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    ‘मोगली गर्ल’ एहसास को जंगल में किसने पाला? इंसानों के बीच नौ साल बिताने के बाद दुनिया को कहा अलविदा

    Updated: Sat, 20 Jun 2026 07:11 PM (IST)

    नौ साल पहले बहराइच के जंगलों में चौपायों की तरह मिली 'मोगली गर्ल' एहसास का लखनऊ में निधन हो गया। ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. 'मोगली गर्ल' एहसास का लखनऊ में दुखद निधन।

    2. नौ साल पहले बहराइच के जंगल में मिली थी।

    3. फेफड़ों में सेप्टीसीमिया के कारण हुई मृत्यु।

    अजय शुक्ला, लखनऊ। नौ साल पहले बहराइच के जंगलों में चौपायों की तरह व्यवहार करते मिली ‘मोगली गर्ल’ अपने पीछे किस्सों-कहानियों की एक पोटली छोड़ अनंत की ओर विदा हो गई।

    रुडयार्ड किपलिंग की रचना जंगल बुक के पात्र मोगली की तरह लंबे अरसे तक जंगल में पली-बढ़ी मोगली को यह नाम जागरण ने ही दिया था। बाद में उसे कई और नाम मिले, लेकिन ‘मोगली गर्ल’ के रूप में वह हर बार याद की गई।

    इस समय वह लखनऊ में निर्वाण संस्था में रह रही थी जहां उसे एक नया नाम अहसास दिया गया था। यहीं उसे 15 जून को राम मनोहर लोहिया अस्पताल ले जाया गया जहां फेफड़ों में सेप्टीसीमिया के कारण मौत हो गई।

    लोगों को कैसे मिली थी ‘मोगली गर्ल’?

    ‘मोगली गर्ल’ उर्फ अहसास के जाने के बाद सबसे अधिक सन्नाटा उस पुनर्वास केंद्र में पसरा है, जहां उसने अपने जीवन के लगभग नौ वर्ष बिताए थे। यह जनवरी 2017 की बात है। गला देने वाली ठंड के बीच ‘मोगली गर्ल’ कतर्नियाघाट में मोतीपुर रेंज के जंगलों में बंदरों के बीच मिली थी।

    मिहीपुरवा के शुएब रायनी व राजेश यज्ञसैनी बाइक से लखीमपुर जा रहे थे। खपरा वन चौकी के पास सड़क से लगभग 10 मीटर अंदर जंगल में एक बालिका बंदरों से घिरी दिखी। दोनों रुक गए। धीरे-धीरे राहगीरों व आसपास के लोगों की भीड़ एकत्र हो गई।

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    बंदरों को भगाने की कोशिश की गई, लेकिन बंदरों के झुंड किसी भी कीमत पर बालिका को छोड़ना नहीं चाहते थे। लोग भगाने का प्रयास करते तो बंदर आक्रामक हो जाते। किसी तरह बंदरों को भगाया गया, लेकिन बालिका से कुछ दूरी पर बंदरों के झुंड मौजूद रहे। इसकी सूचना यूपी-100 को दी गई।

    मौके पर पहुंची यूपी-100 की टीम किसी तरह बालिका को बंदरों के झुंड से छुड़ाकर थाने पर ले गई। 19 जनवरी को उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और फिर 25 जनवरी को बहराइच के जिला अस्पताल (अब मेडिकल कालेज) में भर्ती कराया गया। जिला अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में वह अनिश्चित भविष्य लिये भर्ती थी।

    इस बीच जागरण को इस बच्ची के बारे में पता चला तो उसने छह अप्रैल 2017 के अंक में प्रमुखता से बच्ची के जंगलों में बंदरों के बीच मिलने की कहानी प्रकाशित की।

    जागरण में स्टोरी छपने के बाद जिले का ही नहीं प्रदेश का प्रशासनिक अमला भी सक्रिय हुआ और उसे इलाज व उचित देखरेख के लिए 11 अप्रैल को अस्पताल से डिस्चार्ज कर लखनऊ की निर्वाण संस्था को सौंप दिया गया। तब से बच्ची यहीं थी।

    बहराइच जिला अस्पताल में ऐसा था व्यवहार

    मनुष्यों से डरती थी। न कपड़े पहनती, न पहनना जानती थी। इंसानों की तरह भोजन हाथों से उठाने के बजाय जानवरों की तरह मुंह से खाती थी। खाने से पहले भोजन को थाली में से बेड पर फेंक देती थी। हाथों और पैरों के बल चलती थी। बंदरों की तरह चीखती थी। नित्य क्रियाएं भी नहीं बता पाती थी। बेड पर ही नित्य क्रियाएं कर लेती थी।

