Mobile Addiction: ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों को बना रहा मायोपिया का शिकार, इन बातों का रखें विशेष ध्यान
गोरखपुर में मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से बच्चों की आंखें खराब हो रही हैं। ओपीडी में 90% बच्चों में दृष्टिदोष का कारण स्क्रीन टाइम है। मायोपिया और हाइपरमेट्रोपिया जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं जिसका मुख्य कारण स्मार्ट डिवाइसों का ज्यादा इस्तेमाल है। डॉक्टरों का सुझाव है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखें और आउटडोर गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें।

जागरण संवाददाता, गोरखपुर। मोबाइल फोन का ज्यादा उपयोग करने वाले बच्चों की आंखें भी खराब हो रही हैं। उनमें सूखापन, पानी गिरने की समस्या तो आ ही रही है, ज्यादा स्क्रीन टाइम से वे मायोपिया या हाइपरमेट्रोपिया नामक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। मायोपिया में दूर की चीजें व हाइपरमेट्रोपिया में नजदीक की चीजें कम दिखाई देती हैं।
बीआरडी मेडिकल कालेज व निजी अस्पतालों में दृष्टिदोष की समस्या लेकर पहुंच रहे बच्चों में 90 प्रतिशत की मोबाइल एडिक्शन की हिस्ट्री मिली है। सबसे ज्यादा बच्चे मायोपिया से पीड़ित हैं। इनमें से एक-दो प्रतिशत में हाइपरमेट्रोपिया या प्रोगेसिव मायोपिया की समस्या मिल रही है। डॉक्टरों ने आनुवांशिक के साथ ही इसका मुख्य कारण स्क्रीन टाइम को बताया है। आंख में सूखापन व पानी गिरने की समस्या का सबसे बड़ा कारण ज्यादा स्क्रीन टाइम ही मिला है।
धीरे-धीरे बहुत कुछ डिजिटल होता जा रहा है। स्मार्ट मोबाइल व स्मार्ट टीबी पर अधिक स्क्रीन टाइम बच्चों को दृष्टि दोष का दर्द दे ही रहा था, अब स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड ने इसे और बढ़ा दिया है। ये सारे संसाधन प्रगति में चाहे जितनी बच्चों की मदद कर रहे हों लेकिन उनकी आंखों की रोशनी भी छीन रहे हैं। इसलिए वे मायोपिया, हाइपरमेट्रोपिया (कम दिखना) व प्रोग्रेसिव मायोपिया (कुछ समय के बाद चश्मे का नंबर बढ़ जाना) के शिकार हो रहे हैं।
ऐसे बच्चों की संख्या पिछले पांच वर्षों में दोगुणा से अधिक हो गई है। पहले ओपीडी में प्रोग्रेसिव मायोपिया के शिकार बच्चे सप्ताह में एक-दो आते थे। 10-12 बच्चों में सामान्य मायोपिया (जिनके चश्मे के नंबर बढ़ते नहीं हैं) से पीड़ित बच्चों की संख्या एक-दो होती थी। अब 10-12 बच्चों में ऐसे बच्चों की संख्या सात-आठ है।
इनमें लगभग दो-दो प्रोगेसिव मायोपिया व हाइपरमेट्रोपिया से पीड़ित होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार जैसे-जैसे बच्चों की उम्र बढ़ती है और कार्निया का आकार बढ़ता है, वैसे ही यह बीमारी बढ़ती जाती है। इसलिए चश्मे का नंबर बढ़ता जाता है।
चश्मे का नंबर लगभग 18 साल की उम्र तक बढ़ता रहता है। इसके बाद स्थिर हो जाता है। उस समय लेसिक सर्जरी कर उनका चश्मा हटा दिया जाता है। डाक्टरों ने स्मार्ट मोबाइल, स्मार्ट टीबी, स्मार्ट बोर्ड व अधिक स्क्रीन टाइम को नुकसानदेह बताया है।
इस पर दें ध्यान
- बच्चों को ज्यादा देर तक मोबाइल, टीबी न देखने दें।
- कंप्यूटर पर काम करते समय हर 20 मिनट के बाद 20 सेकेंड का ब्रेक लें।
- बच्चों को आउटडोर एक्टिविटी (घर के बाहर खेलने-कूदने) के लिए प्रेरित करें।
- भोजन में हरी सब्जियां, फल का इस्तेमाल ज्यादा करें।
- मायोपिया हो गई है तो साल में तीन बार जांच अवश्य कराएं।
मोबाइल बच्चों के लिए बहुत नुकसानदायक है। ओपीडी में दृष्टिदोष के जितने भी बच्चे आते हैं, उनमें से 90 प्रतिशत का कारण मोबाइल ही मिलता है। पढ़ने के लिए घंटों मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं। पढ़ाई के बाद इंटरनेट मीडिया से जुड़ जाते हैं। इससे आंखों में सूखापन, पानी गिरने, कम दिखने की समस्याएं आ रही हैं।
-डा. पंकज सोनी, अध्यक्ष नेत्र रोग विभाग, बीआरडी मेडिकल कालेज
यदि बच्चे को प्रांरभ में ही मोबाइल की आदत लग गई तो उसे मोबाइल से दूर करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। ज्यादा देर तक मोबाइल देखने से उनकी आंखें खराब हो रही हैं। वे मायोपिया, प्रोगेसिव मायोपिया या हाइपरमेट्रोपिया के शिकार हो रहे हैं। इन बीमारियों से ग्रसित बच्चों की संख्या पिछले पांच वर्षों में दोगुणा से अधिक हो गई है।
-डा. रजत कुमार, नेत्र रोग विशेषज्ञ
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