'ज्ञानवापी परिसर में अन्य विश्वनाथ मंदिर होने का प्रश्न नहीं...', कोर्ट में वादी के वकील ने दी दलील; 13 अगस्त को अगली सुनवाई
ज्ञानवापी मामले में 1991 में दाखिल मुकदमे में पक्षकार बनाने को लेकर पुनरीक्षण याचिका पर अदालत में सुनवाई हुई। मुख्तार अहमद अंसारी के वकील ने कहा कि एक विश्वनाथ मंदिर होने पर ज्ञानवापी परिसर में अन्य मंदिर का सवाल नहीं उठता। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 13 अगस्त की तारीख तय की। मुख्तार अहमद अंसारी ने पहले पक्षकार बनने के लिए याचिका दायर की थी।

जागरण संवाददाता,वाराणसी। ज्ञानवापी में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को पूजा-पाठ करने का अधिकार देने को लेकर 1991 में दाखिल मुकदमे में पक्षकार बनाने को लेकर दाखिल पुनरीक्षण याचिका पर गुरुवार को अपर जिला जज (चतुर्दश) सुधाकर राय की अदालत में सुनवाई हुई।
पुनरीक्षणकर्ता मुख्तार अहमद अंसारी की ओर से उनके वकील ने दलील दी कि एक विश्वनाथ मंदिर होने पर ज्ञानवापी परिसर में अन्य विश्वनाथ मंदिर होने का प्रश्न नहीं है। बहस पूरी न होने पर अदालत ने इसे जारी रखते हुए 13 अगस्त की तिथि मुकर्रर कर दी।
पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्तार अहमद अंसारी की ओर से वकील नंद लाल प्रसाद ने यह दलील दी कि ज्ञानवापी परिसर में जो मस्जिद कायम है वह सरकारी दस्तावेज खसरा में भूखंड आराजी नंबर 9130 पर कायम होना बताया गया है।
इसके पश्चिम दिशा में स्थित मजार है जहां पर उर्स करने को लेकर को एक वाद सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) की अदालत में विचाराधीन है। जबकि आराजी नंबर 9133 में महारानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा निर्मित विश्वनाथ मंदिर है जिसपर महाराजा रणजीत सिंह ने सोना चढ़वाया है।
उस भूखंड पर विश्वनाथ मंदिर पहले से ही कायम है जिसे हिंदू ज्योर्तिलिंग कहते हैं और उनका दर्शन,पूजा-पाठ करते हैं। ऐसे में ज्ञानवापी परिसर में कोई अन्य विश्वनाथ मंदिर होने का कोई प्रश्न ही नहीं होता।
विश्वनाथ मंदिर का प्रबंधन, व्यवस्था व नियंत्रण काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम के अंतर्गत बोर्ड द्वारा किया जाता है। वादियों को वर्तमान वाद (वाद संख्या 610 सन 1991) में काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट को पक्षकार नहीं बनाया है।
वर्ष 1983 में मंदिर अधिग्रहण को लेकर उपजे विवाद में जब सुप्रीम कोर्ट ने काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालन करने की मान्यता दे दी तब परिसर में विश्वनाथ मंदिर होने दावा करना निराधार तथ्य है। वादियों को तो वाद दाखिल करने का कोई अधिकार ही नहीं है।
इस वाद में अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद को प्रतिवादी बनाया गया है जबकि अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद बनारस के सभी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व नहीं करता। यह संस्था सिर्फ मस्जिद का प्रबंधन देखती है जो वक्फ बोर्ड द्वारा नामित है।
अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद व उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड से मिलीभगत करके वादी पक्ष इस मुकदमे में अपने पक्ष में फैसला करा लेना चाहता है। वह अपने वालिद के समय से ही ज्ञानवापी मस्जिद में नमाज और फातिया पढ़ने जाया करता रहा है।
इस मुकदमे में उसे पक्षकार बनाया जाना आवश्यक है। इस मुकदमे में पक्षकार बनाने के लिए लोहता निवासी मुख्तार अहमद अंसारी ने सिविल जज (सीनियर डिवीजन फास्टट्रैक) की अदालत में प्रार्थना पत्र दाखिल किया था।
सुनवाई बाद अदालत ने दो मई 2024 को इसे खारिज कर दिया था। इस आदेश के खिलाफ मुख्तार अहमद अंसारी ने 24 मई 2024 को जिला जज की अदालत में पुनरीक्षण याचिका दायर की जिसकी अपर जिला जज (चतुर्दश) की अदालत में सुनवाई चल रही है।
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