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    औरंगजेब नहीं था ज्ञानवापी का मालिक, पुनरीक्षण याचिका पर वाद मित्र ने दी अदालत में दलील

    Updated: Fri, 29 Aug 2025 12:22 PM (IST)

    वाराणसी के ज्ञानवापी मामले में 1991 में दाखिल मुकदमे में पक्षकार बनाने की याचिका पर सुनवाई हुई। वादी विजय शंकर रस्तोगी ने अदालत में कहा कि औरंगजेब ज्ञानवापी का मालिक नहीं था न ही उसने विवादित स्थल को वक्फ किया था। उन्होंने मुगलकालीन भूमि कानूनों और औरंगजेब के मंदिर गिराने के फरमान का उल्लेख किया।

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    इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया।

    जागरण संवाददाता, वाराणसी। ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा-पाठ करने का अधिकार देने को लेकर 1991 में दाखिल मुकदमे में पक्षकार बनाने को लेकर दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई गुरुवार को अपर जिला जज (चतुर्दश) सुधाकर राय की अदालत में हुई।

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    लोहता निवासी मुख्तार अहमद अंसारी की ओर दाखिल याचिका पर वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी ने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि औरंगजेब ज्ञानवापी का मालिक नहीं था और न ही विवादित स्थल का उसके द्वारा वक्फ किया गया था।

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    अदालत के समक्ष उन्होंने मुगल काल में प्रचलित भूमि संबंधित कानूनों को बताया। कहा, मुगलकाल में जब बादशाह किसी राज्य पर जबरदस्ती कब्जा करता था तो राज्य की भूमि का मालिक नहीं होता था। उसका मालिक भूमि जोतने वाला या कब्जा रखने वाला होता था। बादशाह केवल लगान वसूल करने का अधिकारी होता था जो हिंदुओं से "जजिया" और मुसलमानों से "ओसर" के रूप में वसूल किया जाता था। इसीलिए औरंगजेब, अकबर, शाहजहां ने अपना किला बनाने के लिए भूमि काश्तकारों से क्रय किया था।

    वाद मित्र विजय शंकर रस्तोगी ने कोलकाता स्थित एशियाटिक सोसाइटी आफ इंडिया वेस्ट में सुरक्षित रखी पुस्तक "मआसिर-ए-आलमगिरी" में साकी मुस्तैद खान द्वारा औरंगजेब के आदेश संकलन का जिक्र किया। सर यदुनाथ सरकार द्वारा इसके अंग्रेजी में रूपांतरित प्रमाणित प्रतिलिपि को प्रस्तुत करते हुए न्यायालय को बताया कि औरंगजेब ने विश्वनाथ मंदिर गिराने का फरमान 18 अप्रैल 1969 को जारी किया था। उस पर मस्जिद बनाने का फरमान नहीं मिलता है इसलिए मस्जिद बनाने का कार्य बादशाही हुकुम से नहीं है। यह स्थानीय मुसलमानों द्वारा किया गया अनाधिकृत कार्य है।

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    विवादित संपत्ति वक्फ नहीं है और मस्जिद के अगल-बगल कोई कब्र नहीं हो सकती। अगर वहां कब्र है तो कोई मस्जिद नहीं होगी और वहां मस्जिद है तो वहां कब्र नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस प्रकार की विधि-व्यवस्था को रामजन्म भूमि के विवाद में निर्णित किया गया है। इस प्रकार मुख्तार अहमद अंसारी द्वारा कथित कब्र पर फातिया पढ़ने का सवाल नहीं होता। उन्होंने वाद संख्या 62 सन् 1936 दीन मोहम्मद व अन्य बनाम स्टेट फार इंडिया इन काउंसिल के मामले में तत्कालीन सब जज द्वारा वर्ष 1937 में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए यह भी दलील दी कि सब जज ने कथित कब्रों को हिंदू देवताओं की मूर्तियां माना। उस समय मुसलमानों ने कोई आपत्ति नहीं की थी।

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    उन्होंने बनारस के दोषीपुरा क्षेत्र स्थित एक मस्जिद के विवादित मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 1982 में दिए गए फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि बनारस की 245 वक्फ संपत्तियों के संबंध में जारी नोटिफिकेशन को अवैध करार दिया था। उनकी बहस पूरी होने के बाद मुख्तार अंसारी के वकील ने वादमित्र द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर अपना पक्ष रखने के लिए अवसर मांगा जिसे अदालत ने मंजूर करते हुए एक सितंबर की तिथि मुकर्रर कर दी।

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