Mathura News : राधाकुंड में स्नान से संतान सुख देती हैं राधारानी, श्रद्धा की डुबकी लगाते हैं हजारों लोग
गोवर्धन के राधाकुंड में अहोई अष्टमी पर निसंतान दंपती संतान प्राप्ति की कामना लेकर आते हैं। मान्यता है कि इस दिन आधी रात को कुंड में स्नान करने से संतान की प्राप्ति होती है। राधाकुंड जो कभी अरिष्टासुर की नगरी थी श्रीकृष्ण द्वारा बछड़े का वध करने पर बने पाप से मुक्ति पाने के लिए बनाया गया था।

संसू, गोवर्धन । कान्हा के वरदान से सुसज्जित राधाकुंड में हर आंखें बरसती हैं। किसी की आंखें खुशी में तो किसी की वेदना में।
जलस्वरूपा राधारानी के वरदान का सागर राधाकुंड, आभार और अनुरोध का संगम नजर आता है। आंचल फैलाती ममता के मुंह से बस एक ही करुण पुकार सुनाई देती है कि हे राधारानी, मेरी भी सूनी झोली भर दो। नि:संतान का दर्द समेटे दंपती राधाकुंड में संतान प्राप्ति को अहोई अष्टमी पर विश्वास के गोते लगाते नजर आते हैं ।
धार्मिक मान्यता के अनुसार अहोई अष्टमी पर राधाकुंड में आधी रात स्नान करने वाले दंपती को संतान की प्राप्ति होती है। स्नान के उपरांत एक पसंदीदा फल छोड़ने का विधान है तो पेठा फल का दान भी परंपरा में शामिल है।
तमाम देशी और विदेशी दंपती यहां आकर अपना आंचल फैलाएंगे। वहीं संतान की सुख प्राप्त करने वाले दंपती इस रात राधारानी का आभार जताने के लिए भी स्नान करते हैं। पंडित बाल कृष्ण उपाध्याय के अनुसार मान्यता है कि नि:संतान दंपती कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि राधाकुंड में स्नान करते हैं तो जल्द ही उनके घर बच्चे की किलकारियां गूंजने लगती हैं।
श्रीकृष्ण ने दिया था राधारानी को वरदान
राधाकुंड अरिष्टासुर की नगरी अरीठ वन थी। अरिष्टासुर बलवान व तेज दहाड़ वाला राक्षस था। उसकी दहाड़ से आसपास के नगरों में गर्भवती के गर्भ गिर जाते थे। गाय चराने के दौरान अरिष्टासुर ने बछड़े का रूप रखकर भगवान कृष्ण को मारने की कोशिश की। कान्हा के हाथों बछड़े का वध करने से उन्हें गोहत्या का पाप लग गया। प्रायश्चित के लिए श्रीकृष्ण ने बांसुरी से कुंड बनवाया और तीर्थों का जल यहां एकत्रित किया।
इसी तरह राधारानी ने भी अपने कंगन से कुंड खोदा और तीर्थों का जल एकत्र किया। जब दोनों कुंड भर गए तो कृष्ण और राधा ने रास किया। श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि जो भी नि:संतान दंपति अहोई अष्टमी की रात यहां स्नान करेगा, उसे सालभर के भीतर संतान की प्राप्ति होगी। इसका उल्लेख ब्रह्मा पुराण व गर्ग संहिता के गिर्राज खंड में है।
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