UP Politics: आठ महीने बाद भी तय नहीं हो पाया भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष, यहां फंस रहा पेंच… मंथन जारी
उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का चयन आठ महीने बाद भी नहीं हो पाया है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव और 2026 के पंचायत चुनाव को देखते हुए पार्टी सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक संतुलन बनाने में जुटी है। मुख्य विपक्षी दल सपा के ‘पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक’ (पीडीए) फार्मूले का काट खोजने के लिए भाजपा प्रयासरत है। आपसी खींचतान के कारण 28 जिलाध्यक्षों की घोषणा भी अटकी हुई है।

शोभित श्रीवास्तव, लखनऊ। आठ महीने बाद भी भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तय नहीं कर पाई है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव व 2026 के पंचायत चुनाव को देखते हुए पार्टी में सामाजिक समीकरण व संगठनात्मक संतुलन बनाने के लिए प्रदेश अध्यक्ष को लेकर मंथन जारी है।
पार्टी ने कई राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव कर नए प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा कर दी, लेकिन प्रदेश का मामला टलता ही जा रहा है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस देरी की वजह केवल एक नाम पर सहमति न बन पाना नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई अन्य प्रमुख कारण भी जुड़े हुए हैं।
इस वर्ष 15 जनवरी तक प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होना था। प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव के लिए जनवरी में ही केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को यूपी का प्रभारी भी बनाया गया था, लेकिन अभी तक प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर कुछ तय नहीं हो पाया है।
वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव व इससे पहले पंचायत चुनाव को देखते हुए भाजपा ऐसा चेहरा सामने लाना चाहती है जो जातीय संतुलन साध सके। मुख्य विपक्षी दल सपा का ‘पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक’ (पीडीए) फार्मूला 2024 के लोकसभा चुनाव में सफल रहा था।
इस कारण भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था उसकी 80 में से महज 33 सीटें आईं थीं। यही कारण है कि भाजपा ऐसा प्रदेश अध्यक्ष बनाना चाहती है जो इस पीडीए की रणनीति का काट बन सके।
दूसरी अहम वजह संगठनात्मक और वैचारिक संतुलन भी बताई जा रही है। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व और आरएसएस अपने-अपने स्तर पर उपयुक्त चेहरा तलाश रहे हैं। केंद्रीय नेतृत्व चुनावी साख और जनाधार को प्राथमिकता देता है, जबकि संघ लंबे संगठनात्मक अनुभव वाले नेता को वरीयता देना चाहती है। ऐसे में दोनों के बीच तालमेल बैठने में भी समय लग रहा है।
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अब उपराष्ट्रपति के चुनाव में जुट गया है।यही वजह है कि इस चुनाव के बाद ही अब संगठनात्मक चुनाव पर भाजपा ध्यान देगी। उपराष्ट्रपति का चुनाव नौ सितंबर को होना है, ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव उसके बाद ही होने की संभावना है।
वहीं, भाजपा अभी 28 जिलाध्यक्षों का भी चयन नहीं कर पाई है। बड़े नेताओं खासकर सांसद व विधायकों के बीच खींचतान के कारण ही जिलाध्यक्षों का चयन नहीं हो पाया है। पार्टी ने प्रदेश को 98 संगठनात्मक जिलों में बांटा हुआ है। इसमें से 70 जिलाध्यक्षों की घोषणा 16 मार्च को हो चुकी है।
ऐसे में शेष 28 जिलाध्यक्षों का चयन अब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के चयन के बाद होना है। प्रदेश अध्यक्ष न तय हो पाने के कारण इन जिलों में भी नया संगठन नहीं बन पा रहा है।
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