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    ‘निकायों को आर्थिक निर्णय लेने की स्वतंत्रता, बशर्ते वैधानिक प्रक्रियाओं का हुआ हो पालन’

    Updated: Thu, 26 Feb 2026 09:47 AM (IST)

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद नगर निगम के संपत्ति कर और न्यूनतम मासिक किराया दर वृद्धि के फैसले को सही ठहराते हुए एक जनहित याचिका खारिज कर दी। ...और पढ़ें

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    तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण

    विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नगर निगम गाजियाबाद के न्यूनतम मासिक किराया दर (एमएमआरआर) निर्धारण और संपत्ति कर में वृद्धि के निर्णय में कोई त्रुटि नहीं पाते हुए राजेंद्र त्यागी व दो अन्य की जनहित याचिका खारिज कर दी है। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली तथा न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने कहा कि नगर निगम ने कानूनी प्रविधानों के अनुसार कार्य किया है, इसलिए प्रकरण में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है।

    कोर्ट ने कहा कि स्थानीय निकायों को अपने आर्थिक निर्णय लेने में स्वतंत्रता है, बशर्ते उन्होंने वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया हो। याचीगण जो सभासद हैं, ने तीन मई 2025 के आदेश, पहली अप्रैल 2024 की सूचना और सात मार्च 2025 के उस संकल्प संख्या 139 को रद करने की प्रार्थना की थी जिसके द्वारा संपत्ति कर में संशोधन को मंजूरी दी गई है।

    यह भी कहा गया था कि उप्र नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 174(2)(ए) के तहत संपत्ति कर पर छूट का लाभ देने का निर्देश दिया जाए तथा नगर निगम को 15 फरवरी 2024 के कार्यकारी समिति के निर्णय को लागू करने से रोका जाए।

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    कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि अकोला नगर निगम मामले में देखा गया है कि कर दरें लगभग 16 वर्षों तक स्थिर रहीं। जब संबंधित निगम ने दरों के संशोधन के लिए वैधानिक प्रक्रिया अपनाई, तब उच्च न्यायालय ने निर्णय में हस्तक्षेप किया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने उसके निर्णय को पलटते हुए कहा कि जब निगम की करों को संशोधित करने की मौलिक अधिकारिता को चुनौती नहीं दी गई, तब उच्च न्यायालय की जांच का दायरा केवल यह देखने तक सीमित रहना था कि क्या वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया है?

    शिव सेवक सिंह मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का उल्लेख भी खंडपीठ ने किया। कहा, न्यायालय ने पाया था कि नगर आयुक्त द्वारा अधिसूचित मासिक किराये की दरें वैध थीं और आकलन सूचियां अधिनियम की धारा 212 के तहत अंतिम और निर्णायक मानी गईं। ऐसा ही वर्तमान मामले में भी है।

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