    जिला अस्पताल में स्वीपर माया और रेनू की देखभाल में 11 अप्रैल को डिस्चार्ज होने तक उसमें इतना बदलाव जरूर आ गया था कि डरना कम हुआ था। भीड़ देखकर कंबल को खींचकर ओढ़ लेती। पहनाने पर कपड़े पहनने लगी थी। चार पैरों के बजाय दो पैरों पर खड़ी होने लगी थी लेकिन सहारे के बाद। बोल बिल्कुल नहीं पाती थी।

    वनदुर्गा से अहसास तक बदले कई नाम

    जंगल में मिली इस बच्ची को उसकी परिस्थितियों के आधार पर जागरण ने ‘मोगली गर्ल’ नाम दिया। इसके बाद उसके कई नाम दर्ज हुए। बहराइच के तत्कालीन डीएम अजय दीप सिंह ने उसे वनदुर्गा नाम दिया तो अस्पताल ने उसका नाम रिकॉर्ड में पूजा दर्ज किया। जौनपुर का परिवार उसे अलीजा बता रहा था तो निर्वाण संस्था ने उसे अहसास नाम दिया।

    मोगली की तीन मांए माया, रेनू और रानी

    बहराइच जिला अस्पताल में जब मोगली भर्ती थी तब वह इंसानों से डरती थी, लेकिन उसका यह भय कम करने व इंसानी तौर तरीके सिखाने में वहां तैनात स्वीपर माया और रेनू की अहम भूमिका रही। वे ही दोनों की देखभाल करतीं और मोगली भी सिर्फ उनकी ही बात मानती थी।

    नित्य क्रिया कराने से लेकर उसे नहलाने और खिलाने की जिम्मेदारी संभाले माया और ‘मोगली गर्ल’ के बीच मां-बेटी का रिश्ता बन गया था। लखनऊ में निर्वाण संस्था में आने के बाद रेनू और माया की तरह रानी उसकी मां की तरह देखभाल करने लगी।

    रानी गर्व से बताती है कि वह उसे अम्मा कहती है। निर्वाण में वह सबसे ज्यादा रानी से ही घुली-मिली थी और रानी ही उसका ख्याल रखती।

    रानी बताती है कि साल भर में ही उसमें काफी बदलाव आ गए थे। शुरुआत में दी गई स्पीच थेरेपी के बाद धीरे-धीरे ही सही उसमें इंसानी तौर-तरीके आ गए थे, लेकिन यह सब एक सीमा में आकर ठहर गए।

    जहां पली-बढ़ी वहां अब सिर्फ ‘मोगली गर्ल’ का अहसास शेष

    लखनऊ के तकरोही स्थित निर्वाण राजकीय बाल गृह विशेषीकृत की गलियां, कमरे और आंगन आज जैसे उसकी यादों से भरे हुए हैं। जिन दीवारों ने उसके संघर्ष, मुस्कान, जिद और बदलाव को करीब से देखा था, वे भी मानो खामोश हो गई हैं।

    संस्थान के कर्मचारियों का कहना है कि अहसास की मौजूदगी पूरे परिसर में महसूस होती थी और अब उसके जाने से एक बड़ा खालीपन आ गया है। देखभाल करने वाली रानी ने उसे बेटी की तरह अपनाया। धीरे-धीरे उसने लोगों को पहचानना सीखा, कपड़े पहनने लगी और रानी को "अम्मा" कहकर पुकारने लगी। हालांकि वह कभी बोलना नहीं सीख सकी, लेकिन उसके हाव-भाव और चेहरे की मुस्कान ही उसकी भाषा बन गए थे।

    निर्वाण फाउंडेशन के अध्यक्ष सुरेश सिंह धपोला बताते हैं कि वर्षों की देखभाल और चिकित्सा के बावजूद बचपन में हुए मानसिक और शारीरिक नुकसान की भरपाई संभव नहीं हो सकी। उसका मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं था और वह गंभीर बौद्धिक अक्षमता तथा मिर्गी की बीमारी से जूझ रही थी।

    15 जून को लखनऊ के डा. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में उसका निधन हो गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में फेफड़ों की बीमारी से उत्पन्न सेप्टीसीमिया को मृत्यु का कारण बताया गया है। जिन कमरों में वह रहती थी, जहां वह घंटों बैठा करती थी, वहां अब एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है। ऐसा लगता है मानो संस्थान की दीवारें भी अपनी उस बेटी को खोज रही हों, जिसने जंगल से निकलकर समाज के बीच जीने का लंबा संघर्ष किया और अपने पीछे संवेदनाओं से भरी एक अमिट कहानी छोड़ गई।