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    उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी का निधन, दो बार संभाली थी राज्य की कमान

    Updated: Tue, 19 May 2026 12:18 PM (IST)

    उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (सेनि) भुवन चंद्र खंडूड़ी का देहरादून में निधन हो गया। वे अपनी ईमानदारी, अनुशासन और प्रशासनिक दृढ़ता के लिए ज ...और पढ़ें

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    HighLights

    1. पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी का देहरादून में निधन।

    2. ईमानदारी, अनुशासन और प्रशासनिक दृढ़ता के लिए थे प्रसिद्ध।

    3. दो बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री रहे।

    जागरण संवाददाता, देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति के सबसे सख्त, ईमानदार और अनुशासित चेहरों में शामिल रहे मेजर जनरल (सेनि) भुवन चंद्र खंडूड़ी अब नहीं रहे। सेना की वर्दी से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का उनका सफर उत्तराखंड ही नहीं, देश की राजनीति में एक मिसाल माना जाता है।

    लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूरी का मंगलवार को मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन से उत्तराखंड की राजनीति का एक युग समाप्त हो गया।

    सख्त, ईमानदार व अनुशासित भुवन चंद्र खंडूड़ी का निधन

    एक अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे भुवन चंद्र खंडूड़ी ने राजनीति में आने से पहले भारतीय सेना में लंबी सेवा दी। वह इंजीनियरिंग कोर में अधिकारी रहे और अपनी कार्यकुशलता के लिए 1982 में 'अति विशिष्ट सेवा मेडल' से सम्मानित किए गए। सेना से मेजर जनरल के पद पर सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन का रास्ता चुना।

    1991 में गढ़वाल लोकसभा सीट से चुने गए थे सांसद

    खंडूड़ी पहली बार 1991 में गढ़वाल लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद वह कई बार संसद पहुंचे और भाजपा के मजबूत पहाड़ी चेहरे बनकर उभरे। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्हें सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय का दायित्व मिला। यही वह दौर था जब देश में सड़क क्रांति की नींव रखी गई। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को जमीन पर उतारने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है। देश के दूरस्थ गांवों को सड़क से जोड़ने के पीछे खंडूड़ी की प्रशासनिक दृष्टि और सख्ती को आज भी याद किया जाता है।

    उत्तराखंड के 'कड़क मुख्यमंत्री'

    2007 में उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनने के बाद भुवन चंद्र खंडूड़ी पहली बार मुख्यमंत्री बने। उनका कार्यकाल 'जीरो टालरेंस' और सख्त प्रशासन के लिए जाना गया। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी छवि इतनी मजबूत थी कि सरकारी मशीनरी तक में उनका नाम अनुशासन के प्रतीक के रूप में लिया जाता था। हालांकि उनकी सख्ती कई नेताओं और विधायकों को असहज भी करती रही। 2009 लोकसभा चुनाव में भाजपा के खराब प्रदर्शन की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया, लेकिन पार्टी ने 2011 में फिर उन पर भरोसा जताया और दूसरी बार उन्हें मुख्यमंत्री बनाया।

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    ईमानदारी बनी पहचान

    राजनीति में अक्सर समझौतों के दौर के बीच खंडूड़ी अपनी साफ-सुथरी छवि के कारण अलग पहचान रखते थे। उत्तराखंड में अफसरशाही पर नियंत्रण, पारदर्शिता और विकास कार्यों में गुणवत्ता को लेकर उनका रवैया बेहद कठोर माना जाता था। उनके विरोधी भी उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा सके।

    2012 की हार, लेकिन सम्मान बरकरार

    2012 विधानसभा चुनाव में उन्हें कोटद्वार सीट से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन जनता और राजनीति में उनका सम्मान कम नहीं हुआ। 2014 में वह फिर गढ़वाल से सांसद बने। बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य कारणों से बाद के वर्षों में उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली।

    उत्तराखंड ने खोया अपना 'अनुशासन पुरुष'

    भुवन चंद्र खंडूड़ी सिर्फ नेता नहीं, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक शैली का नाम थे जिसमें सादगी, ईमानदारी और प्रशासनिक दृढ़ता साथ दिखाई देती थी। उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद की राजनीति में उनकी भूमिका हमेशा निर्णायक मानी जाएगी। उनके निधन के साथ उत्तराखंड ने एक ऐसा जननेता खो दिया, जिसकी पहचान सत्ता से ज्यादा सिद्धांतों और अनुशासन से थी।

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