उसके घर की अयोध्या में रौनक नहीं, सन्नाटा और गहरा जाएगा।
डॉक्टर और अधिकारियों ने अपनी औपचारिकताएं पूरी कीं तो स्ट्रेचर धीरे-धीरे दरवाजे तक लाया गया। मां निर्मला देवी बेटे का चेहरा हथेलियों में थामकर माथा चूम लेती हैं और पिता अशोक राणा झुककर उसके बालों पर हाथ फेरते हैं।
परिवार के सभी सदस्य जानते हैं कि हरीश से जुड़े अनगिनत सपने और उम्मीदें ने पहले ही दम तोड़ दिया। मां-बाप की मिन्नतें न मंदिर में सुनी गईं, न किसी मजार पर कबूल हुईं। आज 13 साल बाद हरीश घर से बाहर जा रहा है और अब कभी लौटकर नहीं आएगा।

लिफ्ट का दरवाजा बंद होता है। पिता डॉक्टर्स की टीम के साथ चले जाते हैं और मां पल्लू से चेहरा ढंककर फफक पड़ती हैं। शब्द सुनाई देते हैं- हमने 4588 दिन इसी दर्द के साथ काटे हैं, लेकिन बेटे की पीड़ा खत्म करने का फैसला उससे भी ज्यादा दर्दनाक है।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) की ओर से इच्छामृत्यु की इजाजत मिलने के बाद शनिवार को जब 32 साल के हरीश राणा को एम्स के पैलिएटिव केयर विभाग ले जाया गया, उस वक्त परिवार का मंजर कुछ ऐसा ही था। हरीश को सीएमओ की देखरेख में एम्स में शिफ्ट कर दिया गया है।

हरीश कोमा में कैसे पहुंचा?
अशोक राणा और निर्मला देवी का बड़ा बेटा हरीश पढ़ने-लिखने अव्वल रहता था। हरीश साल 2012 में मोहाली स्थित चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में इंजीनियर विभाग के पहले बैच में शामिल हुए। लेट्रल एंटी के जरिये हरीश का दाखिला सीधे दूसरे वर्ष में हुआ था। यूनिवर्सिटी में हमेशा टॉप-5 स्टूडेंट्स की लिस्ट में हरीश का नाम रहता। परिवार जल्द बेटे के इंजीनियर बनने के सपने देख रहा था।
साल 2013 की रक्षाबंधन के दिन हरीश घर नहीं आया। शाम का वक्त था। बहन से फोन पर बात की। एक घंटे बाद ही हरीश के चार मंजिला इमारत से नीचे गिरने की खबर मिली। पिता अशोक राणा बताते हैं कि हम लो रात में ही पहुंच गए। बेटे को पीजीआई में भर्ती कराया गया था।
हरीश गंभीर ब्रेन इंजरी और रीढ़ की हड्डी में चोट के कारण परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (Permanent Vegetative State) में चला गया। इस अवस्था में मरीज की सांस, धड़कन और कुछ बेसिक बॉडी फंक्शन करती है, लेकिन दिमाग का हिस्सा काम नहीं करता है।
डॉक्टरों ने कह दिया था- आपका बेटा लाइलाज
10 दिन पीजीआई में इलाज चला। फिर एम्स दिल्ली में रेफर कराया, यहां एक महीने तक वेंटिलेटर पर रहा। इसके बाद कई महीने मेदांता और अपोलो समेत कई अस्पतालों में चक्कर लगाए।
सभी डॉक्टरों ने एक ही बात कही, 'आपका बेटा लाइलाज स्थिति में पहुंच गया। अब उसे आपकी सेवा और दुआएं ही बचा सकती हैं। इसके बाद उसे घर ले आए। तब से उसकी सेवा कर रहे। हर दिन भगवान से प्रार्थना की कि शायद कोई चमत्कार हो जाए।

मां बेटे को हर दिन सब कुछ बताती
हरीश की मां निर्मला देवी की आंखों से बातचीत के दौरान कई बार आंसू लुढ़क जाते हैं। वे दुपट्टे से पोंछ लेती हैं।
कहती हैं -
जिस बेटे को इतने नाज-नखरों से पाला। जो माता-पिता के इशारे से पूरी कहानी समझ जाता था, उसे इतने साल तक इस हालत में देखना बहुत ही कष्टदायक रहा। सबसे बड़ा दुख तो इस बात का रहा कि उसने न अपना दर्द बताया और न कोई शिकायत की। न यह बताया कि उसे क्या अच्छा लग रहा है और क्या नहीं। सुबह-शाम उसके पास बैठती।
मालिश करती तो उसे परिवार के बारे में सब कुछ बताती- आज क्या हुआ, घर में क्या खाना बना; क्या पुराना हो गया और क्या नया आया। उसके पापा कहां गए; भाई ने क्या किया, बहन ने क्या नया सीखा। घंटों बैठकर निहारती कि शायद पलक झपकाए तो लगे कि उसने सब सुन लिया। छींक, जम्हाई और आंख के आसपास त्वचा फड़कती तो सुकून आता कि हां मेरा बच्चा जिंदा है।

मां बोलीं- बेटे का दर्द देखा नहीं जाता
हरीश की मां निर्मला देवी ने एक दिन पति से कहा कि हमारा बच्चा बता भी नहीं पता है कि उसको क्या और कहां तकलीफ है। उसका दर्द हमेशा देखा नहीं जाता। हम दोनों भी बूढ़ हो रहे हैं। बेटा और बेटी अपनी-अपनी चीजों में व्यस्त हो रहे हैं। हरीश की देखभाल कौन करेगा। हम हरीश को दर्द में नहीं छोड़ सकते। हरीश के लिए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए।
ब्रह्मकुमारी दीदी ने वकील से मिलवाया
राणा परिवार ब्रह्मकुमारी से जुड़ा है, ऐसे में उन्होंने दीदी से अपना दर्द साझा किया। दीदी ने एक एडवोकेट मनीष जैन से मिलवाया। फिर दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई, जहां याचिका खारिज हो गई है।
फिर साल 2024 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने हमारा दर्द समझा और अर्जी मंजूर कर ली। उसके बाद सुनवाई जारी थी।
11 मार्च, 2026 को ऐतिहासिक फैसला आया। इसके बाद एम्स ने सभी तैयारियां कर ली थी और आज सीएमओ की देखरेख में एम्स में शिफ्ट में कर दिया। यहां इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
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