भीषण गर्मी का कहर; 31 मई तक कानपुर में Emergency Heat Alert, सुबह 10 से दोपहर 3 बजे तक धूप में न निकलने की सलाह
कानपुर में बढ़ते तापमान के कारण हाइपरथर्मिया के मरीजों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे अस्पतालों में भीड़ बढ़ गई है। स्वास्थ्य विभाग ने 31 ...और पढ़ें

जागरण संवाददाता, कानपुर। तेजी से बढ़ रहा तापमान आइसीयू तक पहुंचा रहा है। एलएलआर, उर्सुला और कांशीराम चिकित्सालय की ओपीडी हाइपरथर्मिया के मरीजों की संख्या बढ़ गई है। इससे ग्रसित मरीज चक्कर आना, पेट का संक्रमण, बुखार, दस्त, उल्टी और निर्जलीकरण के लक्षण लेकर फिजीशियन के पास पहुंच रहे हैं। जो अनदेखी और सामान्य लू समझकर घर पर ही इलाज कर रहे हैं। यह उनकी जान के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। ऐसे ही एक मरीज का इलाज एलएलआर अस्पताल की इमरजेंसी में चल रहा है। जो आइसीयू में भर्ती है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी इमरजेंसी हीट अलर्ट में 31 मई तक तापमान की वृद्धि को देखते हुए लोगों को 10 से दोपहर तीन बजे तक घर में रहने की ही सलाह दी गई है। हीट वेव के खतरे को देखते हुए ही सरकारी अस्पतालों में एसी और कूलर युक्त विशेष वार्ड तैयार किए गए हैं, जहां पर हीट वेब से ग्रसित मरीजों का इलाज प्राथमिकता पर किया जाएगा।
हाइपरथर्मिया एक चिकित्सीय स्थिति है जिसमें शरीर का तापमान सामान्य स्तर से अधिक बढ़ जाता है। यह तब होता है जब शरीर बहुत अधिक गर्मी सोख लेता है या गर्मी को ठीक से नियंत्रित नहीं कर पाता है, जिससे शरीर का तापमान अधिक हो जाता है। 19 अप्रैल को ओपीडी में प्रतिदिन 100 से ज्यादा ऐसे मरीज पहुंच रहे हैं। जिनमें बुखार के साथ मांसपेशियों में ऐंठन, सिरदर्द, चक्कर आना और मतली के साथ तेज सांस लेना और हृदय गति का बढ़ जाना और अधिक पसीना आने की समस्या भी मिल रही है।
वहीं, इमरजेंसी में 10 से 12 मरीज गर्मी की चपेट में आकर भर्ती हो रहे हैं। इसमें गंभीर मामलों में आइसीयू की जरूरत पड़ रही है। जीएसवीएम मेडिकल कालेज के प्राचार्य प्रो. संजय काला ने बताया कि मई-जून वाली गर्मी अप्रैल में पड़ने से बीमारियों का जोखिम बढ़ गया है। इसको देखते हुए इमरजेंसी के रेड जोन और विशेष वार्ड को तैयार किया गया है।
हृदय, किडनी, ब्रेन और मेटाबालिज्म पर असर
आइएमए की पूर्व अध्यक्ष डा. नंदिनी रस्तोगी ने बताया कि हीट वेव शरीर पर अत्यधिक दबाव डालती है, इस कारण और हृदय, किडनी, मस्तिष्क और मेटाबालिज्म पर असर पड़ता है। शुरुआती गर्मी इसलिए भी खतरनाक होती है। क्योंकि इसमें पसीना देर से आता है और शरीर में सोडियम की कमी होने लगती है। इसके विपरीत मई-जून तक शरीर धीरे-धीरे अनुकूल हो जाता है, इससे पसीना जल्दी और अधिक प्रभावी ढंग से आने लगता है तथा रक्त संचार बेहतर हो जाता है। उन्होंने कहा कि 45 डिग्री तापमान शरीर पर अधिक दबाव डालता है। इससे डिहाइड्रेशन, बेहोशी और हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। भीषण गर्मी में रक्त वाहिकाएं फैलती हैं और हृदय को अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। वहीं, किडनी पानी बचाने के लिए अधिक क्रियाशील हो जाती है। इस कारण ही बिना काम किए गर्मी के दिनों में अधिक थकान लगती है।
तीन से सात डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता शहर का तापमान
गर्मी के दिनों में कानपुर का तापमान आस-पास के शहरों की तुलना में तीन से सात डिग्री सेल्सियस बढ़ जाता है। इसे अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव कहा जाता है। तेजी से बढ़ रहा कंक्रीट का विस्तार, पेड़ों की कमी, वाहनों और एसी की गर्मी से रात का तापमान बढ़ने लगता है। इससे शरीर को ठंडा होने का मौका नहीं मिलता है। इस कारण ही आंतों में रक्त का प्रवाह धीमा हो जाता है और पाचन से जुड़ी समस्याएं बढ़ने लगती है।
गर्मी में होने वाली समस्याएं
- पेट फूलना।
- एसिडिटी।
- भूख कम लगना।
- पेट में दर्द।
- मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव।
गर्मी के कारण
- सेरोटोनिन और डोपामिन में बदलाव होने लगता है।
- डिहाइड्रेशन से मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम होना।
- कार्टिसोल (तनाव हार्मोन) बढ़ता है।
हीट स्ट्रोक मेडिकल इमरजेंसी
डा. नंदिनी रस्तोगी ने कहा कि हीट स्ट्रोक मेडिकल इमरजेंसी है। इसमें शरीर से पसीना आना बंद होता है। ऐसा होने पर व्यक्ति को ठंडी जगह ले जाएं। पानी डालकर शरीर को ठंडा करें। सीधा लेटाकर पैर ऊपर रखें। होश में आने पर ओआरएस का पानी दें।
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